Saturday, 10 November 2018

वो बचपन की दीवाली

वो बचपन की दीवाली
........................
ये भी कोई दीपावली है, दीपावली तो तब थी जब हम छोटे हुआ करते थे। सरकारी स्कूल में पढ़ते थे लिहाजा दीपावली की छुट्टियां भरपूर मिला करती थी। दिन भर की खेलकूद के बाद इन्तजार रहता था पटाखों का। शामको जब पिताजी थैले में भर के पटाखे लाते थे तो मानों बरसों से तपस्या में लीन ध्रुव को ईश्वर प्राप्ति हो गई हो। लक्ष्मी पूजन के दौरान पिताजी का ध्यान पूजा में रहता और हम सभी भाईयों का पटाखों की थैली में। पूजा के पश्चात सभी को बराबर बराबर बांटकर पटाखे दिये जाते, तब आज की तरह पटाखे फोड़ने पर किसी की काली नजर नहीं लगी थी (इसे सुप्रीम कोर्ट से जोड़कर ना देखें) देर रात तक पटाखे फोड़ने के बाद भी सुबह जल्दी नहा धोकर तैयार हो जाते। नए कपड़े जो पहनने का शौक था। जो सेलिब्रिटि फिलिंग उन कपड़ों में आती थी कसम से आज के महंगे से महंगे कपड़ों में नहीं आती है। नए कपड़े पहनकर बाहर दोस्तों को दिखाते और एक दूसरे के कपड़ों की तारीफ करते । जेब में थैली खोंसकर निकल पड़ते मोहल्ले में ''रामा—श्यामा'' करने तब हम ये नहीं देखते कि फलां व्यक्ति हमारी जान पहचान का है या नहीं या वो हमारे घर आए तो हम उसके घर जाएंगे। जो भी घर देखा बच्चों की टोली घुस जाती उस घर में। वो लोग हमें निराश भी नहीं करते। मोहल्ले में कुछ मुस्लिमों के घर भी थे लेकिन तब सोशल मीडिया नहीं था लिहाजा हिन्दु — मुसलमान का इतना लफड़ा नहीं था। दीपावली को वो भी हमारे लिए मिठाई बताशे रखते थे। घर लौटते लौटते मिठाई, बताशे इत्यादि से थैली पूरी भर जाया करती। फिर आपस में तुलना करते कि किसकी थैली ज्यादा भरी है।

No comments:

Post a Comment