लघुकथा — विचारधारा या व्यक्तिगत स्वार्थ
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जगन्नाथ प्रसाद अपने क्षेत्र के बहुत बड़े नेता थे। आज उनके घर पर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था। सफेद पोशाक पहने नेताजी बड़ी सी कुर्सी पर पसरे हुए थे, सामने कार्यकर्ता फर्श पर बैठे थे। नेताजी अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे थे। ''देखो भाईयों पार्टी हमेशा विचारधारा से चलती है, और लड़ाई भी विचारधारा की ही है। अब देखिए विरोधी पार्टी को, उनकी विचारधारा देश के खिलाफ है, अब भला जिस पार्टी की विचारधारा ही देश के खिलाफ हो भला वो पार्टी कभी देश का भला कैसे सोच सकती हैं।'' नेताजी की हर बात बरास्ते कान कार्यकर्ता के मन तक पहुंच रही थी।
''अब जरा अपनी पार्टी को ही देखिए, देश के बारे में सोचती है इसी लिए हम पार्टी के साथ है। आज के समय में देश के बारे में सिर्फ हमारी पार्टी ही सोचती है।'' कार्यकर्ता कृतज्ञ भाव से नेताजी की ओर देख रहे थे और ऐसे नेताजी का अनुसरण कर अपने आपको धन्य समझ रहे थे।
तभी सामने चल रही टीवी पर न्यूज फ्लेश होती है —
'मंत्री जगन्नाथ प्रसाद का टिकट कटा, उनकी जगह नये चेहरे को दिया गया मौका'
''पार्टी ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैंने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है। मैं इसका बदला पार्टी से लेकर रहूंगा''
तभी नेताजी का फोन बज उठता है विरोधी पार्टी का फोन है जो उन्हे अपनी पार्टी की ओर से टिकट देने का प्रस्ताव रखती है। नेताजी के चेहरे पर चमक लौट आती है और तुरन्त तुरन्त अपनी कार लेकर निकल पड़ते हैं।
विचारधारा को व्यक्तिगत स्वार्थ के काले बादलों ने घेर लिया और नेताजी के कार्यकर्ता भी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
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जगन्नाथ प्रसाद अपने क्षेत्र के बहुत बड़े नेता थे। आज उनके घर पर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था। सफेद पोशाक पहने नेताजी बड़ी सी कुर्सी पर पसरे हुए थे, सामने कार्यकर्ता फर्श पर बैठे थे। नेताजी अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे थे। ''देखो भाईयों पार्टी हमेशा विचारधारा से चलती है, और लड़ाई भी विचारधारा की ही है। अब देखिए विरोधी पार्टी को, उनकी विचारधारा देश के खिलाफ है, अब भला जिस पार्टी की विचारधारा ही देश के खिलाफ हो भला वो पार्टी कभी देश का भला कैसे सोच सकती हैं।'' नेताजी की हर बात बरास्ते कान कार्यकर्ता के मन तक पहुंच रही थी।
''अब जरा अपनी पार्टी को ही देखिए, देश के बारे में सोचती है इसी लिए हम पार्टी के साथ है। आज के समय में देश के बारे में सिर्फ हमारी पार्टी ही सोचती है।'' कार्यकर्ता कृतज्ञ भाव से नेताजी की ओर देख रहे थे और ऐसे नेताजी का अनुसरण कर अपने आपको धन्य समझ रहे थे।
तभी सामने चल रही टीवी पर न्यूज फ्लेश होती है —
'मंत्री जगन्नाथ प्रसाद का टिकट कटा, उनकी जगह नये चेहरे को दिया गया मौका'
''पार्टी ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैंने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है। मैं इसका बदला पार्टी से लेकर रहूंगा''
तभी नेताजी का फोन बज उठता है विरोधी पार्टी का फोन है जो उन्हे अपनी पार्टी की ओर से टिकट देने का प्रस्ताव रखती है। नेताजी के चेहरे पर चमक लौट आती है और तुरन्त तुरन्त अपनी कार लेकर निकल पड़ते हैं।
विचारधारा को व्यक्तिगत स्वार्थ के काले बादलों ने घेर लिया और नेताजी के कार्यकर्ता भी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
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