Tuesday, 20 November 2018

बरखा बहादुर भाग — 1

बरखा बहादुर 
भाग — 1
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लगभग 10 बाई 10 के कमरे में मरियल सी खाट पर लेटा बहादुर काफी देर से बस पंखे की ओर ही ताके जा रहा था जो मात्र घूमने की औपचारिकता ही पूरी कर रहा था। नीन्द उसकी आंखों से कासों दूर थी। वो तो बस अतीत की गलियों में कहीं खोया हुआ था। उसे अब भी याद है जब वो नेपाल से ब्याह करके अपनी नई नवेली दुल्हन के साथ रामपुर आया था। रात में ‘गोरखे’ का काम करता और दिन में मजदूरी करता। कुल मिलाकर अपनी जिन्दगी से खुश था और संतुष्ट भी। बरखा से ब्याह के बाद तो मानों उसके बरसों से सूखे रेगिस्तान पर पहली बारीश की फुहारें पड़ी थी। कितने खुश थे वे दोनों। ब्याह के दो साल बाद का वो दिन भी उसे याद है जब बरखा ने उसे बताया कि वो पिता बनने वाला है। कितना खुश हुआ था वो उस दिन और हो भी क्यूं नहीं, आखिर उन दोनों का प्यार अब आकार ले रहा था। बहादुर अब बरखा का खूब ध्यान रखता, थोड़ा सा भी वजन उठा लेने पर बरखा को बच्चों की भांति डांट दिया करता। बरखा को भी डांट में आनन्द आता और आता क्यूं नहीं डांट में प्रेम और उसके प्रति चिन्ता मिली हुई थी।
यादों की गलियों में टहलते टहलते बहादुर उस वक्त में पहुंच गया जब बरखा प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। वह अस्पताल में प्रसूति कक्ष के बाहर बैठा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। बरखा की चीखें उसके कानों के रास्ते से होकर उसके दिल तक को बींध रही थी। प्रसव पीड़ा से अधिक पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता या यूं कहें कि प्रसव के बाद नारी का दूसरा जन्म होता है। लेकिन हाय री किस्मत, बरखा ये दूसरा जन्म नहीं ले पाई। फूल सी बच्ची के रूप में खुद को बहादुर के पास छोड़ बरखा हमेशा के लिए विदा हो गई। बहादुर कुछ समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उम्मीदों की नींव पर सपनों की जो ईमारत खड़ी की थी वो यूं ढह जाएगी। वक्त ने एक ही झटके में बहादुर की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। वो तय नहीं कर पा रहा था कि बच्ची को लेकर खुश हो या बरखा जाने का मातम मनाए... 
क्रमश:.......

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