Monday, 26 November 2018

लघु कथा : मासूम सवाल


झौंपड़ी के दरवाजे पर बैठी पांच साल की धनिया कब से मां का इन्तजार कर रही है। 
''हमेशा तो इस वक्त तक मां आ जाती है,। जोरों की भूख लगी है लेकिन मां आएगी तभी तो कुछ खाने को मिलेगा, कुछ ठण्डा बासी भी नहीं है खाने को।''
इतने में सामने से आती हुई रज्जो को देख धनिया अपनी भूख को सांत्वना देती है।
''क्या मां कितनी देर लगा दी, कहां रूक गई थी आज इतनी देर, पता है कब से भूखी बैठी हूं, घर में एक दाना भी नहीं है खाने को।''
''अरे तेरे लिए ही तो रूकी थी, नहीं तो कब की आ जाती''
गठरी खोलती हुई रज्जो बोलती है। धनिया कुछ बोलती इससे पहले ही गठरी में कचौरियां व जलेबी देख आंखों में आश्चर्यमिश्रित चमक आ जाती है
''अरे मां आज कहां से लाई ये सब''
''अभी चुनाव चल रहे हैं ना, एक नेताजी गरीबों को भोजन बांट रहे थे तो ले आई। अभी दस — पन्द्रह दिन तक ये सब चलता रहेगा''
धनिया मासूमियत से पूछ बैठी — ''मां सिर्फ दस — पन्द्रह दिन ही क्यूं, ये चुनाव साल भर क्यूं नहीं चलते''
धनिया के सवाल का रज्जो के पास कोई जवाब नहीं था

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