Saturday, 25 July 2020

सत्य


देख रहा हूॅं
कल तक जो
एक आलीशान और
बुलन्द ईमारत
हुआ करती थी
आज तब्दील हो चुकी है
एक टूटे हुए खण्डहर में
कल तक जो ईमारत
इतनी मजबूत थी
कि उसके तले हम
महफूज थे
हर आंधी तूफान से
हर बाढ़ और भूकम्प से
लेकिन
आज वही ईमारत
जर्जर है
संघर्षरत है
जूझ रही है
खुद के अस्तित्व से
कांप जाती है
हवा के झौंके से ही
यही तो है सत्य
ऐसे ही तो सभी
आलीशान ईमारतों को
एक दिन खण्डहर
हो ही जाना है

Friday, 24 July 2020

नाग पंचमी

सभी नागों को नाग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं। आज नागों का दिन है, आज विष वमन करने वाले नागों को भी दूध पिलाया जायगा, और सिर्फ आज ही पिलाया जायेगा। नाग भी ये बात भली भांति जानते हैं कि वह कल इन लोगों को दिख गया तो यही दूध पिलाने वाले लोग लाठी से पीट — पीट कर पिया हुआ दूध खून में से वापस निकाल लेंगे। लिहाजा वह कल सावधान हो जायेगा। 
हमारे देश में नागों को देवता का दर्जा मिला हुआ है। बॉलिवुड ने भी नागों पर कई फिल्में बनाकर उन्हें सम्मान दिया। श्रीदेवी ने तो न​गीना में 'इच्छाधारी नागिन' का कालजयी किरदार निभाया था। लेकिन समय के साथ ये इच्छा धारी नाग फिल्मों में से निकल कर अलग — अलग रूप धर कर इन्सानों के बीच छुप गये। इन्सान के रूप में होने के कारण इनको पहचानना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इनकी गतिविधियों पर ध्यान दें तो इनको पहचानने में देर नहीं लगेगी। ऐसे सॉंप जो पहले आस्तीनों में छुपे रहते थे वे सांप आजकल इंसान का रूप धरकर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं — ''वे भारत तेरे टुकड़े होंगे'', ''भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी'' जैसे नारे लगाते मिल जायेंगे। इन सॉंपों को देश विरोधी गतिविधियों में ज्यादा आनन्द आता हैं जो कि स्वाभाविक है क्योंकि वे पहले आस्तीन के ही सॉंप थे। कुछ सॉंप जो ज्यादा जहरीले थे वे सियासत में चले गये। वे अब मौखिक विषवमन करते हैं। इस रूप में उनके विष की मारक क्षमता भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गयी है। पहले उनके डसने से जहॉं सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु होती थी वहीं अब उनके विष वमन से हजारों लाखों लोग मारे जाते हैं। कुछ नाग मीडिया में चले गये और पत्रकार बन गये तो कुछ ने मजहब व जिहाद की घुट्टी पिला नये जहरीले सॉंप बनाने शुरू कर दिये। कुल मिलाकर कहना ये है कि ऐसे सॉंपों की पहचान कीजिये और मानव समाज में से ऐसे सॉंपों को अलग कीजिये क्योंकि कोरोना की वेक्सीन शायद मिल जाये लेकिन इनकी वेक्सीन मिलना शायद असम्भव है।

Tuesday, 21 July 2020

अब शबनम की बूँद बहुत है

तेरे सिवा तो लोग बहुत है
पर तन्हा माहौल बहुत है

इन राहों में मिला करो मत
इन राहों में लोग बहुत है

अब इनको भी जेल भेज दो
सत्ता में भी चोर बहुत है

जीवन हो गर भगतसिंह सा
जीने को चंद रोज बहुत हैं

इतने सावन बरस चुके की
अब शबनम की बूँद बहुत है

मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था

फिर यादों के शहर में मेला सा हो गया था
उनकी गली से गुजरे इक अरसा हो गया था

पत्थर भी हाय उस दम शर्मीन्दगी से पिघले
देखा जो रोटियों को बच्चा वो रो गया था

वो अब भी तेरी गलियों की खाक छानता है
इक दिन तेरी गली में दिल उसका खो गया था

मॉं के उठाये भी अब वो बेटा ना उठेगा
ओढ़ के तिरंगा वो लाल सो गया था

वो छोड़ के गया तो फिर लौट के ना आया
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था

Friday, 17 July 2020

मेरी कलम

मेरी कलम नहीं जो
दरबारों के आगे नाची हो
जिसकी स्याही राजनीति के
बाजारों से आती हो

मैं पैसों के लालच में कभी
शब्द बेच नहीं सकता हूँ
सत्ता को खुश करने झूठे
लेख नहीं लिख सकता हूँ

आकर्षण को नेह मानते

प्रेमी केवल रूह देखते
वो इसको नहीं देह मानते
वो भ्रम पाले बैठे हैं जो
आकर्षण को नेह मानते

सुन्दर मन से उनको क्या जो
सुन्दरता को देह मानते
मर्यादाएं बलि चढ़ाना
जीवन का सन्देश मानते

Friday, 10 July 2020

क्षणिकाएं

ओस की बून्द

मैं सुमन हूँ किसी वाटिका का प्रिये
मुझको माला में अपनी पिरो लीजिये
ज्यूं कोई वृक्ष बरसों से तप कर रहा 
ओस की बून्द ही बन भिगो दीजिये

पल

मुझे याद है बस वो गलियां
हाथ पकड़ हम संग गुजरे हैं
मैंने जीवन उसे ही माना
जो पल तेरे संग गुजरे है


जमीर 

पाप और पुण्य के जो बीच की लकीर है
ये वही लकीर है जो बोलता कबीर है
पश्चाताप की नमी न होती आँखों में अगर
तू जरा भी सुन लेता क्या बोलता जमीर है


मंजर 

(1)आँखों में बवण्डर देखे हैं
   यहॉं पीठ में खंजर देखे हैं
   जहॉं लगते थे बाजार कभी
   वहॉं मौत के मंजर देखे हैं


(2) दुनिया है एक नाटक
    कोई ना समझा पाया
    परदा उठा जो गिर के
    मंजर ही बदला पाया

नाविक

राह तेरी रोके उन तूफानों से लोहा लेता जा
साथ नहीं पतवार तो हाथों का ही दम दिखलाता जा
साहिल खुद जाने कब से तेरे स्वागत को आतुर है
ऐ नाविक हर हाल में तू अपनी कश्ती को खेता जा

बकरे
राजनीति में सारे पंछी पर कतरे हो जाते है
जिनको फूल समझते है हम वो कचरे हो जाते हैं
जाने कैसा जादू टोना सत्ता के गलियारों में
हमने नेता चुनकर भेजे वे बकरे हो जाते हैं


किताब

सारी दीवारें यादों की धुंधला गयी
तेरी तस्वीर अब भी इन आँखों में है
महका महका सा अब भी है घर ये मेरा
तेरे खत अब भी मेरी किताबों में है


मौन

कोई तो बात थी जो दबी रह गयी
जाने क्यूं दर्द भी हंस के वो सह गयी
हम अनाड़ी ही थे कुछ समझ ना सके
मौन रह कर भी वो जाने क्या कह गयी


खुशबु

मैं धरा प्यासी तुम बादलों की तरह
चाहते हम तुम्हे पागलों की तरह
खुद से तुझको मैं कैसे जुदा अब करूं
सांस में बस गये खुशबुओं की तरह

किरदार

ये गिरगिट हैं रंग इनके हर बार बदल जाते हैं
खबरें छपने से पहले अखबार बदल जाते हैं
कल तक वोटों की खातिर जो करबद्ध खड़े थे 
सत्ता में आकर उनके किरदार बदल जाते हैं

जहां

चंचल नयन वाण रोकती नहीं हो
सुन्दर अधर खोल बोलती नहीं हो
क्या स्वर्ग कोई उतरी हो अप्सरा
तुम इस जहां की तो लगती नहीं हो



महादेव

जो कंटक पथ पर चलते
होते सफल सदैव
मधु पीकर तो देव कहाते
विष पीकर महादेव


संघर्ष

मनुज कंटकों को राहों से
फूल समझ कर चुनता जा
संघर्षों के पार है मंजिल
तू बिना रुके बस चलता जा

प्रीत

प्रीत कुछ यूँ हृदय में उतर सी गयी
ठहरे सागर में दौड़ लहर सी गयी
कभी कबीरा दीवाना भटकता रहा
कभी मीरा दीवानी जहर पी गयी

दिन चुनाव वाले

कल तक लगता कौन भला इनकी सुध लेने वाले हैं।
जिनको किस्मत में भी कोसों दिखते नहीं उजाले है।
आज महीपों को मैंने उनके दर पर दण्डवत देखा।
लगता है दिन चुनाव वाले फिर से आने वाले हैं।।


आस का अंकुर
निशा का पार कर सागर रवि हर बार आयेगा
कभी अंधियार भी कोई दीये से पार पायेगा
भले कितनी ही बंजर हो निराशा की जमीं लेकिन
जो अंकुर आस से सींचों धरा को चीर जायेगा