ओस की बून्द
मैं सुमन हूँ किसी वाटिका का प्रिये
मुझको माला में अपनी पिरो लीजिये
ज्यूं कोई वृक्ष बरसों से तप कर रहा
ओस की बून्द ही बन भिगो दीजिये
पल
मुझे याद है बस वो गलियां
हाथ पकड़ हम संग गुजरे हैं
मैंने जीवन उसे ही माना
जो पल तेरे संग गुजरे है
जमीर
पाप और पुण्य के जो बीच की लकीर है
ये वही लकीर है जो बोलता कबीर है
पश्चाताप की नमी न होती आँखों में अगर
तू जरा भी सुन लेता क्या बोलता जमीर है
मंजर
(1)आँखों में बवण्डर देखे हैं
यहॉं पीठ में खंजर देखे हैं
जहॉं लगते थे बाजार कभी
वहॉं मौत के मंजर देखे हैं
(2) दुनिया है एक नाटक
कोई ना समझा पाया
परदा उठा जो गिर के
मंजर ही बदला पाया
नाविक
राह तेरी रोके उन तूफानों से लोहा लेता जा
साथ नहीं पतवार तो हाथों का ही दम दिखलाता जा
साहिल खुद जाने कब से तेरे स्वागत को आतुर है
ऐ नाविक हर हाल में तू अपनी कश्ती को खेता जा
नाविक
राह तेरी रोके उन तूफानों से लोहा लेता जा
साथ नहीं पतवार तो हाथों का ही दम दिखलाता जा
साहिल खुद जाने कब से तेरे स्वागत को आतुर है
ऐ नाविक हर हाल में तू अपनी कश्ती को खेता जा
बकरे
राजनीति में सारे पंछी पर कतरे हो जाते है
जिनको फूल समझते है हम वो कचरे हो जाते हैं
जाने कैसा जादू टोना सत्ता के गलियारों में
हमने नेता चुनकर भेजे वे बकरे हो जाते हैं
किताब
सारी दीवारें यादों की धुंधला गयी
तेरी तस्वीर अब भी इन आँखों में है
महका महका सा अब भी है घर ये मेरा
तेरे खत अब भी मेरी किताबों में है
मौन
कोई तो बात थी जो दबी रह गयी
जाने क्यूं दर्द भी हंस के वो सह गयी
हम अनाड़ी ही थे कुछ समझ ना सके
मौन रह कर भी वो जाने क्या कह गयी
खुशबु
मैं धरा प्यासी तुम बादलों की तरह
चाहते हम तुम्हे पागलों की तरह
खुद से तुझको मैं कैसे जुदा अब करूं
सांस में बस गये खुशबुओं की तरह
किरदार
ये गिरगिट हैं रंग इनके हर बार बदल जाते हैं
खबरें छपने से पहले अखबार बदल जाते हैं
कल तक वोटों की खातिर जो करबद्ध खड़े थे
सत्ता में आकर उनके किरदार बदल जाते हैं
जहां
चंचल नयन वाण रोकती नहीं हो
सुन्दर अधर खोल बोलती नहीं हो
क्या स्वर्ग कोई उतरी हो अप्सरा
तुम इस जहां की तो लगती नहीं हो
जहां
चंचल नयन वाण रोकती नहीं हो
सुन्दर अधर खोल बोलती नहीं हो
क्या स्वर्ग कोई उतरी हो अप्सरा
तुम इस जहां की तो लगती नहीं हो
महादेव
जो कंटक पथ पर चलते
होते सफल सदैव
मधु पीकर तो देव कहाते
विष पीकर महादेव
संघर्ष
मनुज कंटकों को राहों से
फूल समझ कर चुनता जा
संघर्षों के पार है मंजिल
तू बिना रुके बस चलता जा
प्रीत
प्रीत कुछ यूँ हृदय में उतर सी गयी
ठहरे सागर में दौड़ लहर सी गयी
कभी कबीरा दीवाना भटकता रहा
कभी मीरा दीवानी जहर पी गयी
दिन चुनाव वाले
कल तक लगता कौन भला इनकी सुध लेने वाले हैं।
जिनको किस्मत में भी कोसों दिखते नहीं उजाले है।
आज महीपों को मैंने उनके दर पर दण्डवत देखा।
लगता है दिन चुनाव वाले फिर से आने वाले हैं।।
आस का अंकुर
निशा का पार कर सागर रवि हर बार आयेगा
कभी अंधियार भी कोई दीये से पार पायेगा
भले कितनी ही बंजर हो निराशा की जमीं लेकिन
जो अंकुर आस से सींचों धरा को चीर जायेगा
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