Saturday, 25 July 2020

सत्य


देख रहा हूॅं
कल तक जो
एक आलीशान और
बुलन्द ईमारत
हुआ करती थी
आज तब्दील हो चुकी है
एक टूटे हुए खण्डहर में
कल तक जो ईमारत
इतनी मजबूत थी
कि उसके तले हम
महफूज थे
हर आंधी तूफान से
हर बाढ़ और भूकम्प से
लेकिन
आज वही ईमारत
जर्जर है
संघर्षरत है
जूझ रही है
खुद के अस्तित्व से
कांप जाती है
हवा के झौंके से ही
यही तो है सत्य
ऐसे ही तो सभी
आलीशान ईमारतों को
एक दिन खण्डहर
हो ही जाना है

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