फिर यादों के शहर में मेला सा हो गया था
उनकी गली से गुजरे इक अरसा हो गया था
पत्थर भी हाय उस दम शर्मीन्दगी से पिघले
देखा जो रोटियों को बच्चा वो रो गया था
वो अब भी तेरी गलियों की खाक छानता है
इक दिन तेरी गली में दिल उसका खो गया था
मॉं के उठाये भी अब वो बेटा ना उठेगा
ओढ़ के तिरंगा वो लाल सो गया था
वो छोड़ के गया तो फिर लौट के ना आया
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था
उनकी गली से गुजरे इक अरसा हो गया था
पत्थर भी हाय उस दम शर्मीन्दगी से पिघले
देखा जो रोटियों को बच्चा वो रो गया था
वो अब भी तेरी गलियों की खाक छानता है
इक दिन तेरी गली में दिल उसका खो गया था
मॉं के उठाये भी अब वो बेटा ना उठेगा
ओढ़ के तिरंगा वो लाल सो गया था
वो छोड़ के गया तो फिर लौट के ना आया
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था
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