सुबह जब आंखों की खिड़कियां खुली तो हमने खुद को पंजाब में पाया। चावल की फसल से लदे हरे भरे खेत देख मन ही मन प्रफुल्लित हो रहे थे। हमारे सामने की बर्थ पर एक सज्जन बैठे थे जो हमारी छठी इन्द्री के अनुसार फौजी थे। और हमारी छठी इन्द्री सही भी थी। अभी जम्मू दूर था सो थोड़ी दूर हम उन फोजी साहब के साथ बतियाने बैठ गये। बाहर बारीश का मौसम था और बून्दें जबरदस्ती खिड़की में घुस हमें छूने का प्रयास कर रही थी तो हमने खिड़की बन्द करना ही उचित समझा। बातों ही बातों में हम पठानकोट पार कर पंजाब की सीमा से बाहर निकल चुके थे। हमारे मोबाईल ने भी सिग्नल पकड़ना बन्द कर दिया था। साम्बा, कठुआ पार कर ट्रेन सुबह 9 बजे जम्मू पहुंच गई। सभी अपने अपने बैग कांधे पर लटकाए ट्रेन से उतरे। रेल्वे स्टेशन पार हम बाहर आए तो कुछ निजि वाहनचालकों ने हमें घेर लिया। दरअसल हमारे कांधे पर लटके बैग उन्हें हमारे अमरनाथ यात्री होने का प्रमाण दे चुके थे। जम्मू से पहलगाम तक छोड़ने के लिए उन्होंने हमें कई प्रलोभन दिए कुछ दिन पूर्व ही हुई घटना से उपजा भय हमें उनके साथ जाने की आज्ञा नहीं दे रहा था सो हमने अमरनाथ श्राईन बोर्ड जाना उचित समझा जो जम्मू के भगवती नगर में स्थित है। श्राईन बोर्ड पहुंच सबसे पहले हाॅल की परची कटवा अपने सामान रखें एवं नहा धो कर सफर की थकान उतारी एवं मोबाईल के लिए अस्थाई सिमकार्ड लिए। यात्रियों के लिए भण्डारे की उत्तम व्यवस्था वहां पहले से ही थी। हमारी बस रात को दो बजे थी सो हमने भोजन करने के बाद जम्मू विचरण का निर्णय लिया। सबसे पहले हम जम्मू के निकट भारत पाकिस्तान सीमा पर गए जहां सैनिक हमें बाॅर्डर के नजदीक ले गए भारत पाकिस्तान की चौकियां यहाँ आमने सामने थी। वहां से पाकिस्तान का सियालकोट महज 11 कि.मी. एवं लाहौर 140 कि. मी. था। बाॅर्डर के नजदीक ही लोग खेती भी करते थे। लौटते हुए जम्मू के रघुनाथ मन्दिर के दर्शन किए। जम्मूं में हमें कुछ भी असुरक्षित महसूस नहीं हुआ। जगह जगह बने मन्दिर जम्मू के ‘‘मन्दिरों का शहर’’ उपनाम को सार्थक कर रहे थे। वापस लौटते हुए हमें शाम हो चुकी थी। श्राईन बोर्ड लौट हमने बस के टिकट लिए। भोजनोपरान्त अपने मोबाईल में 1 बजे का अलार्म लगा सो गए।
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