सफर की थकावट ने हमारी नीन्द को समय पर खुलने नहीं दिया वो तो भला हो श्रीमती जी का जिन्होंने सभी को जगा दिया। हमने उठकर देखा तो घड़ी 1.30 बजा रही थी। फोन का अलार्म भी आम जनता की भांति चिल्ला चिल्ला कर थक चुका था लेकिन हम नेताओं की तरह सो रहे थे। सभी ने तुरन्त उठकर अपने बैग कांधे पर टांगे और बस की ओर भागे। बसें अपने निर्धारित स्थानों पर लग चुकी थी। हम पहुंचे उससे पहले बसों की चैकिंग हो चुकी थी। सुरक्षा व्यवस्था लाजवाब थी। माथे पर काला कपड़ा बांधे, हाथो में गन लिए, बुलेटप्रुफ जैकेट पहने कमाण्डो आतंकवादियों के लिए जल्लाद से कम नहीं थे। तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था देख हम सभी निश्चिंत हो अपनी अपनी सीट पर जा जमे। रात लगभग 2.30 बजे हमारी बस जम्मू से पहलगाम के लिए रवाना हुई। कमाण्डो की दो गाड़ियों हमारे आगे चल रही थी और दो गाड़ियां हमारी बस के पीछे पीछे चल रही थी। जम्मू से पहलगाम की दूरी लगभग 300 किलोमीटर की है और पूरे रास्ते पर सड़क के दोनों तरफ हर 150-200 मीटर पर कमाण्डो सुरक्षा के लिए तैनात था। इतना ही नहीं कुछ मोटरसाईकिल सवार कमाण्डों भी थे जो हमारी बस के साथ साथ चल रहे थे। सुरक्षा व्यवस्था देख हमें सेलिब्रिटी सा अहसास हो रहा था। दरअसल इस सुरक्षा व्यवस्था का कारण भी था। एक दिन पहले ही सुरक्षा एजेन्सियों ने लश्कर कमाण्डर अबु दूजाना को मार गिराया था जिसको लेकर अलगाववादियों ने बंद का आह्वान किया था। और सुरक्षा एजेन्सियां कोई खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी। सफर के दौरान हम 9 कि. मी. लम्बी भारत की सबसे बड़ी टनल से होकर भी गुजरते हैं। जम्मू एवं कश्मीर को जोड़ने वाली 2 कि. मी. लम्बी जवाहर टनल पार करते ही हम कश्मीर में प्रवेश कर लेते हैं। ऐसा महसूस होता है मानो किसी दूसरे देश में ही आ गए। यूं तो कई छोटे मोटै गांव रास्ते में आए लेकिन अनन्तनाग हमें विशेष तौर से याद रहा। क्योंकि अनन्तनाग ने हमारा स्वागत भारत विरोधी नारों से जो किया था। दरअसल कश्मीर बन्द होने की वजह से अनन्तनाग शहर बन्द था। लगभग सभी शटर पर भारत विरोधी नारे जैसे ‘’इण्डिया गो बैक, ‘‘कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है’’ ‘‘आजादी’’ और भी ना जाने क्या - क्या.. आधे से ज्यादा शटर पर दुबारा पुता रंग बता रहा था उस पर भी पहले कुछ लिखा हुआ था। कुछ दुकानों पर अनंतनाग की जगह ‘‘इस्लामाबाद’’ लिख दिया गया। पहली बार ये महसूस किया कि हमारे जवान कितनी विषम परिस्थितियों में ड्यूटी करते हैं। खैर कश्मीर की खूबसूरत वादियों को निहारते निहारते कुल 9 घण्टे के सफर के बाद लगभग 11.30 बजे हम पहलगाम पहुंच चुके थे जो कि पहाड़ियों से गिरी एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। नदियों का कोलाहल अनवरत जारी ही रहता है। पहलगाम उतरते ही सुरक्षा जांच द्वार के उस पार पहुंचे ही थे कि तेज बारीश ने हमारा स्वागत किया। थोड़ी देर पास ही लगे भण्डारे में शरण ली एवं चाय पानी व अल्पाहार ग्रहण किया। यात्रा सुबह शुरू होनी थी सो जाहिर है रात्रि विश्राम के लिए हमें जगह तो चाहिए ही थी। भण्डारे वाला पंजाब से ही था उसने हमारी परेशानी भांप ली और गुरुद्वारे का पता भी दिया कि वहां उत्तम व्यवस्था है। बारीश रूकते ही हम गुरुद्वारे पहुंच गये एवं वहां डेरा डाल लिया। शाम का भोजन गुरुद्वारे में ही किया। सुबह यात्रा भी शुरू करनी थी सो भोजनोपरान्त सो गए।...
Saturday, 26 August 2017
यात्रा वृतान्त..... भाग - 3
सफर की थकावट ने हमारी नीन्द को समय पर खुलने नहीं दिया वो तो भला हो श्रीमती जी का जिन्होंने सभी को जगा दिया। हमने उठकर देखा तो घड़ी 1.30 बजा रही थी। फोन का अलार्म भी आम जनता की भांति चिल्ला चिल्ला कर थक चुका था लेकिन हम नेताओं की तरह सो रहे थे। सभी ने तुरन्त उठकर अपने बैग कांधे पर टांगे और बस की ओर भागे। बसें अपने निर्धारित स्थानों पर लग चुकी थी। हम पहुंचे उससे पहले बसों की चैकिंग हो चुकी थी। सुरक्षा व्यवस्था लाजवाब थी। माथे पर काला कपड़ा बांधे, हाथो में गन लिए, बुलेटप्रुफ जैकेट पहने कमाण्डो आतंकवादियों के लिए जल्लाद से कम नहीं थे। तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था देख हम सभी निश्चिंत हो अपनी अपनी सीट पर जा जमे। रात लगभग 2.30 बजे हमारी बस जम्मू से पहलगाम के लिए रवाना हुई। कमाण्डो की दो गाड़ियों हमारे आगे चल रही थी और दो गाड़ियां हमारी बस के पीछे पीछे चल रही थी। जम्मू से पहलगाम की दूरी लगभग 300 किलोमीटर की है और पूरे रास्ते पर सड़क के दोनों तरफ हर 150-200 मीटर पर कमाण्डो सुरक्षा के लिए तैनात था। इतना ही नहीं कुछ मोटरसाईकिल सवार कमाण्डों भी थे जो हमारी बस के साथ साथ चल रहे थे। सुरक्षा व्यवस्था देख हमें सेलिब्रिटी सा अहसास हो रहा था। दरअसल इस सुरक्षा व्यवस्था का कारण भी था। एक दिन पहले ही सुरक्षा एजेन्सियों ने लश्कर कमाण्डर अबु दूजाना को मार गिराया था जिसको लेकर अलगाववादियों ने बंद का आह्वान किया था। और सुरक्षा एजेन्सियां कोई खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी। सफर के दौरान हम 9 कि. मी. लम्बी भारत की सबसे बड़ी टनल से होकर भी गुजरते हैं। जम्मू एवं कश्मीर को जोड़ने वाली 2 कि. मी. लम्बी जवाहर टनल पार करते ही हम कश्मीर में प्रवेश कर लेते हैं। ऐसा महसूस होता है मानो किसी दूसरे देश में ही आ गए। यूं तो कई छोटे मोटै गांव रास्ते में आए लेकिन अनन्तनाग हमें विशेष तौर से याद रहा। क्योंकि अनन्तनाग ने हमारा स्वागत भारत विरोधी नारों से जो किया था। दरअसल कश्मीर बन्द होने की वजह से अनन्तनाग शहर बन्द था। लगभग सभी शटर पर भारत विरोधी नारे जैसे ‘’इण्डिया गो बैक, ‘‘कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है’’ ‘‘आजादी’’ और भी ना जाने क्या - क्या.. आधे से ज्यादा शटर पर दुबारा पुता रंग बता रहा था उस पर भी पहले कुछ लिखा हुआ था। कुछ दुकानों पर अनंतनाग की जगह ‘‘इस्लामाबाद’’ लिख दिया गया। पहली बार ये महसूस किया कि हमारे जवान कितनी विषम परिस्थितियों में ड्यूटी करते हैं। खैर कश्मीर की खूबसूरत वादियों को निहारते निहारते कुल 9 घण्टे के सफर के बाद लगभग 11.30 बजे हम पहलगाम पहुंच चुके थे जो कि पहाड़ियों से गिरी एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। नदियों का कोलाहल अनवरत जारी ही रहता है। पहलगाम उतरते ही सुरक्षा जांच द्वार के उस पार पहुंचे ही थे कि तेज बारीश ने हमारा स्वागत किया। थोड़ी देर पास ही लगे भण्डारे में शरण ली एवं चाय पानी व अल्पाहार ग्रहण किया। यात्रा सुबह शुरू होनी थी सो जाहिर है रात्रि विश्राम के लिए हमें जगह तो चाहिए ही थी। भण्डारे वाला पंजाब से ही था उसने हमारी परेशानी भांप ली और गुरुद्वारे का पता भी दिया कि वहां उत्तम व्यवस्था है। बारीश रूकते ही हम गुरुद्वारे पहुंच गये एवं वहां डेरा डाल लिया। शाम का भोजन गुरुद्वारे में ही किया। सुबह यात्रा भी शुरू करनी थी सो भोजनोपरान्त सो गए।...
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