सुबह 4 बजे जब हमारी आंख खुली तो हमारे आधे साथी तैयार हो चुके थे। हम बाकि के आधे साथियों में शामिल थे जिन्हें अभी तैयार होना बाकी था। 5 बजे तक सभी सदस्य अन्तिम पड़ाव की ओ कूच करने को तैयार थे। जाने से पहले सभी ने चाय-दूध एवं अल्पाहार लिया एवं पुनः घोड़ों पर बैठ गए। पंजतरणी से गुफा का सफर लगभग 6 कि. मी. है। हेलीकाॅफ्टर भी पंजतरणी से आगे नहीं जाते हैं। ये 6 कि. मी. का सफर पहले के सफर की तुलना में दुर्गम था। एक बात हमने पूरे सफर के दौरान देखी कि जिस दुर्गम जगह पर हम बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते थे वहां पर भी सैनिक अपनी चैकी जमाए हमारी सुरक्षा में पहले से तैनात था। घोड़े की टाप की हर आवाज के साथ दूरी घटती जा रही थी एवं उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लगभग घण्टे भर के सफर के बाद हमें दुर से ही सही गुफा दिखनी शुरू हो गई थी। बर्फ चट्टान को पार कर हम जल्द ही उस ओर पहुंच गए। गुफा से लगभग 2 कि. मी. पहले घोड़े वाले ने हमें उतार दिया। वहां से घोड़ों को आगे प्रवेश की अनुमति नहीं हैं। हमने अपने बैग जमा करवा दिए लेकिन मोबाईल अपने पास ही रखे। गुफा के प्रवेश द्वार पर हमारे मोबाईल भी ले लिए गए क्योंकि गुफा में मोबाईल ले जाने की अनुमति नहीं थी। प्रवेश द्वार से गुफा तक का सफर हमें सीढ़ीयों से तय करना था। मैंने सीढ़ीयां गिनी तो नहीं लेकिन अन्दाजन 800 से 1000 तक सीढीयां तो होंगी ही। हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। थक जाते तो बैठ जाते ... इसी दौरान सामने से दर्शन कर आरे भक्त ‘‘जय भोले’’ का नारा लगाते और हममें एक अदृश्य उत्साह का संचार हो जाता और पुनः खड़े हो जाते। इस प्रकार विश्राम करते - करते आखिरकार गुफा में पहुंच ही गए। गुफा में पहुंचते ही हमारी थकान जाने ऐसे गायब हो गई जैसे कुछ हुआ ही न हो। उस पावन वातावरण को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है। उस आनन्द को शब्दों की सीमा में बांधना भी सम्भव नहीं है। सभी सदस्यों ने बारी - बारी से भोलेनाथ के दर्शन किए। गुफा के दर्शन कर हम वापस नीचे उतरे। अपने - अपने फोन बैग लिए एवं गुफा से घोड़ों की मदद से बालटाल पहुंचे। बालटाल पहुंुचकर तीन दिन में पहली बार हमें चैपहिया व वाहनों के दर्शन हुए। बालटाल से फिर बस की मदद से जम्मू एवं फिर अपने गंतव्य पहुंचे।
पूरी यात्रा के दौरान मेरा अनुभव इस प्रकार रहा: - ऐसी दुर्गम जगह जहां इंसान का तो छोड़ो जानवर का पहुंचना भी बहुत मुश्किल था वहां भक्तों के पहुंचने से पहले ही रहने, खाने, भोजन आदि की व्यवस्था मौजूद थी क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? देखा जाए तो हर जगह व्यवस्था मैं तैनात हमारा भोलेनाथ ही था जिसने सारी व्यवस्थाएं की थी। कुल मिलाकर यात्रा अविस्मरणीय रहेगी। आशा है आपने भी मेरे यात्रा वृतान्त के साथ साथ यात्रा पूरी की होगी। भोलेनाथ सब पर कृपा बनाए रखे
‘‘जय भोलेनाथ’’
No comments:
Post a Comment