31 जुलाई 2017 जब हमें अमरनाथ यात्रा की ओर पहला कदम बढ़ाना था। उत्सुकता इतनी थी कि रात भी लम्बी लगने लग गई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्यनारायण उदय ना होने की कसम खा बैठे हैं। आखिर कार सूर्योदय हुआ। सभी अपनी दैनिक दिनचर्या से निवृत हो तैयार हो चुके थे। ट्रेन अजमेर से 2 बजे थी जो कि हमारे यहां से लगभग 110 कि.मी.. पड़ता है। हमने एहतियातन गाड़ी वाले को 10.30 बजे उपस्थित होने का समय दे रखा था। गाड़ी वाला भी ठीक समय पर उपस्थित हो गया था। हमारे साथ स्थानीय रामद्वारा के संत एवं मेरे गुरुजी ‘‘सोहनरामजी’’ भी थे सो रवाना होने से पहले सभी ने रामद्वारा में ‘‘धोक’’ देना उचित समझा। वहां से आशीर्वाद लेकर गाड़ी तक पहुंचे ही थे कि सामने का दृश्य देखकर चकित रह गये। बैण्ड बाजों के साथ मित्र हमें बस स्टेण्ड तक छोड़ने को तैयार खड़े थे। फूल मालाओं से लादकर बस स्टेण्ड तक हमें गाजे बाजे के साथ विदा किया गया। लगभग डेढ घण्टे के सफर के बाद हम अजमेर रेल्वे स्टेशन पर थे। ट्रेन निर्धारित समय पर प्लेटफार्म पर तैयार थी सो हम भी जाकर तुरन्त अपनी बर्थ पर जम गये। इसी दौरान हमने अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के पटल (वाॅल) पर अमरनाथ यात्रा पर जाने की सूचना डाल दी थी सो मित्रों की शुभकामनाएं भी मिलनी शुरू हो चुकी थी। दोपहर 2 बजे ट्रेन अजमेर से रवाना हुई। ‘‘चाय वाले’’ ‘‘चना मसाला’’ आदि की आवाजें ट्रेन के सफर का आनन्द बढा रही थी। सफर के दौरान बातों का सिलसिला रात को और नजदीक ले आया। दिल्ली से आगे निकलते निकलते निंद्रा रानी नयन नगर में डेरा जमा चुकी थी। हमने भी उसके आगे विवश आंखों की खिड़कियों को बन्द कर लिया था।
..................................शेष. अगले अंक में
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