अक्सर अनजान जगहों नीन्द भी हमारा पूरा साथ नहीं देती सो चार बजे तक पड़े रहने के बाद हमने उठ जाना ही मुनासिब समझा क्योंकि आज पैदल सफर जो शुरू करना था। पहलगाम की गर्मियों की सुबह और हमारे यहां कड़ाके की सर्दियों की सुबह में कोई ज्यादा अन्तर नहीं था। इस सर्दी में हमारे सभी साथी नहा चुके थे और वो भी ठण्डे पानी से क्योंकि वहां गरम पानी की सुविधा न थी। अब हमारा नहाना भी इज्जत का सवाल बन चुका था। आखिरकार 20 मिनट की कड़ी मेहनत व तपस्या से हमने अपने डर पर विजय पाई और ठण्डे पानी से नहा ही लिए। गुरुद्वारे में शीश नवा कर बाहर निकले जहां चन्दनवाड़ी के लिए टैक्सियां पहले से ही मौजूद थी। एक सच्चे मारवाड़ी की तरह टेक्सी वाले से मोलभाव कर टैक्सी में बैठ गए। पहलगाम से चन्दनवाड़ी लगभग 15 कि.मी. है संकरा, घुमावदार व चढ़ाईवाला रास्ता होने के कारण वहां बड़े वाहन नहीं जा पाते। पहाड़ियों के बीच करीब 40 मिनट के रास्ता तय करने के बाद हम चन्दनवाड़ी पहुंच गए। सुरक्षा जांच से गुजरने के बाद भण्डारे में चाय एवं अल्पाहार लिया। वहां से निकलते ही घाड़े वालों ने हमें घेर लिया। पूरे विचार विमर्श के बाद सामान दो घोड़ों पर रख पैदल चलने का निर्णय लिया गया। थोड़ा दूर चलने हमारे कुछ साथियों की हिम्मत जवाब दे गई और वो भी घोड़े पर बैठ गए। हमने अपनी थकान को हावी ना होने देने की बहुत कोशिश की लेकिन पिस्सू टाॅप की आधी चढ़ाई पार करते करते हमारी भी हिम्मत जवाब दे गई सो बाकी की चढ़ाई हमने घोड़े पर ही पूरी की। पिस्सू टाॅप से आगे का रास्ता उतनी चढ़ाई वाला नहीं है सो वहां से हमने पैदल रास्ता तय करने का विचार किया। रास्ते में पड़ने वाले मनोहर दृश्यों को अपने मोबाईल में कैद करते करते चले जा रहे थे। शेषनाग झील से थोड़ा पहले तक सभी थक कर चूर हो चुके थे। सभी की हालत देखते हुए बाकी का पूरा सफर घोड़ों पर ही करने का निश्चय किया। शेषनाग झील, महागुणास टाॅप पार कर शाम के 5 बजे हम अन्तिम पड़ाव पंजतरणी पहुंच चुके थे जहां से गुफा मात्र 6 कि. मी. दूर थी। पहलगाम से पंजतरणी तक हेलीकाॅफ्टर सेवा भी उपलब्ध है जिससे दो दिन के पैदल सफर को मात्र 15 मिनट में पूरा किया जा सकता है। पंजतरणी से यात्रा दूसरे दिन सुबह शुरू होनी थी, भोलेनाथ और हमारे बीच सिर्फ कुछ ही घण्टों का फासला था, भोले के दर्शनों की उत्सुकता नीन्द को नयन द्वार में प्रवेश करने से रोक रही थी, हम भी प्रतीक्षा में थे सूर्याेदय की........
Saturday, 26 August 2017
यात्रा वृतान्त..... भाग - 4
अक्सर अनजान जगहों नीन्द भी हमारा पूरा साथ नहीं देती सो चार बजे तक पड़े रहने के बाद हमने उठ जाना ही मुनासिब समझा क्योंकि आज पैदल सफर जो शुरू करना था। पहलगाम की गर्मियों की सुबह और हमारे यहां कड़ाके की सर्दियों की सुबह में कोई ज्यादा अन्तर नहीं था। इस सर्दी में हमारे सभी साथी नहा चुके थे और वो भी ठण्डे पानी से क्योंकि वहां गरम पानी की सुविधा न थी। अब हमारा नहाना भी इज्जत का सवाल बन चुका था। आखिरकार 20 मिनट की कड़ी मेहनत व तपस्या से हमने अपने डर पर विजय पाई और ठण्डे पानी से नहा ही लिए। गुरुद्वारे में शीश नवा कर बाहर निकले जहां चन्दनवाड़ी के लिए टैक्सियां पहले से ही मौजूद थी। एक सच्चे मारवाड़ी की तरह टेक्सी वाले से मोलभाव कर टैक्सी में बैठ गए। पहलगाम से चन्दनवाड़ी लगभग 15 कि.मी. है संकरा, घुमावदार व चढ़ाईवाला रास्ता होने के कारण वहां बड़े वाहन नहीं जा पाते। पहाड़ियों के बीच करीब 40 मिनट के रास्ता तय करने के बाद हम चन्दनवाड़ी पहुंच गए। सुरक्षा जांच से गुजरने के बाद भण्डारे में चाय एवं अल्पाहार लिया। वहां से निकलते ही घाड़े वालों ने हमें घेर लिया। पूरे विचार विमर्श के बाद सामान दो घोड़ों पर रख पैदल चलने का निर्णय लिया गया। थोड़ा दूर चलने हमारे कुछ साथियों की हिम्मत जवाब दे गई और वो भी घोड़े पर बैठ गए। हमने अपनी थकान को हावी ना होने देने की बहुत कोशिश की लेकिन पिस्सू टाॅप की आधी चढ़ाई पार करते करते हमारी भी हिम्मत जवाब दे गई सो बाकी की चढ़ाई हमने घोड़े पर ही पूरी की। पिस्सू टाॅप से आगे का रास्ता उतनी चढ़ाई वाला नहीं है सो वहां से हमने पैदल रास्ता तय करने का विचार किया। रास्ते में पड़ने वाले मनोहर दृश्यों को अपने मोबाईल में कैद करते करते चले जा रहे थे। शेषनाग झील से थोड़ा पहले तक सभी थक कर चूर हो चुके थे। सभी की हालत देखते हुए बाकी का पूरा सफर घोड़ों पर ही करने का निश्चय किया। शेषनाग झील, महागुणास टाॅप पार कर शाम के 5 बजे हम अन्तिम पड़ाव पंजतरणी पहुंच चुके थे जहां से गुफा मात्र 6 कि. मी. दूर थी। पहलगाम से पंजतरणी तक हेलीकाॅफ्टर सेवा भी उपलब्ध है जिससे दो दिन के पैदल सफर को मात्र 15 मिनट में पूरा किया जा सकता है। पंजतरणी से यात्रा दूसरे दिन सुबह शुरू होनी थी, भोलेनाथ और हमारे बीच सिर्फ कुछ ही घण्टों का फासला था, भोले के दर्शनों की उत्सुकता नीन्द को नयन द्वार में प्रवेश करने से रोक रही थी, हम भी प्रतीक्षा में थे सूर्याेदय की........
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