Tuesday, 18 September 2018

पिताजी की सेवानिवृति के उपलक्ष में


पिताजी की 40 वर्षों की निःस्वार्थ राजकीय सेवा से सेवानिवृति के उपलक्ष में कुछ लाईनें
JUNE 2015

इक दौर खत्म होने को है
इक दौर शुरु हुआ होगा
इक दिन बीता इक सांझ ढली
फिर सूरज उग आया होगा

छोड़ चले जब चार दीवारी
कदम भी ठिठके तो होंगे
कुछ कदम चले भी तो होंगे
कुछ कदम रूके भी तो हांगे

साथियों के पुष्पाहारों ने
सम्मान बढ़ाया भी होगा
देख आत्मीयता के वो पल
गौरव का भान हुआ होगा

अपनों का स्नेह भी तो
हृदय में समाया ना होगा
और स्वजनों के सम्मान से
नेत्रों मे जल आया होगा

इक दौर खत्म होने को है
इक दौर शुरु हुआ होगा
इक दिन बीता इक सांझ ढली
फिर सूरज उग आया होगा

पवन प्रजापति ‘पथिक’

दादीजी की स्मृति में


चन्द लाईनें मेरी स्वर्गीय दादीजी श्रीमती सुन्दर देवी
को श्रद्धांजली स्वरूप समर्पित
आज मैं बताऊं थांने
केड़ी म्हारी धा व्हेती
तावड़ा में तपियोड़ा ने
निम्बड़ा री छींया व्हेती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

रोवता कदेई मैं तो
थपकी दे सुलाय देती
नीन्द नहीं आवती तो
हालरियो हुलराय देती
चिड़ी औेर कागला री
कांणिया सुणाय देती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

मिन्दरां जाती तो धा
म्हाने भी बुलाय लेती
पूजा करती धा म्हाने
टोकरियो पकड़ाय देती
छोटा छोटा हाथां मांही
मकाणा जिलाय देती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

बाल पणे धा म्हाने
लाड घणे लडावती
रोटी मैं नी खावता
भूखी वा रे जावती
म्हाने नीन्द आया बिना
वो खुद सो नी पावती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

आज म्हारी धा री म्हने
याद घणी आवे है
चेहरो सामी आवतां ही
आंखियां भर जावे है
धा म्हारी व्हेती म्हने
गोदियां सुलावती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

Friday, 14 September 2018

हिंदी दिवस

राष्ट्रभाषा हिन्दी को समर्पित

जो इस देश का गौरव है
भारत माता की बिन्दी है
मत समझो केवल भाषा है
वो अपनी माँ हिन्दी है

देश में फैले जन जन को
धागा जोड़े वो हिन्दी है
तुतलाती बोली में बोले
वो पहला अक्षर हिन्दी है

माथे की बिन्दिया हिन्दी है
सर की ये पगड़ी हिन्दी है
गर्व से कहो हम हिन्दी है
हम हिन्दी है हम हिन्दी है

Friday, 7 September 2018

रिश्तों में दरारें

रिश्तों में दरारें आखिर क्यों पड़ती है। क्या कारण है कि बड़े से बड़ा ओहदाधारी अपने निजि रिश्तों में आई दरारों को पाट नहीं पाता है। मानसिक रूप से मजबूत समझे जाने वाले आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को भी हमने रिश्तों में आई दरारों के सामने घुटने टेकते देखे हैं। कई लोग तो अपने निजी रिश्तों में आई दरारों से अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसे घिनौने कृत्य कर बैठते हैं। 
जहां तक मुझे समझ में आता है रिश्तों में दरारों की शुरूआत विचारों के टकरावों से ही होती है। और दरार बढ़ने तब लगती है जब दोनों पक्षों में से कोई भी अपने विचारों को लेकर समर्पण करना नहीं चाहता। दरअसल वो समर्पण करने को अपने अहम का आहत होना मान लेते हैं। हम अगला जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार नहीं पाते हैं। ऐसी घटनाएं भी अधिकतर उच्च शिक्षित वर्ग एवं शहरी परिवेश में रहने वालों में होती है। हालांकि हर बार ऐसा ही हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अधिकांश रिश्तों की जड़ में जाएंगे तो यही समझ में आएगा वो विचारों के टकराव को सम्भाल नहीं पाए। विचारों के टकराव के दौरान स्थिति को सम्भालना सीखें और यदि रिश्तों को बचाने के लिए समर्पण भी करना पड़े तो करें क्योंकि यदि समर्पण करने से रिश्ते बचते हों तो सौदा सस्ता ही मानिए।
वैचारिक मतभेद तो सभी जगह होते हैं लेकिन वैचारिक मतभेद को मनभेद में ना बदलने दें, यही बात रिश्तों की दीवारों को जोड़ने में सीमेंट का काम करेगा।

Tuesday, 4 September 2018

जो रक्त ​है शिराओं में तो खौलता क्यूं नहीं

क्यूं मौन है तू आज कुछ बोलता क्यूं नहीं
ये आज नेत्र है सजल क्यूं अश्रु रोकता नहीं
क्या तुम्हारे धैर्य की कोई सीमा ही नहीं
जो रक्त ​है शिराओं में तो खौलता क्यूं नहीं

स्वरचित

चित्रगुप्त और फेसबुक

चित्रगुप्त हमेशा की तरह मृत्युलोक के लोगों के लेखे जोखे चेक कर रहे थे। आजकल वे भी डिजिटल हो गए हैं और अपने सारे डाटा अपने लेपटॉप में रखते हैं। दो फरियादी उनके सामने लाये जाते हैं नाम हैं रामलाल और श्यामलाल दरअसल यमदूत उनको अभी —अभी उठाकर लाए हैं। सबसे पहले रामलाल को पेश किया जाता है। चित्रगुप्त रामलाल से
''कोई पुण्य का कार्य याद है जो ​तुमने किया हो''
''प्रभु! बहुत सारे पुण्य के काम किए हैं, गायों को चारा डाला है, पैदल तीर्थयात्रियों की सेवा की है, उनके लिए भण्डारे लगाए हैं।''
चित्रगुप्त अपना लेपटॉप चेक करते हुए
''तुम्हारे खाते में ऐसा कोई काम दर्ज नहीं हैं''
रामलाल घबराते हुए बोला
''प्रभु ऐसा कैसे हो सकता है?''
''क्या तुमने सेवा करते हुए अपनी फोटो या सेल्फी फेसबुक पर डाली है?''
रामलाल : ''जी नहीं प्रभु''
​चित्रगुप्त : तभी तुम्हारे पुण्य दर्ज तुम्हारे खाते में दर्ज नहीं हुए, सैनिकों! रामलाल को तुरन्त नर्क भेज दो
श्यामलाल को उसके फेसबुक पर डाली गई फोटो के आधार पर स्वर्ग में एन्ट्री मिल जाती हैचित्रगुप्त और फेसबुक