रिश्तों में दरारें आखिर क्यों पड़ती है। क्या कारण है कि बड़े से बड़ा ओहदाधारी अपने निजि रिश्तों में आई दरारों को पाट नहीं पाता है। मानसिक रूप से मजबूत समझे जाने वाले आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को भी हमने रिश्तों में आई दरारों के सामने घुटने टेकते देखे हैं। कई लोग तो अपने निजी रिश्तों में आई दरारों से अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसे घिनौने कृत्य कर बैठते हैं।
जहां तक मुझे समझ में आता है रिश्तों में दरारों की शुरूआत विचारों के टकरावों से ही होती है। और दरार बढ़ने तब लगती है जब दोनों पक्षों में से कोई भी अपने विचारों को लेकर समर्पण करना नहीं चाहता। दरअसल वो समर्पण करने को अपने अहम का आहत होना मान लेते हैं। हम अगला जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार नहीं पाते हैं। ऐसी घटनाएं भी अधिकतर उच्च शिक्षित वर्ग एवं शहरी परिवेश में रहने वालों में होती है। हालांकि हर बार ऐसा ही हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अधिकांश रिश्तों की जड़ में जाएंगे तो यही समझ में आएगा वो विचारों के टकराव को सम्भाल नहीं पाए। विचारों के टकराव के दौरान स्थिति को सम्भालना सीखें और यदि रिश्तों को बचाने के लिए समर्पण भी करना पड़े तो करें क्योंकि यदि समर्पण करने से रिश्ते बचते हों तो सौदा सस्ता ही मानिए।
वैचारिक मतभेद तो सभी जगह होते हैं लेकिन वैचारिक मतभेद को मनभेद में ना बदलने दें, यही बात रिश्तों की दीवारों को जोड़ने में सीमेंट का काम करेगा।
जहां तक मुझे समझ में आता है रिश्तों में दरारों की शुरूआत विचारों के टकरावों से ही होती है। और दरार बढ़ने तब लगती है जब दोनों पक्षों में से कोई भी अपने विचारों को लेकर समर्पण करना नहीं चाहता। दरअसल वो समर्पण करने को अपने अहम का आहत होना मान लेते हैं। हम अगला जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार नहीं पाते हैं। ऐसी घटनाएं भी अधिकतर उच्च शिक्षित वर्ग एवं शहरी परिवेश में रहने वालों में होती है। हालांकि हर बार ऐसा ही हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अधिकांश रिश्तों की जड़ में जाएंगे तो यही समझ में आएगा वो विचारों के टकराव को सम्भाल नहीं पाए। विचारों के टकराव के दौरान स्थिति को सम्भालना सीखें और यदि रिश्तों को बचाने के लिए समर्पण भी करना पड़े तो करें क्योंकि यदि समर्पण करने से रिश्ते बचते हों तो सौदा सस्ता ही मानिए।
वैचारिक मतभेद तो सभी जगह होते हैं लेकिन वैचारिक मतभेद को मनभेद में ना बदलने दें, यही बात रिश्तों की दीवारों को जोड़ने में सीमेंट का काम करेगा।
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