Thursday, 30 April 2020

लघु कथा : मजदूर दिवस

लघु कथा : मजदूर दिवस
शहर के बिल्कुल पास निर्माणधीन सरकारी कॉलोनी में आज चहल पहल कुछ ज्यादा थी। हमेशा कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर आज अवकाश पर थे। सजे धजे होने के बाद भी उनके चेहरे पर वो तेज न दिखायी पड़ता था जो कड़ी मेहनत के बाद उनके धूल सने चेहरे पर हुआ करता था। आज मजदूर दिवस था और मंत्री महोदय आज मजदूरों से मिलने आ रहे थे। मंत्रीजी के लिये भव्य स्टेज का निर्माण किया जा चुका था। लोग मंत्रीजी के स्वागत के लिये हाथों में फूल मालाएं लेकर खड़े थे। परम्परानुसार मंत्रीजी नियत समय से ठीक 2 घण्टा विलम्ब से समारोह में पहुच गये। लोगों ने मन्त्री महोदय को फूल मालाओं से लाद दिया। मंच पर भव्य स्वागत के पश्चात् मंत्री महोदय ने अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया।
''मेरे मजदूर भाईयों! आप लोग ही देश की असली ताकत हैं। ​आपके योगदान के बिना देश विकास की कभी कल्पना नहीं कर सकता। आज हम देश में चारों ओर शानदार सड़कें, ऊंची — ऊंची ईमारतें, शानदार पुल देख रहे हैं इस चकाचौंध के पीछे आपके मेहनत छिपी है। आप सचमुच महान हैं।''
मंत्री महोदय ने मजदूरों के लिये लम्बा चौड़ा भाषण दिया। मजदूरों के कल्याण के लिये उन्होंन मंच से कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणाएं भी की। मंत्रीजी का भाषण सुन मजदूर भाव विभोर हो उठे। उन्हें लगा कि ये नेताजी सचमुच महान हैं जो उनका उद्धार करने के लिये आयें हैं। भाषण के पश्चात् मंत्रीजी मजदूरों से जाकर मिले एवं उनकी समस्याएं पूछी। इस दौरान दो — चार मजदूर नेता जो अपनी समस्याओं को लेकर मंत्रीजी से मिलने जा रहे थे उन्हें सुरक्षा कारणों से रोक लिया गया। इस बीच मंत्रीजी मजदूरों के साथ फोटो खिंचवाकर उन पर एक और उपकार कर चुके थे।
दूसरे दिन वही फोटो अखबारों में छपी जिसमें लिखा था कि मंत्रीजी ने मजदूरों से मिलकर उनकी समस्याओं का निवारण किया। मजदूरों के लिये की गयी घोषणाओं की सूची मंत्रीजी ने अगले वर्ष 'मजदूर दिवस' के लिये सम्भाल कर रखली । उधर महीने के अन्त में मजदूरों को पता चलता है कि उनकी एक दिन की मजदूरी काट ली गयी थी।

Tuesday, 28 April 2020

प्रेम — गीत

रात भर ही हवा सर्द चलती रही
कोई बाहों में मेरी पिघलती रही
कंपकंपाते थे लब कुछ कह ना सके
आंखे पर रात भर बात करती रही

सांस की डोरियां कुछ यूं गुंथ गयी
जितना सुलझाते हम वो उलझती रही
चुड़ियों की खनक, पायलों की छमक
रात के मौन पर चोट करती रही

मैं था सागर कोई और वो प्यासी नदी
रात भर मुझमें बह बह के मिलती रही
यूं लगा जैंसे बरसों की प्यासी धरा
पर वो बन के घटा बस बरसती रही

Monday, 27 April 2020

लघुकथा : गन्दी नजरें

लघुकथा : गन्दी नजरें
''अरे नेहा! कब तक पड़ी रहोगी, सिर्फ ग्यारह बजे तक की छूट है, फिर दुकानें बन्द हो जाएंगी सामान कैसे लाओगी।'' नेहा को डांटते हुए मॉं ने कहा
नेहा बोली — ''नहीं मॉं मैं नहीं जाउंगी, लोग बहुत गलत तरीके से छूते हैं''
मॉं बोली — ''कैसे छूते हैं, सरकार ने इतनी व्यवस्था कर रखी है, लोग भी इतने दूर — दूर खड़े होते हैं, मैंने खुद देखा है''
नेहा — ''मॉं सरकार की व्यवस्था उनके हाथों को रोक लेती है, लेकिन उनकी गन्दी नजरों का क्या जो मुझे पता नहीं कहां—कहां छूती है''

Saturday, 25 April 2020

लघुकथा : अट्टहास

लघुकथा : अट्टहास

दो साधु अपने हाथों में सनातन धर्म, सनातन संंस्कृति का दीपक लिये चले जा रहे थे। वे जहां से गुजरते अपनी संस्कृति का प्रकाश फैला देते थे। वो संस्कृति जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' में विश्वास रखती है। जो 'सर्वे सन्तु सुखिन:' की कामना करती है। वो संस्कृति जिस पर आघात पर आघात होते रहे लेकिन स्वयं कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। आगे साधु ज्ञान का प्रकाश फैलाते जा रहे थे और उनके पीछे थी उनके अनुयायियों की लम्बी भीड़। सहसा कुछ अधर्मी उन साधुओं का रास्ता रोक लेते हैं। धर्म का प्रकाश अधर्म को कभी रास नहीं आया है। अधर्मियों ने साधुओं का मार्ग अवरूद्ध कर युद्ध की चुनौती दी और उनके साथ घोर युद्ध किया। इस दौरान साधुओं के अनुयायियों की निष्क्रियता बहुत आश्चर्यजनक थी। अनुयायियों की जो भीड़ साधुओं के साथ चल रही थी उनमें से कुछ ही लोग दोनों साधुओं की सहायता के लिये आगे आने का साहस जुटा पाये थे। बाकी मूकदर्शक बने रहे। वीरता से लड़ते लड़ते जब दोनों साधुओं को अपने अन्त समय का अभास हो गया तो अपने पीछे मूक खड़े अनुयायियों की ओर देखा व जोर का अट्टहास किया मानों उन्हें कह रहे हो कि — ''हे मूढ़मतियों! ये आक्रमण हम पर नहीं बल्कि तुम पर हुआ है, तुम्हारी संस्कृति पर हुआ है। और अपनी संस्कृति के विनाश का दृश्य देखकर भी तुम मौन हो, परन्तु याद रखना यह मौन ही तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा।''

साधुओं ने फिर एक बार अट्टहास किया और वीर गति को प्राप्त हो गये।

Wednesday, 15 April 2020

व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट

व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट
राजस्थान में पिछले दिनों एक भयानक घटना घटी। एक सरकारी अध्यापक जरूरतमन्द बच्चों के लिये रखे हुए बिस्कट में से पूरे दो पैकेट बिस्किट खा गया। इतना भयानक घटना होने के बाद हर कोई हैरान था। आखिर शिक्षक को क्या हक था कि वो बिस्किट खा ले। माना कि कोरोना संक्रमण के दौरान शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो बिस्कट खा जायेगा। सब्र का फल मीठा होता है, कई लोग ये खाकर अपना पेट भर ही रहे हैं, वह भी भर लेता, बिस्किट खाने की जरूरत तो न पड़ती।
शिक्षक के बिस्किट के पैकेट खाने से पूरे राज्य में राहत सामग्री का भयंकर अकाल पड़ गया। चारों तरफ बिस्किट की मारामारी होने लगी। लोग भूखों मरने लगे। देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये समाचार कोरोना वायरस की तरह फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ईटली जैसे कई देशों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निन्दा की। हालात इतने भयावह हो गये कि कोरोना वायरस की जगह बिस्किट की कमी को सबसे बड़ी आपत्ति घोषित कर दिया गया। बाजार में अब कहीं बिस्किट देखने को नहीं मिल रहे थे क्योंकि सारे बिस्किट वो 'शिक्षक' खा गया था। शिक्षक के बिस्किट खाने से राज्य की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। आनन फानन में राज्य के मुख्यमंत्री को 'बिस्किट आपदा राहत कोष' के नाम से हजारों करोड़ रूपयों का फण्ड जारी करना पड़ा। सरकार ने अपने खाता नम्बर जारी कर दिये जिसमें लोग 'बिस्किट आपदा' से बचने के लिये भारी मात्रा में सहयोग राशि जमा करवा रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को दरकिनार कर राज्य में बिस्किट की फैक्ट्रियां फिर से शुरू करवा दी गई है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बिस्किट का उत्पादन किया जा सके। इसके अलावा कई दूसरे देशों से भी भारी मात्रा में बिस्किट आयात किया जा रहा है ताकि 'शिक्षक' ने जो बिस्किट खाये थे उसकी कमी पूरी की जा सके। सरकार ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि किसी को भी बिस्किट की कमी से नहीं मरने दिया जायेगा। बिस्किट आपदा से निपटने के बाद कोरोना पर विचार किया जायेगा।

Monday, 13 April 2020

अन्धाधुनिकता

लघुकथा :आधुनिकता से अंधाधुनिकता
धस मोनिका शिक्षिका थी। उनका पालन पोषण शहर में हुआ था। पश्चिमी सभ्यता से बहुत प्रभावित थी। अबकी बार उनका तबादला रामपुर कर दिया गया था जो उनके शहर से काफी दूर था। लिहाजा मिस मोनिका के पास अनमने मन से ही सही रामपुर बसने के सिवाय कोई रास्ता न था। आज वे अपने लिये किराये का घर देखने आई थी। पाश्चात्य परिधान लपेटे मोनिका जब रामपुर पहुंची तो कमोबेश हर किसी की नजर उसी पर थी। मेले या हाट से जो कपड़े छोटे बच्चों के लिये लाते हैं कमोबेश वैसे ही वस्त्रों में युवती को देख लोग भी चकित थे।
बहुत देखने पर मोनिका को एक मकान पसन्द आया। मकान मालकिन रेवती उसे पूरा मकान दिखा रही थी। 'आधुनिकता' की साधक मोनिका को ग्रामीण परिवेश पसन्द नहीं था लेकिन विवशता थी। वे देखते — देखते बातों ही बातों में बोली — ''शहर की आधुनिकता की तुलना में गांवों में कितना पिछड़ा पन है, यहां आधुनिकता को हेय दृष्टि से देखा जाता है, सुन्दरता का कोई मोल नहीं है। अब तुम ही बताओ, सुन्दरता को यदि वस्त्रों से ढक लिया तो भला सुन्दरता का क्या मतलब? यदि ईश्वर ने हमें सौन्दर्य दिया है तो हम क्यों ना दिखाएं।''
मानिका जहां अपनी आधुनिकता का बखान करती जा रही थी वहीं रेवती बिना उत्तर दिये मकान बता रही थी। सहसा रेवती एक दरवाजे के सामने रूकी और बोली —
''मैडम ये आपका बाथरूम है, इसकी खिड़की बाहर की तरफ खुलती है, और हां अपने आप को 'आधनिक' से ' अन्धाधुनिक बचाने के लिये नहाते समय इस खिड़की को जरूर बन्द रखियेगा''

Wednesday, 8 April 2020

ये लॉक-डाउन कभी न खुले

लघु कथा
ये लॉक—डाउन कभी ना खुले

कपिल बालकनी पर खड़ा शहर की सूनी सड़कों को ताक रहा था। कभी न थमने वाले शहर में आज मरघट का सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन भर इन्सानों की चहलकदमी से आबाद रहने वाली सड़कों पर आज कुत्ते निश्चिंत होकर दौड़ रहे थे। आज उन्हें किसी गाड़ी के नीचे कुचले जाने का भय भी न था। लॉक डाउन ने जैसे जीवन की गति को थाम कर रख दिया था। अन्यथा कपिल को इतना समय कहां था। भाग दौड़ भरी जिन्दगी में कपिल को पता ही नहीं चला कि कब उसकी शादी को पांच साल बीत गये। सुबह आॅफिस जाना और देर रात तक लौटना, भोजन करना और सो जाना। सुबह होते ही फिर वही क्रम, कभी — कभी तो उसे लगता कि वो इंसान नहीं बल्कि मशीन बनकर रह गया है। उसने बालकनी ने नजरें हटाकर घर में दौड़ाई। राधा हमेशा की तरह अपने काम में लगी हुई थी। उसके लिये तो लॉकडाउन के कोई मायने ही नहीं थे। शादी से पहले कितना खुश थी वो। कितने सपने देख रखे थे उसने। शिमला — मनाली घूमने का प्लान भी बना रखा था। लेकिन कपिल अपनी व्यस्तता के चलते कभी उसे समय ही नहीं दे पाया। राधा ने भी कभी शिकायत नहीं की। कपिल को याद नहीं कि इन पांच सालों के दौरान वे दोनों कभी प्रेम से बतियाये हों, जैसे वो शा​दी से पहले किया करते थे। वो स्मृतियों से बाहर आया। आज राधा उसे हमेशा से सुन्दर लग रही थी । कपिल न जाने ऐसे कितने पल गंवा चुका था। लेकिन अब वो उसे नहीं गंवाना चाहता था। उसने आगे बढ़कर राधा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया । आँखें — आँखों से टकराई मानों उलाहना दे रही हो कि 'अब तक कहां थे'। कपिल ने राधा को सीने से लगा लिया। राधा मन ही मन सोच रही थी — काश ये 'लॉक—डाउन' कभी ना खुले।