रात भर ही हवा सर्द चलती रही
कोई बाहों में मेरी पिघलती रही
कंपकंपाते थे लब कुछ कह ना सके
आंखे पर रात भर बात करती रही
सांस की डोरियां कुछ यूं गुंथ गयी
जितना सुलझाते हम वो उलझती रही
चुड़ियों की खनक, पायलों की छमक
रात के मौन पर चोट करती रही
मैं था सागर कोई और वो प्यासी नदी
रात भर मुझमें बह बह के मिलती रही
यूं लगा जैंसे बरसों की प्यासी धरा
पर वो बन के घटा बस बरसती रही
कोई बाहों में मेरी पिघलती रही
कंपकंपाते थे लब कुछ कह ना सके
आंखे पर रात भर बात करती रही
सांस की डोरियां कुछ यूं गुंथ गयी
जितना सुलझाते हम वो उलझती रही
चुड़ियों की खनक, पायलों की छमक
रात के मौन पर चोट करती रही
मैं था सागर कोई और वो प्यासी नदी
रात भर मुझमें बह बह के मिलती रही
यूं लगा जैंसे बरसों की प्यासी धरा
पर वो बन के घटा बस बरसती रही
No comments:
Post a Comment