Monday, 27 April 2020

लघुकथा : गन्दी नजरें

लघुकथा : गन्दी नजरें
''अरे नेहा! कब तक पड़ी रहोगी, सिर्फ ग्यारह बजे तक की छूट है, फिर दुकानें बन्द हो जाएंगी सामान कैसे लाओगी।'' नेहा को डांटते हुए मॉं ने कहा
नेहा बोली — ''नहीं मॉं मैं नहीं जाउंगी, लोग बहुत गलत तरीके से छूते हैं''
मॉं बोली — ''कैसे छूते हैं, सरकार ने इतनी व्यवस्था कर रखी है, लोग भी इतने दूर — दूर खड़े होते हैं, मैंने खुद देखा है''
नेहा — ''मॉं सरकार की व्यवस्था उनके हाथों को रोक लेती है, लेकिन उनकी गन्दी नजरों का क्या जो मुझे पता नहीं कहां—कहां छूती है''

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