लघुकथा : अट्टहास
दो साधु अपने हाथों में सनातन धर्म, सनातन संंस्कृति का दीपक लिये चले जा रहे थे। वे जहां से गुजरते अपनी संस्कृति का प्रकाश फैला देते थे। वो संस्कृति जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' में विश्वास रखती है। जो 'सर्वे सन्तु सुखिन:' की कामना करती है। वो संस्कृति जिस पर आघात पर आघात होते रहे लेकिन स्वयं कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। आगे साधु ज्ञान का प्रकाश फैलाते जा रहे थे और उनके पीछे थी उनके अनुयायियों की लम्बी भीड़। सहसा कुछ अधर्मी उन साधुओं का रास्ता रोक लेते हैं। धर्म का प्रकाश अधर्म को कभी रास नहीं आया है। अधर्मियों ने साधुओं का मार्ग अवरूद्ध कर युद्ध की चुनौती दी और उनके साथ घोर युद्ध किया। इस दौरान साधुओं के अनुयायियों की निष्क्रियता बहुत आश्चर्यजनक थी। अनुयायियों की जो भीड़ साधुओं के साथ चल रही थी उनमें से कुछ ही लोग दोनों साधुओं की सहायता के लिये आगे आने का साहस जुटा पाये थे। बाकी मूकदर्शक बने रहे। वीरता से लड़ते लड़ते जब दोनों साधुओं को अपने अन्त समय का अभास हो गया तो अपने पीछे मूक खड़े अनुयायियों की ओर देखा व जोर का अट्टहास किया मानों उन्हें कह रहे हो कि — ''हे मूढ़मतियों! ये आक्रमण हम पर नहीं बल्कि तुम पर हुआ है, तुम्हारी संस्कृति पर हुआ है। और अपनी संस्कृति के विनाश का दृश्य देखकर भी तुम मौन हो, परन्तु याद रखना यह मौन ही तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा।''
साधुओं ने फिर एक बार अट्टहास किया और वीर गति को प्राप्त हो गये।
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