व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट
राजस्थान में पिछले दिनों एक भयानक घटना घटी। एक सरकारी अध्यापक जरूरतमन्द बच्चों के लिये रखे हुए बिस्कट में से पूरे दो पैकेट बिस्किट खा गया। इतना भयानक घटना होने के बाद हर कोई हैरान था। आखिर शिक्षक को क्या हक था कि वो बिस्किट खा ले। माना कि कोरोना संक्रमण के दौरान शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो बिस्कट खा जायेगा। सब्र का फल मीठा होता है, कई लोग ये खाकर अपना पेट भर ही रहे हैं, वह भी भर लेता, बिस्किट खाने की जरूरत तो न पड़ती।
शिक्षक के बिस्किट के पैकेट खाने से पूरे राज्य में राहत सामग्री का भयंकर अकाल पड़ गया। चारों तरफ बिस्किट की मारामारी होने लगी। लोग भूखों मरने लगे। देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये समाचार कोरोना वायरस की तरह फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ईटली जैसे कई देशों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निन्दा की। हालात इतने भयावह हो गये कि कोरोना वायरस की जगह बिस्किट की कमी को सबसे बड़ी आपत्ति घोषित कर दिया गया। बाजार में अब कहीं बिस्किट देखने को नहीं मिल रहे थे क्योंकि सारे बिस्किट वो 'शिक्षक' खा गया था। शिक्षक के बिस्किट खाने से राज्य की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। आनन फानन में राज्य के मुख्यमंत्री को 'बिस्किट आपदा राहत कोष' के नाम से हजारों करोड़ रूपयों का फण्ड जारी करना पड़ा। सरकार ने अपने खाता नम्बर जारी कर दिये जिसमें लोग 'बिस्किट आपदा' से बचने के लिये भारी मात्रा में सहयोग राशि जमा करवा रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को दरकिनार कर राज्य में बिस्किट की फैक्ट्रियां फिर से शुरू करवा दी गई है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बिस्किट का उत्पादन किया जा सके। इसके अलावा कई दूसरे देशों से भी भारी मात्रा में बिस्किट आयात किया जा रहा है ताकि 'शिक्षक' ने जो बिस्किट खाये थे उसकी कमी पूरी की जा सके। सरकार ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि किसी को भी बिस्किट की कमी से नहीं मरने दिया जायेगा। बिस्किट आपदा से निपटने के बाद कोरोना पर विचार किया जायेगा।
राजस्थान में पिछले दिनों एक भयानक घटना घटी। एक सरकारी अध्यापक जरूरतमन्द बच्चों के लिये रखे हुए बिस्कट में से पूरे दो पैकेट बिस्किट खा गया। इतना भयानक घटना होने के बाद हर कोई हैरान था। आखिर शिक्षक को क्या हक था कि वो बिस्किट खा ले। माना कि कोरोना संक्रमण के दौरान शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो बिस्कट खा जायेगा। सब्र का फल मीठा होता है, कई लोग ये खाकर अपना पेट भर ही रहे हैं, वह भी भर लेता, बिस्किट खाने की जरूरत तो न पड़ती।
शिक्षक के बिस्किट के पैकेट खाने से पूरे राज्य में राहत सामग्री का भयंकर अकाल पड़ गया। चारों तरफ बिस्किट की मारामारी होने लगी। लोग भूखों मरने लगे। देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये समाचार कोरोना वायरस की तरह फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ईटली जैसे कई देशों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निन्दा की। हालात इतने भयावह हो गये कि कोरोना वायरस की जगह बिस्किट की कमी को सबसे बड़ी आपत्ति घोषित कर दिया गया। बाजार में अब कहीं बिस्किट देखने को नहीं मिल रहे थे क्योंकि सारे बिस्किट वो 'शिक्षक' खा गया था। शिक्षक के बिस्किट खाने से राज्य की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। आनन फानन में राज्य के मुख्यमंत्री को 'बिस्किट आपदा राहत कोष' के नाम से हजारों करोड़ रूपयों का फण्ड जारी करना पड़ा। सरकार ने अपने खाता नम्बर जारी कर दिये जिसमें लोग 'बिस्किट आपदा' से बचने के लिये भारी मात्रा में सहयोग राशि जमा करवा रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को दरकिनार कर राज्य में बिस्किट की फैक्ट्रियां फिर से शुरू करवा दी गई है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बिस्किट का उत्पादन किया जा सके। इसके अलावा कई दूसरे देशों से भी भारी मात्रा में बिस्किट आयात किया जा रहा है ताकि 'शिक्षक' ने जो बिस्किट खाये थे उसकी कमी पूरी की जा सके। सरकार ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि किसी को भी बिस्किट की कमी से नहीं मरने दिया जायेगा। बिस्किट आपदा से निपटने के बाद कोरोना पर विचार किया जायेगा।
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