नैनों से नैना बतियाये अधर मौन फिर हो गये
मैं उनमें खो बैठी वो भी, मेरे दिल में खो गये
इसके आगे क्या बोलूं मैं, वहीं हुआ जो होना था
प्रेम यज्ञ के हवन कुण्ड में दोनों स्वाहा हो गये
Friday, 27 September 2019
स्वाहा हो गये
Wednesday, 25 September 2019
गा ना सका
दूर कुछ यूं हुआ कि पास आ न सका
तुम थी मंजिल मेरी और मैं पा ना सका
प्रेम धुन पर जिसे गुनगुनाना था मुझे
गीत वो तुम्ही तो थी और मैं गा न सका
चन्द पैसों के लिये, सूकूं गंवा चुका हूं मै
शहर आ गया तो फिर गांव जा ना सका
क्या हुआ जो कामयाबी की मीनार पर खड़ा
कदमों तले अगर तू जमीन पा ना सका
Sunday, 11 August 2019
लघु कथा : लायक और नालायक
लघु कथा : लायक और नालायक
गोरधनलाल के दो लड़के थे — घनश्याम और गिरधारी, घनश्याम शुरु से पढ़ाई में अव्वल था तो गिरधारी के लिये पढ़ाई लिखाई बस की बात न थी। गोरधन शुरु से चाहता था कि उसके दोनों बच्चे अच्छा पढ़ लिख जाये और अच्छी नौकरी पा जायें क्योंकि खेती में तो अब कुछ गुजर बसर होता न था, लेकिन गिरधारी की रूचि पढ़ाई लिखाई में न थी। गोरधन खूब डांटता उसको कई बार तो पिटाई भी की लेकिन पिटाई से भला पढ़ाई कहां आती। गोरधन की नाराजगी का आलम ये था कि वो उसको 'नालायक' कहकर ही पुकारता। घनश्याम को पिता का प्यार मिलता तो गिरधारी को डांट और फटकार। गोरधन पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बन गया, बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी में मैनेजर का पद मिल गया और अब बड़े शहर में रहता है, शहर की ही पढ़ी लिखी लड़की से प्रेम विवाह भी कर लिया है। गिरधारी ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी अब गांव में ही खेती बाड़ी करता है और पशु चराता है।
इन बातों अब काफी समय बीत गया है
गोरधन अब बूढ़ा हो गया है। आजकल बहुत बीमार है और खटिया पकड़ ली है। 'लायक' बेटा घनश्याम शहर में रहता है। वर्ष में एकाध बार आकर मिल जाता है। बड़ी कम्पनी में अफसर है सो ज्यादा समय नहीं मिलता है, वहीं 'नालायक' बेटा गिरधारी खेती का काम भी करता है और पिता की सेवा भी। गोरधन की अनपढ़ पत्नी भी अपने ससुर की पिता समझकर सेवा करती है
कहानी: दरकते रिश्ते
कहानी : दरकते रिश्ते
‘‘कितनी देर तक पढ़ोगे बेटा’’. चाय का ग्लास पकड़ाते हुए रूक्मिणी ने विवेक से पूछा ‘‘माॅं अभी दस बजे हैं, बारह बजे तक तो पढूंगा’’। विवेक रूक्मिणी व राधेश्याम का इकलौता लड़का था। एक लड़की थी जिसका विवाह कर दिया था। अब राधेश्याम का बस एक ही सपना था, किसी तरह विवेक की नौकरी लग जाये तो एक अच्छी सी लड़की देखकर उसका विवाह कर दें। विवेक भी स्नातक की परीक्षा पास कर चुका था। दो - तीन कम्पीटीशन एक्जाम भी दिये लेकिन अभी सफलता हाथ नहीं लगी । कल उसका रेलवे का पेपर है उसी की तैयारी में लगा हुआ था। पढ़ते पढ़ते जब पलकों पर नीन्द का बोझ बढ़ने लगा तो किताबें समेट कर सो गया।
सुबह विवेक को नाश्ता करवाकर रूक्मिणी ने अपने हाथों से दही और गुड़ खिलाया। दरअसल इस ‘अन्धविश्वास ’ में भी एक माँ का ‘विश्वास’ था। माता-पिता को प्रणाम कर विवेक शहर के लिये निकल गया। रूक्मिणी विवेक को दूर तलक जाते हुए देखती रही जब तक कि वो उसकी आंखों से ओझल न हो गया। विवेक के जाने के बाद वो अपने काम में लग गयी। काम करती जाती साथ ही ईश्वर से विवेक की सफलता की प्रार्थना भी।
शाम को विवेक लौटा तो उसका चेहरा खिला हुआ था। घर आते ही मां को बाहों में भरकर झूम उठा ‘‘माँ, आज तो पूछ मत, पेपर इतना शानदार गया कि अबकी बार तेरे बेटे की नौकरी पक्की है।’’ विवेक को इतना खुश देख रूक्मिणी भी प्रसन्न थी और राधेश्याम भी। विवेक को इस बार पूरा विश्वास था कि उसका चयन अवश्य होगा अब उसे इन्तजार था तो परिणाम का।
लगभग महीने भर बाद जब परिणाम आये तो विवेक की आशाओं के अनुरूप ही आये। विवेक का रेलवे में चयन हो गया था। जल्द ही नियुक्ति पत्र भी मिल जायेगा। रूक्मिणी व राधेश्याम की खुशी का पारावार न था। इससे बढ़कर उनके लिये और खुशी क्या बात हो सकती थी। बधाई सन्देश आने लग गये। मित्रों ने राधेश्याम से बेटे की नौकरी की खुशी में स्नेहभोज की मांग की जिसे राधेश्याम ने सहर्ष स्वीकारा भी।
नौकरी लगते ही विवेक के लिये रिश्ते भी आने लग गये। पड़ौस के गांव के रामधनजी की पुत्री लीला से विवेक का विवाह भी तय हो गया। अगले महीने विवेक का विवाह था। विवाह की तैयारियां होने लगी। निमंत्रण पत्र छपवाकर मित्रों व रिश्तेदारों को भेजे गये। घर में नया रंग रोगन हुआ। राधेश्याम विवाह बड़ी धूमधाम से करना चाहते थे जिससे रिश्तेदारों में उनका कद और ऊंचा हो। और करें भी क्यों नहीं इकलौता बेटा वो भी अब सरकारी मुलाजिम था। नियुक्ति पत्र न मिला तो क्या? वो तो आज कल में मिल ही जायेगा। अब किसी बात की चिन्ता न थी। विवाह की भव्यता देख मित्र व रिश्तेदार प्रशंसा करते न थकते थे। राधेश्याम ने जैसा सोचा था वैसे ही ठाट बाट से विवेक का विवाह हुआ और नव वधू का आगमन हो गया।
लीला के आने से घर में रौनक आ गयी थी। रूक्मिणी लीला का माँ की तरह ध्यान रखती। लीला भी सास - ससुर की अपने माता-पिता समझकर सेवा करती। विवेक भी लीला के व्यवहार से प्रसन्न था। इसी दौरान विवेक का नियुक्ति पत्र आ गया । उसे अहमदाबाद में नियुक्ति मिली थी और एक हफ्ते में उसे उपस्थिति देनी थी। नया शहर था सो ये तय हुआ कि विवेक फिलहाल अकेला ही जायेगा। कुछ माह में जब सब व्यवस्थित हो जायेगा और रहने की जगह भी मिल जायेगी तो वो लीला को भी ले जायेगा। नियुक्ति पत्र मिलने के दो दिन बाद ही विवेक अहमदाबाद के लिये निकल गया। वहां अस्थायी रूप से कमरा किराये पर ले लिया। दो महीने में एकाध बार घर आ जाता।
थोड़े दिनों बाद विवेक को सरकार की तरफ से क्वार्टर मिल गया। स्थायी व्यवस्था होते ही विवेक लीला को भी अपने साथ ले गया। अब राधेश्याम व रूक्मिणी फिर से अकेले हो गये। विवेक व लीला महीने भर में एकाध बार आ जाते। राधेश्याम व रूक्मिणी भी अब खुश थे कि चलो उनके बेटे के भविष्य को लेकर अब किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रही।
समय बीतता गया। विवेक शुरूआत में महीने में एकाध बार आने वाला विवेक अब पांच - छह माह में ही आ पाता वो भी रूक्मिणी व राधेश्याम के जोर देने पर। शायद शहर की चकाचैंध छोड़कर गांव जाने का मन अब विवेक का भी नहीं होता था। रूक्मिणी से ज्यादा राधेश्याम को अब घर का सन्नाटा काटने को दौड़ता लेकिन कभी इसे जाहिर नहीं करता। विवेक का आना जाना अब बेहद कम हो गया। कभी कभार फोन पर ही बात होती थी।
इसी दौरान एक दिन विवेक का फोन आया कि राधेश्याम अब दादा बन गया है, उसके पोता हुआ है । राधेश्याम का मुरझाया चेहरा खिल उठा मानों बरसों से प्यासे मरुस्थल पर पहली बार बारीश की बून्दें पड़ी हो। रूक्मिणी व राधेश्याम की खुशी का पारावार न रहा। वे खुश भी क्यों न हो आखिरकार ‘ब्याज हमेशा मूलधन से अधिक प्रिय जो होता है’। रूक्मिणी व राधेश्याम अब दिन भर पोते की ही बातें करते, सपने बुनते, ‘‘लीला कह रही थी कि बिल्कुल अपने पिता पर गया है। पोते का नाम भी रख दिया था ‘वैभव’ ’। राधेश्याम से जब रहा न गया तो एक दिन विवेक से फोन पर कह ही दिया कि वो अहमदाबाद आ जाये क्या? लेकिन विवेक ने ये कहकर मना कर दिया कि लीला की तबियत थोड़ी ठीक हो जाये तो वो खुद ही गांव आ जायेगा।
ऐसे ही छह माह बीत गये, विवेक कभी छुट्टी का बहाना बनाता तो कभी तबियत ठीक नहीं होने का। पोते को देखने की लालसा में राधेश्याम उदास रहने लगा। उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा लेकिन रूक्मिणी ने विवेक को बताना उचित नहीं समझा। दिन - ब - दिन राधेश्याम की तबियत बिगड़ने होने लगी। एक रात राधेश्याम को अचानक खून की उल्टियां होने लगी। पड़ौसियों की मदद से रूक्मिणी राधेश्याम को तुरन्त अस्पताल ले गयी। राधेश्याम को अस्पताल में भर्ती करवाकर विवेक को फोन किया।
पिता की ऐसी हालत सुन विवेक को अपने किये पर बहुत पश्चाताप हुआ, फोन पर रोने लगा उसके बस में होता तो तुरन्त पंख लगाकर अपने पिता के पास पहुंच जाता लेकिन ऐसा सम्भव न था। वो रात की ट्रेन पकड़कर लीला व बच्चे को साथ लेकर गांव के लिये निकल गया। सफर का एक - एक घण्टा उस पर दिन के समान बीतता। दूसरे दिन दोपहर तक वो अपने गांव पहुंच गया । ट्रेन से उतरते ही तुरन्त अस्पताल पहुंचा जहां राधेश्याम भर्ती था।
विवेक व लीला को देखते ही राधेश्याम के उदास चेहरे पर चमक लौट आयी। लगभग निर्जीव पैरों में जान लौट आयी और खड़ा होकर बांहें फैला दी। विवेक ने तुरन्त ‘वैभव’ को राधेश्याम के हाथों में दे दिया और राधेश्याम ने उसे अपने सीने से लगा लिया। चारों की आंखों से आंसूओं की धार बह निकली जिसमें सारे गिले - शिकवे बह गये।
जो काम और डाॅक्टरों की दवाईयां न कर सकी वो काम उस बच्चे के आलिंगन ने कर दिया था।
....समाप्त
Saturday, 10 August 2019
आदमी और कुत्ते
लघु कथा : कुत्ते और आदमी
हमेशा की तरह आज भी अनुपमा कोचिंग क्लास अटेण्ड कर घर के लिये निकल गयी। ये उसका हमेशा का रूटीन था लेकिन आज फर्क ये था कि उसकी सहेली स्नेहा साथ नहीं थी। उसको बुखार था तो आज अनुपमा को अकेले ही आना पड़ा। कुछ देर इन्तजार के बाद उसे बस मिल गयी। बैग कांधे पर टांगे अनुपमा खिड़की के पास वाली एक खाली सीट पर जाकर बैठ गयी। शहर की इमारतों को खिड़की से पीछे भागते देख रही अनुपमा को पता ही नहीं चला कब उसका स्टेशन आ गया। यदि बस का परिचालक ना बताता तो अनुपमा ख्यालों में खोयी आगे ही निकल गयी होती। बस से उतरकर अनुपमा घर की ओर चल दी। स्टेशन से अनुपमा का घर थोड़ी दूर था। गरमी की दोपहरी थी गली भी बिल्कुल सुनसान थी। अनुपमा तेज कदमों से घर की ओर जा ही रही थी कि अचानक एक साया उसका रास्ता रोक लेता है। अनुपमा ने देखा — अरे ये तो चन्दन है, पूरे मोहल्ले में बदनाम है, आज शायद अकेली देखकर उसने अनुपमा का रास्ता रोक लिया। चन्दन अनुपमा से बदतमीजी करने लगता है। अनुपमा उससे मिन्नते करती है लेकिन वो नहीं मानता। चन्दन अनुपमा से बदतमीजी कर ही रहा होता है कि तभी कहीं से दो कुत्ते भौंकते हुए आते हैं जो पता नहीं क्यों चन्दन के पीछे पड़ जाते हैं। कुत्तों को अपने पीछे पड़ा देख चन्दन को वहां से भागना पड़ता है।
अनुपमा अब सुरक्षित थी मन ही मन 'कुत्तों' को धन्यवाद देते हुए घर की ओर चल दी
आखिरकार 'कुत्तों' ने उसे 'आदमी' से बचाया जो था।
Friday, 9 August 2019
लघु कथा : राखी
लघु कथा : राखी
पांच वर्ष की चमकी आज बेहद खुश थी। आज वो पहली बार किसी को राखी बांधने वाली थी वो भी अपने पड़ौस में रहने वाले रघु को । चमकी अपने माता—पिता की इकलौती सन्तान थी। उसका अपना कोई भाई न था। राखी के दिन हर लड़की को राखी बांधते देख उसका भी मन होता था लेकिन अपना कोई भाई नहीं होने के मन मसोस कर रह जाती। इस राखी वो रघु को राखी बांधने की जिद कर बैठी तो मॉं ने भी हां कर दिया। रघु यूं तो 20 बरस का था लेकिन चमकी के लिये हमेशा चॉकलेट, कुरकुरे आईसक्रीम वगैरह लाया करता था । चमकी सुबह तैयार अपनी नई फ्रॉक में राखी ठूंस कर रघु को राखी बांधने चल दी।
चमकी को गये हुए 3 घण्टे से ज्यादा बीत गये थे लेकिन अभी तक लौटी नहीं। चमकी के माता — पिता को चिन्ता होने लगी। दोनों ने पूरा मोहल्ला छान मारा लेकिन चमकी का कहीं कोई पता नहीं चला। रघु की भी कोई खबर न थी। दोनों का रो — रो कर बुरा हाल था। रात बीत गयी लेकिन चमकी नहीं लौटी।
सुबह अखबार के एक कोने में खबर छपी — ''शहर में पांच वर्ष की मासूस की दुष्कर्म के बाद हत्या'' साथ में एक फोटो भी छपी थी जिसमें एक बच्ची के शव पास राखी के टुकड़े बिखरे पड़े थे।
Saturday, 9 February 2019
एक कुत्ते की प्रेमकथा.. भाग — 1
आखिर कई दिनों की मेरी मुराद आज पूरी होने जा रही थी। मेरे सिवा मेरे सभी साथियों को एक - एक कर कोई न कोई ले जा चुका था । ऊपर वाले से मन्नत मांगने की सोची लेकिन पशोपेश में पड़ गया कि मन्दिर जाउं, मस्जिद जाउं या चर्च क्योंकि मुझ पर किसी धर्म का ठप्पा भी नहीं था। फिर सोचा यही बैठकर ही प्रार्थना कर ली जाये हो सकता फरियाद सुन ली जाये। दो दिन बाद जब मुझे लेने के लिये बाकायदा लम्बी सी गाड़ी आयी तो लगा कि फरियाद सुन ली गई है। पेमेन्ट करने के बाद मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया। मैं भी पूंछ हिलाता मालिक के पीछे हो लिया। गाड़ी की गद्देदार सीट पर बैठकर पहली बार लगा कि सच्चे मन से यदि प्रार्थना की जाय तो मन्दिर, मस्जिद या चर्च कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। गाड़ी शहर की व्यस्त सड़कों से होकर गुजर रही थी। एक चौराहे पर सिग्नल देख गाड़ी रूक जाती है। जैसे ही गाड़ी रूकती है, एक भिखारी कटोरा लेकर कार के पिछले दरवाजे की तरफ आता है और हाथ फैलाता है लेकिन कार की शीट पर किसी आदमी की जगह एक कुत्ते को देख मायूस होकर चला जाता है। उसे देख पहली बार मुझे मन ही मन अपने कुत्ता होने पर गर्व महसूस हुआ। चन्द मिनटों के सफर के बाद मैं अपने नये घर पहुंच चुका था। घर पहुंचते ही मेरा शानदार स्वागत हुआ। बच्चे मुझे देखकर बेहद खुश हुए। लगे हाथों मेरा नामकरण भी कर दिया गया.. जॉनी... वाह कितना बेहतरीन नाम था।
थोड़े ही दिनों में मैं परिवार वालों के साथ घुल मिल गया था। सभी का चहेता बन गया था। बच्चों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो चुकी थी। बच्चे सुबह उठते ही मुझे पास के पार्क में घुमाने ले जाते, शाम को आते ही मेरे साथ खेलने लग जाते। किसी तरह की कोई कमी नहीं थी कुल मिलाकर जिन्दगी आराम से कट रही थी और मैं भी ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था।
एक दिन हमेशा की तरह पार्क में टहल रहा था। वैसे तो पार्क में कई कुत्ते-कुतियाएं टहलने के लिए आती थी लेकिन उस दिन एक नई कुतिया पार्क में आई जिसे पहले कभी नहीं देखा था। लम्बे सफेद बाल, बड़ी बड़ी काली आंखें, रेशमी पूंछ कुल मिलाकर वह सबसे अलग नजर आ रही थी। मैंने अपने डॉग फार्म जहां पहले रहता था वहां भी इतनी खूबसूरत कुतिया नहीं देखी थी। मैं एक टक उसे देखे जा रहा था, तभी अचानक बच्चों ने मेरे पट्टे से बंधी रस्सी खींच घर चलने का आदेश दिया। मैंने जाते जाते मुड़कर उसकी ओर देखा, उसने भी मेरी ओर देखा। फिर मैं भारी कदमों से घर की ओर चल दिया।
आज घर में बिल्कुल मन नहीं लगा रहा था। हमेशा स्वादिष्ट लगने वाले पेडिग्री व बिस्किट में भी वो स्वाद नहीं आ रहा था। मन कर रहा था कि भाग कर वापस पार्क में चला जाउं लेकिन अपनी मजबूरियों से बंधा था। आखिर जब बोर हो गया तो ऊपर जाकर बालकनी में बैठ गया। दिमाग में बस उसी कुतिया की तस्वीर घूम रही थी। थोड़ी देर बाद सामने वाले मकान की बालकनी का दरवाजा खुलता है। एक महिला बालकनी में आती है जिसके साथ एक कुतिया होती है। अरे ये क्या ये तो वही कुतिया है जो मुझे पार्क में मिली थी। उसे देखते ही शरीर में स्फूर्ति सी आ गयी। दोनों की नजरें एक दूसरे से टकरायी और पूंछ हिलाकर हम दोनों एक दूसरे का अभिवादन किया......
क्रमश:
Wednesday, 6 February 2019
लघु कथा : भेड़ और इन्सान
शाम का समय था, भेड़ों का झुण्ड घर की ओर लौट रहा था। अपनी आदतानुसार बेफिक्र होकर भेड़ें भी अपने पैरों से धूल उड़ाते हुए एक दूसरे के पीछे चली जा रही थी। यातायात के नियमों को जहां इन्सान भी पालन नहीं करते वहां भेड़ों से इस बात की उम्मीद करना भी बेमानी था। उसी दौरान सामने से एक कार आती है जो भेड़ों के विशाल झुण्ड को देखकर रूक जाती है। कार चालक समझ जाता है कि ये भेड़ें हैं और ये अपने हिसाब से ही चलेंगी इसलिए रूकने में ही फायदा है। चालक कार को एक तरफ पार्क कर भेड़ों के निकलने का इन्तजार करने के लिए खड़ा हो जाता है और अपने साथी से कहता है — ''ये भेड़ें भी ना, बिल्कुल बेवकूफ जानवर है, भला ये भी कोई तरीका है सड़क पर चलने का और वो भी इतने बड़े झुण्ड में, जैसे पूरी सड़क इनके बाप की हो।''
उनकी बात को पास ही चल रही एक भेड़ ने सुन लिया और तपाक से बोली — ''क्यों भाई हम भेड़ों को क्यों कोस रहे हो, हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?''
दोनों आदमी चौंक गये, क्योंकि एक भेड़ से इस प्रकार के उत्तर की आशा उन्हें नहीं थी?
कार चालक बोला — ''कोसें नहीं तो क्या करें, ये भी भला कोई तरीका है झुण्ड में चलने का, यदि तरीका सीखना हो तो हम आदमियों से सीखो, तुम्हारे कारण हम कब से परेशान हैं?''
भेड़ बोली — ''कौनसा तरीका सीखें भाई, हम तो भेड़ें हैं सो भेड़चाल हमारा स्वभाव है! लेकिन तुम तो इन्सान हो, फिर हमारी चाल क्यों चलते हो?''
चालक — ''क्या बकवास कर रही हो''
''और नहीं तो क्या, हम तो भेड़ें हैं इसीलिए झुण्ड में चलती है लेकिन
इतना तो है कि एक झुण्ड में चलती हैं, कभी आपस में लड़ती नहीं है। और तुम इन्सान होकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर जाने कितने झुण्ड बनाकर बैठे हो, जिस तरह हमें हांकने वाला गडरिया है उसी प्रकार तुम्हें भी तो हांकने वाले हैं जो जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर हांकते हैं। बिना कुछ सोचे विचारे तुम उनके कहने पर मरने — मारने पर उतारू हो जाते हो बताओ फिर ये भेड़चाल नहीं तो क्या है?''
दोनों चकित होकर भेड़ को सुने जा रहे थे
''तुम कहते हो इन्सानों से तरीका सीखें, भला बताओ कौनसा तरीका सीखें, आपस में एक दूसरे को मारने का, नफरत फैलाने का, जातियों के आधार पर एक दूसरे से लड़ने का बताओ भला कौनसा तरीका है तुम्हारा जो हम सीखें।''
दोनों निरूत्तर थे
''वो तो तुमने हमारी 'भेड़ जाति' को लेकर ऐसी बात कह दी थी जिससे हमारा स्वाभिमान आहत हो गया इसलिए तुम्हे जवाब देना उचित समझा। हम तो भेड़ें हैं इसलिए हमारी चाल बदलने की उम्मीद मत करना और हो सके तो खुद की चाल बदलने की कोशिश करना''
Thursday, 17 January 2019
विश्वास नहीं होता
विश्वास नहीं होता
यूँ तो इस दिल को कुछ भीअहसास नहीं होता
दुःख भी होता है लेकिन कुछ खास नहीं होता
सूरज पूरब में डूबा ये मान भी लूं लेकिन
तुम मुझसे मुंह मोड़ोगे विश्वास नहीं होता
आभास
तुम्हारे साथ बीता वो हर इक पल खास होता है
हरदम तेरी यादों का वो साया पास होता है
मेरी आँखों से ये आँसूं न जाने क्यूं बरसते हैं
शायद रोती तुम हो पर हमें आभास होता है
Saturday, 12 January 2019
मिट्टी खुशबू भाग 3
कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 3
जमनालाल अब अनमने से रहने लगे। दोनों बेटे देर रात घर आते और सुबह काम पर निकल जाते। आस पड़ौस के तथाकथित सभ्य लोगों के साथ भी जमनालाल अपना तालमेल बिठाने में नाकाम रहे। एक बार जमनालाल जब घर के बाहर बाहर टहल रहे थे तो देखा कि उनके सामने एक कार एक व्यक्ति को टक्कर मारकर चली जाती है। खून से लथपथ व्यक्ति सड़क पर पड़ा तड़प रहा होता है लेकिन आस पास से गुजरने वाले लोग उसे इस तरह अनदेखा कर देते हैं मानों कुछ हुआ ही नहीं हो। जमनालाल दौड़कर वहां जाते हैं लोगों से उस घायल व्यक्ति की मदद की अपील करते हैं लेकिन लोग बजाय उस व्यक्ति की मदद की न सिर्फ जमनालाल का मजाक उड़ाते हैं बल्कि उस व्यक्ति का विडियो बनाने लगते हैं। जमनालाल समझ जाते हैं कि अब उनकी मदद कोई नहीं करेगा। जमनालाल तुरन्त ऑटो करके घायल व्यक्ति को नजदीक के सरकारी अस्पताल में ले जाते हैं। डॉक्टर जमनालाल को धन्यवाद देते हुए कहता है - ‘‘गांव से आए लगते हो बाबाजी वरना इस शहर में तो कोई ऐसे घायल पड़े किसी व्यक्ति को अस्पताल नहीं लाता’’ जमनालाल को डॉक्टर के शब्द अन्दर तक बींध गए। जिस शहर में बसने के लिए जमनालाल ने इतने सपने देखे थे वो शहर ‘दूर का ढोल’ निकलेगा उन्होंने सोचा नहीं था। जमनालाल को अब शहर की चमचमाती सड़कों से गांव की धूल भरी कच्ची सड़कें कहीं बेहतर लग रही थी।
जमनालाल अपनी मानसिक दशा किसी पर जाहिर नहीं होने देना चाहते थे। यहां तक कि अपनी पत्नी पार्वती से भी इस बारे में कभी जिक्र नहीं करते। दरअसल जमनालाल नहीं चाहते थे कि उनके कारण उनके बेटों को कोई कष्ट हो। जमनालाल को शहर की ऊंची ऊंची ईमारतें भी आकर्षित नहीं करती थी। दरअसल जमनालाल ईमारतों के उस पार उस खुले आकाश को देखना चाहते थे जिसे उन ऊंची ऊंची ईमारतों ने ढक रखा था। घर के एयर कंडिशनर भी जमनालाल के भीतर की तपन को बुझा पाने में नाकाफी थे।
जमनालाल का मन अब शहर में नहीं लगता था, बेटों व पत्नी को इस बारे में बताकर कष्ट देना नहीं चाहते थे। ढंग से खाने - पीने का असर धीरे धीरे जमनालाल के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। धीरे धीरे जमनालाल कमजोर पड़ते गए। ढंग से चल फिर नहीं पाने के कारण अब उनका सुबह का सैर सपाटा भी छूट गया। बेटों ने कई बार अस्पताल भी दिखाया लेकिन जमनालाल के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ा। बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाने के बावजूद जमनालाल के स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ बल्कि लगातार कमजोर होते गए। दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते, किसी से अपनी पीड़ा नहीं कहते। पार्वती से जमनालाल की हालत देखी नहीं जाती। पार्वती को कहीं न कहीं जमनालाल की पीड़ा के कारण का आभास हो गया था। शाम को जब रमेश व राजेश काम से लौटे तो पार्वती ने कहा - ‘‘बेटा! मुझे लगता है तुम्हारे पिताजी की बिमारी का ईलाज इस शहर में नही ं बल्कि गांव में है। दरअसल वो इस शहर के वातावरण से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे है। और तुम्हे तकलीफ नहीं हो इस कारण तुम्हे भी नहीं कहते है। एक बार मेरे कहने से उनको गांव ले चलो’’ दोनों बेटों को भी पार्वती की बात जंच गई । रमेश व राजेश ने जमनालाल व पार्वती सहित पूरे परिवार के लिए फ्लाईट के टिकट का इन्तजाम किया। कुछ ही घण्टों के सफर के बाद जमनालाल परिवार सहित नजदीकी शहर के एयरपोर्ट उतर चुके थे। एयरपोर्ट से गांव के लिए गाड़ी किराये पर कर ली। शहर से बाहर निकलते ही जमनालाल के शरीर में एक अलग ही ऊर्जा का संचार दिखाई दिया। अब तब उदास दिखने वाले जमनालाल के चेहरे पर धीरे धीरे चमक लौट रही थी। कोई दो घण्टे के सफर के बाद जमनालाल को गांव के कच्ची ईमारतें दिखने लग गई थी। जमनालाल को लग रहा था मानों बरसों बाद लौटो किसी बेटे के स्वागत में पिता बाहें पसार कर स्वागत में खड़ा हो। गाड़ी ज्यों ज्यों गांव के नजदीक जा रही थी जमनालाल के चेहरे की चमक बढ़ रही थी। दोनों बेटों को भी जमनालाल की बिमारी की वजह पता चल गई थी। कुछ ही देर में गाड़ी जमनालाल के घर के बाहर रूक गई। जिस जमनालाल को दोनों बेटों ने सहारा देकर गाड़ी में बिठाया वो जमनालाल बिना सहारे किसी छोटे बच्चे की तरह गाड़ी उतर अपने घर के दरवाजे की ओर भागे मानों कोई बालक अपनी मां के आंचल में छुपने को मचल रहा हो। जमनालाल ने वहां की मिट्टी को अपने माथे से लगा लिया। जो काम शहर के बड़े से बड़े डॉक्टर न कर से वो काम अपनी मिट्टी की खुशबु ने कर दिया था।
समाप्त
मिट्टी की खुशबू: भाग 2
कहानी : मिट्टी की खुशबू भाग - 2
गाड़ी अपने नियत समय पर थी सो सभी को ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। गाड़ी आते ही सभी अपनी अपनी बर्थ पर जाकर जम गए। गाड़ी जैसे ही स्टेशन छोड़कर रवाना हुई तो एक बारगी जमनालाल को लगा कि कहीं कुछ पीछे छूट रहा है लेकिन अपनी जमीन छोड़ने का गम नई जमीन पर बसने के उत्साह के नीचे दबकर रह गया। खिड़की के पास बैठे जमनालाल खिड़की से पेड़ों को पीछे की तरफ भागते देखते रहे। गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी। चाय, चना मसाला व अन्य सामान बेचने वालों की आवाजें ट्रेन में गूंजनी शुरु हो चुकी थी। जमनालाल भी पत्नी व बच्चों के साथ बातों में लग गए। बातें करते करते कब शाम हो गई पता हीनहीं चला। अन्धेरा अपनी चादर तान चुका था भोजनोपरान्त नीन्द ने भी नयन नगर में अपना डेरा जमा लिया था।
जमनालाल सुबह जल्दी उठ गए आखिर आज वो बैंगलोर पहुंचने वाले थे। चाय वालों का शोर गूंजना शुरू हो गया था। चाय पीकर जमनालाल खिड़की के पास जम गए। कुछ देर में परिवार के बाकी सदस्य भी उठ गए। दैनिक कर्म से निवृत हो सभी अपनी अपनी बर्थ पर जम गए। बातों के सिलसिले ने समय का पता नहीं चलने दिया और शाम होते होते गाड़ी बैंगलोर की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी। स्टेशन पर उतरते ही कुलियों व ऑटो वालों का शोर शुरु हो गया। राजेश उनको रीसीव करने स्टेशन पर पहले से ही खड़ा था। शहर के व्यस्त मार्गों से होते हुए राजेश सभी को घर लेकर आ गया। घर पर राजेश, उसकी पत्नी रेखा व बेटे प्रतीक ने सभी का भावभीना स्वागत किया। जमनालाल व पार्वती अपने बच्चों के इस प्रेम भरे बतार्व से अभिभूत हो गए।
जमनालाल को जल्दी उठकर सैर करने की आदत थी सो तड़के पांच बजे उठकर निकल पड़े। आस - पास की उंची ईमारतों को निहारते जमनालाल मन ही मन खुश हो रहे थे कि चलो गांव की धूल मिट्टी से निजात मिली। यहां तो तड़के भी सड़क पर गाड़ियां दौड़ती है, गांव में एक गाड़ी तक देखने को नहीं मिलती। हालांकि इस दौरान उन्हें हवा में वो ताजगी महसूस नहीं हुई जो गांव में हुआ करती थी लेकिन इन सबको दरकिनार कर जमनालाल सैर करते रहे। वापस आकर नहा धोकर एक घण्टा पूजापाठ करते फिर भोजन करते। कभी बोर होते तो बेटों के साथ दुकान चले जाते। दोनां बेटे भी जमनालाल व पार्वती की सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। कुल मिलाकर जमनालाल को किसी बात की कमी नहीं थी लेकिन इसके बावजूद जमनालाल पता नहीं क्यों इस शहरी जिन्दगी से अपना तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। उन्हें अब सुबह के सैर सपाटे में भी वो आनन्द नहीं रहा। धीरे - धीरे शहरी भागमभाग की जिन्दगी से जमनालाल का मन ऊब गया था। शुरु से गांव के खुले मैदानों में रहे जमनालाल को शहर की तंग गलियों में घुटन होने लगी थी।
क्रमशः
Friday, 11 January 2019
कहानी : मिट्टी की खुशबू
कहानी : मिट्टी की खुशबू
भाग - 1
जमनालाल को रिटायर हुए दो वर्ष हो चुके थे। घर में जमनालाल व पत्नी पार्वती के सिवा कोई था नहीं। रिटायरमेन्ट के बाद जमनालाल को अकेलापन काटने को दौड़ता था। दो बेटे थे रमेश व राजेश, दोनों व्यापार के सिलसिले में बैंगलोर में ही बस गए थे। दोनों बेटों का धन्धा भी अच्छा चल रहा था। लक्ष्मीजी की भरपूर कृपा थी। कमी किसी बात की थी नहीं बस अब ये अकेलापन जमनादासजी को काटने को दौड़ता था। ऐसा नहीं था कि बेटे जमनालाल को अपने साथ नहीं रखना चाहते थे बल्कि उन्होंने तो कई बार आग्रह भी किया था लेकिन जमनालाल अपनी सरकारी नौकरी को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे।
हमेशा बुझे बुझे से रहने वाले जमनालाल आज बहुत खुश थे। उनका बेटा रमेश उन्हें लेने आ रहा था। जमनालाल व पार्वती दोनों ही उत्साहित थे। अब वे भी हमेशा बैंगलोर में रहेंगे, शहर की चमक दमक देखेंगे। आखिर उनके बेटों के शहर में बस जाने के बाद अब उनके लिए गांव में बचा ही क्या था। वैसे भी गांव में कोई सुविधा तो है नहीं, ना सड़क, ना बिजली। पांचवी के बाद पढ़ाई के लिए भी जमनालाल को पास के कस्बे में जाना पड़ा था जिसकी बदौलत ही वो सरकारी मुलाजिम बन सके। पार्वती ने भी रमेश के स्वागत के लिए तैयारियां कर रखी थी, उसकी मनपसन्द खीर, गोभी की सब्जी, पुरियां जो रमेश को पसन्द था सब बनाकर रखा था। जमनालाल की उत्सुकता चरम पर थी। कभी घड़ी की ओर देखते तो कभी दरवाजे की ओर। ये घड़ी भी ना हमेशा तो पांच बहुत जल्दी बजा देती है लेकिन आज जब उनके बेटे को पांच बजे आना है तो जानबूझकर धीरे चल रही है मानो जमनालाल का मुंह चिढ़ा रही हो। पौने पांच बजे जमनालाल कुर्सी लेकर दरवाजे के पास बैठ गए। लगभग आधे घण्टे बाद दूर से उनको गाड़ी आती हुई दिखाई देती है। गांव में वैसे तो कोई आता नहीं सो जमनालाल को पक्का भरोसा हो जाता है कि गाड़ी में उनका बेटा रमेश ही है। जमनालाल स्वागत के लिए बाहर जाते हैं। गाड़ी रूकते ही बेटा रमेश, बहु रमा व पोते-पोती उतरते हैं। सभी एक साथ जब जमनालाल को प्रणाम करने के लिए झुकते हैं तो जमनालाल को लगता है कि वहीं दुनिया के सबसे भाग्यशाली इन्सान हैं। पार्वती भी बेटे, बहु व पोते-पोतियों को देखकर फूली न समाती है।
रमेश को आए दो दिन हो गए थे। रमेश तीन दिन बाद की ही टिकटें कन्फर्म करवाकर आया था सो सभी को सुबह ही निकलना था। जमनालाल व पार्वती ने भी अपना सामान पैक कर लिया था आखिर उनको गांव की धूल - मिट्टी से अब निजात मिलने वाली थी। रेल्वे स्टेशन गांव से 20 किलोमीटर दूर था और 10 बजे की गाड़ी थी। पार्वती व बहु ने सुबह उठकर खाने का सामान पैक कर लिया था। टैक्सीवाला भी निश्चित समय पर आ गया था। जमनालाल व पार्वती हाथों में सामान व आंखों में सपने लिए गाड़ी में बैठ गए। घर को छोड़ते हुए एक बारगी जमनालाल की आंखे नम हो गई। गाड़ी के पिछले शीशे से जमनालाल अपने घर व गाँव को अपनी नजरों से ओझल होते हुए देखते रहे।
