Sunday, 22 December 2013

गले लगाकर छोटे को मैं जाने कब से सोच रही हूं
क्या तुझको महफूज रखूंगी जब मैं खुद महफूज नहीं हूं
मांस नोचती इस दुनिया में क्यूं भेजा था हे विधाता
क्या मैं छोटे को बचाऊं जब मैं खुद ही मर रही हूं
तू तो कहता था दुनिया में औरत पूजी जाती है
फिर चैराहों पे क्यू सीता सावित्री यूं लुटती है
हर इक नजर को जाने क्यूं माँस का टुकड़ा मैं दिखती हूँ
इक दुलार भरी नजर को जाने कब से मैं तरसती हूं
तमाशबीनों की दुनिया में किसको अब आवाज लगाउं
बेशर्मों की भीड़ से कैसे शर्मो हया की आस लगाउं
औरत की अस्मत जो लूटे क्यूं उसको इन्सान कहा है
मेरे जिन्दा जल जाने को जग ने क्यूं बलिदान कहा है
धर्म की मोटी बातें करने वालों को क्यूं लाज ना आए
जिस नारी से पैदा होते उससे भी वो बाज ना आए
विश्व गुरु बनने से पहले बेटी की रक्षा कर लेना
गर जो ऐसा कर ना सको तो शर्म से जाकर डूब मरना

‘पथिक’

Saturday, 21 December 2013

भारत का भविष्य

यद्यपि भारत का सुनहरा भविष्य तो तुमने देखा है
लेकिन यथार्थ से परे कभी इस तस्वीर को देखा है
मैंने सड़कों के किनारे भारत का भविष्य देखा है
कंपकपाती सरदी में नंगे बदन ठिठुरते देखा है
पेट पालने की जुगत में भीख मांगते देखा है
भारत के भविष्य को भूख से दम तोड़ते देखा है
चाय की होटल पर उसको बरतन धोते देखा है
भारत के भविष्य का यूं अपमान होते देखा है
मैंने भारत के भविष्य को जूते माँजते देखा है
कचरे की टोकरी से उसको झूठन खाते देखा है
स्कूलों के बैग टकटकी लगा देखते देखा है
और फिर खुद की हालत पे यूं मन मसोसते देखा है
फटे हुए कपड़ों में उसको बदन छिपाते देखा है
भारत का भविष्य दर-दर ठोकर खाते देखा है
सड़क किनारे बिन चद्दर के रात बिताते देखा है
और कभी गाड़ी की टक्कर से बेमौत मरते देखा है

यद्यपि भारत का सुनहरा भविष्य तो तुमने देखा है
लेकिन यथार्थ से परे कभी इस तस्वीर को देखा है

‘पथिक’

Monday, 4 November 2013

दीवाली पर कुछ लाईनें शहीदों के लिए

दीवाली पर कुछ लाईनें उन शहीदों के लिए जिनके
बलिदानों से ये दीवाली रोशन है

रोशन करके कई चिराग जो निर निद्रा सोया होगा
उस घर में दीवाली पर दीपक भी रोया होगा
मना रहे हैं हम ये खुशिया जिनके बलिदानों से आज
उनके घर में शायद आज मातम सा छाया होगा
बैठी होगी माता उसकी, दरवाजे पे पगलाई सी
हर आहट पे सोचे शायद, बेटा उसका आया होगा
रो -रो के तो पत्नी के अब आंसू सूख गये होंगे
दो दिन से तो शायद उसने खाना ना खाया होगा
मासूमों की आंखों में सवाल तो तैरते होंगे
और माँ से तो शायद कुछ बतलाया ना जाता होगा
दीवाली पर हम दो दीपक उन शहीदों के भी जलाएं
जो चले गये हैं इस दुनिया से, वापिस ना आना होगा

Monday, 7 October 2013

मेरे प्रिय पुत्र ‘जतिन’ को समर्पित

मेरे प्रिय पुत्र ‘जतिन’ को समर्पित

ए मेरे चन्दा तू मुझको इक पल में यूं छोड़ गया रे
जैसे धड़कन ने इस दिल से नाता अपना तोड़ लिया रे
आसमान का चन्दा तो फिरभी आँखों से देख पाता
तू गया कौन से देश रे चन्दा तुझको मैं ना देख पाता
मै करूं लाख कोशिश कि तू मेरी यादों में भी ना आए
लेकिन मासूम सा वो चेहरा फिर आँखों में घूम जाए
काश कि ऐसा होता तू मेरे जीवन में ही ना आता
कम से कम ये दिल तो मेरा इतना दुःख तो ना पाता
जाने क्यूं लगता है है तू पास कहीं है यहीं कहीं है
जबकि मुझको है मालूम तू कहीं नहीं है कहीं नहीं है
तुझको मुस्काते मै देखूं आस दिल ही दिल में रह गई
तू तो चला गया मेरे चन्दा बस कानों में चीखें रह गई
काश जो बस में होता तो मैं पूछता कि हे विधाता
क्या तेरा दिल पत्थर है या तुझे जरा भी तरस न आता
क्या गुनाह था जो मेरे चन्दा का जो तूने इतना तड़पाया
क्या उसकी वो चीखें सुनकर तुझे जरा भी तरस न आया
गर उसको देना था जीवन तो थोड़ी मुस्कान भी देता
गर वो भी थोड़ा हंस लेता तो बता तेरा क्या जाता
है मलाल मुझको कि तू मेरा हाथ थाम के चल ना पाया
तेरे मुंह से कोई किलकारी भी मैंे कभी सुन ना पाया
खुश रहना जिस देश रहो तुम मेरे मन में सदा रहोगे
दुनिया चाहे कुछ भी समझे दिल में मेंरे जिन्दा रहोगे

Wednesday, 19 June 2013

तपती दुपहरी भी ठंडी लागे
ओ सैंया तेरे विरह के आगे
तेरे बिना ओ सैंया नींद न आवे
मैं सोऊं मेरी अंखिया जागे
सूनी सेज मोहे कांटे सी लागे
विरह की अगिनी तन में लागे
भोर भये ओ सैंया सेज टटोलूं
सूनी सेज पाऊं अखियां जो खोलूं
आहट हो कोई तो द्वार पे जाउं 
तू ना मिले तो जैसे मैं मर जाउं
खाना पीना भी सैंया अब नहीं भावे
जब तक तू मोहे खुद ना खिलावे
द्वार पे बैठी बस राह मैं ताकूं
सब दुनिया को मैं पगली लागूं
खत मिले जो तेरा जीय से लगाउं
अपनी पीर तोहे कैसे समझाउं
तपती रेत पे इत-उत डोलूं
जीय की बात मैं किस से बोलूं
तेरे बिना तो अब मैं जी नहीं पाउं
दरस बिना तो तेरे मर नहीं पाउं
अब तो आजा रे सैंया संग मोहे ले जा
या मोहे कोई जहर तू दे जा

पवन प्रजापति पथिक

Sunday, 2 June 2013

क्यूं आज कलम की नोक से मेरी
खून की बून्द टपकती है
ये छोड़ प्रणय के गीतों को
क्यूं अंगारे लिख देती है
इस कलम की हिमाकत तो देखो
जो तान के सीना चलती है
छोटा सा कद है लेकिन
खुद को तलवार समझती है
मैं रोकना चाहूं हाथों को
क्यूं रोक नहीं मैं पाता हूं
मैं लिखना चाहूँ प्रेमिका
क्यूं चण्डिका लिख देता हूं
मदमाता यौवन भूल गया
मैं आग प्रखर लिख देता हूँ
श्रृंगार की भाषा भूल गया
क्यूं तलवारें लिख देता हूँ
क्यूं बाग बहारें लिख ना पाऊँ
रण भूमि लिख देता हूँ
क्यूं गीत प्रेम के ना लिख कर
मैं रण के गीत सुनाता हूँ

पवन प्रजापति ‘पथिक’

Sunday, 28 April 2013

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं

हमारे गांव में अभी हिन्दू-मुसलमानों के दंगे हुए हैं
दंगा पीडि़तों की दशा को बयां करती कुछ लाईनें हैं, अपनी राय जरूर दें

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं
जिन बागों में कभी खेले थे, उनको भी जलते देखे है।
आंखों में बवण्डर देखे हैं, सीने में खंजर देखे हैं
जहां लगते थे बाजार कभी, वहां मौत के मंजर देखे है।
ख्वाबों के आशियाने अपने सामने जलते देखे है।
और अपनों को ही अपने पेट पे लात मारते देखे हैं
जो कहते थे कि साथ देंगे हम किसी भी संकट में
उनके ही हाथों अपने आशियाने उजड़ते देखे हैं
मासूमों की आंखों में अनसुलझे सवाल देखे हैं
जो देखना ना चाहते थें, दंगों में वो सब देखे हैं

हां हमने भी दंगों में सब सपने जलते देखे हैं
जिन बागों में कभी खेले थे, उनको भी जलते देखे है।

पवन प्रजापति ‘पथिक’

Tuesday, 23 April 2013

मैं तेरी प्यारी सी गुडि़या

मैं तेरी प्यारी सी गुडि़या, आँखों का तारा बापू
कितना खुश होते हो तुम, जब स्कूल से आती हूँ बापू
इक रोज जो मैं ना आ पाई तो ढूँढने चल देना बापू
चप्पा-चप्पा, गलियां-गलियां, सब ओर ढूँढ लेना बापू
गर मिले कोई बस्ता जो फटा, जरा ध्यान देना तुम बापू
बदकिस्मती से वो बस्ता, मेरा ही तो नहीं बापू
गर मिले कोई कपड़ा जो फटा, जरा गौर करना तुम बापू
हाथ में लेके देखना चीथड़े, मेरे ही तो नहीं बापू
गर मिले लाश कोई अधनंगी, कुचली-कुचली, रौंदी-रौंदी
जरा दिल पे पत्थर रख लेना वो तेरी गुडि़या तो नहीं बापू
गर जो ऐसा हो जाए मेरी लाश पे ना रोना बापू
मेरी माँ को जरा सम्भाल लेना वो सह ना पाएगी बापू
तुम भैया को समझा देना, कि गुडि़या 
ई है दूर देश
जहां मिलते नहीं कदमों के निशां, कोई लौट के ना आता बापू

मैं तेरी प्यारी सी गुडि़या, आँखों का तारा बापू

पवन प्रजापति ‘पथिक’

Monday, 22 April 2013

मुझे ना आना तेरे देश री मैया


मुझे ना आना तेरे देश री मैया
तेरे देश में डर मुझे लगता है
तेरे देश में पैदा होने से
मर जाना अच्छा लगता है
तेरे देश में इन्सा बसते नहीं
हर नुक्कड़ पे दरिन्दे बसते हैं
और नारी की इज्जत को यहां
सरे आम लूटा करते हैं।
जो तेरे देश मैं आऊँ तो
क्या महफूज मुझे रख पाओगी?
और दरिन्दों के हाथो
लुटने से बचा तुम पाओगी
गर लुटे द्रोपदी एक कोई
तो कृष्ण बचा ले जाएगा
हर नुक्कड़ पे लुटती द्रोपदी है
किस-किस को कृष्ण बचाएगा
मैया तेरे देश में मासूमों को
भी बख्शा नहीं जाता है
और बेशर्मी की हद देखो
उनको भी लूटा जाता है
मैया तेरे देश की हालत पे
सिर शर्म से झुकता जाता है
जहां नारी पूजी जाती है
नारी को लूटा जाता है
मुझे ना आना तेरे देश री मैया
तेरे देश में डर मुझे लगता है
तेरे देश में पैदा होने से
मर जाना अच्छा लगता है

पवन प्रजापति ‘पथिक’
 

Tuesday, 26 March 2013

फिर कलम डूबोकर शोणित में मैं गीत होली के लिखता हूँ ये देश भूलकर रंगों में वो डूबा यौवन लिखता हूँ धूं-धूं कर थी जली होलिका फिर आज याद वो लिखता हूँ पर आज होलिका हंस रही मैं जलता प्रहलाद लिखता हूँ रोता वो हिमालय लिखता हूँ सोती ये जनता लिखता हूँ देख अतीत के गौरव को मैं रोता वर्तमान लिखता हूँ सीता-सावित्री की धरा को लज्जित होते लिखता हूँ जहां नारी पूजी जाती थी वहां नारी को लुटते लिखता हूँ जो देश की खातिर शीश कटे इन्तजार उन्हीं का लिखता हूँ और उन वीरों की माँ के वो पथराये नैना लिखता हूँ राम के ही देश में अब अपमान राम का लिखता हूँ और इतना सबकुछ देख कर खामोश कलम मैं लिखता हूँ पवन प्रजापति ‘पथिक’

Thursday, 14 March 2013


मित्रों होली का त्यौहार आने वाला है। सभी होली का त्यौंहार मनाएंगे लेकिन हमारे कुछ भाई जो सीमा पर देश की रक्षा करते हैं उनकी पत्नियों की होली को दर्शाती कुछ लाईनें प्रस्तुत कर रहा हूं, अपने कमेन्ट जरूर दें
आई आई होली सखी री
तू नाचे पिया संग रंग बरसे
मोरे पिया गये कौन देश
मोहे पिया मिलन को मन तरसे
तोरे पिया ने चुनर रंग डारी
सखी मोरी चुनर रह गई कोरी
जो मोरी चुनर रंग जाती तो
तोरी चुनर रह जाती कोरी
सखी होली का रंग भी तन पे
ना जाने अब क्यूं चढ़ता ही नहीं
और पिया के रंग बिना
कोई रंग दूजा चढ़ता ही
नहीं सखी फागुन का गीत भी जाने
कानों को क्यूं भाता ही नहीं
और पिया पिया के गीता बिना
कोई गीता दूजा आता ही नहीं
सखी मोरे पिया तो भये सिपहिया
जो देश की रक्षा करते हैं
और मोरे पिया के ही कारणे
ये होली का रंग बरसे हैं

पवन प्रजापति 'पथिक'

Thursday, 28 February 2013

माँ मेरी कमजोर मैं


ये कविता एक ऐसे बच्चे के लिए लिखी गई है जो ना
हंस संकता है न बोल सकता है ना बैठ सकता है,
ना उठ सकता है ना चल सकता है ना खा पाता है
जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ
वो अपनी लाचारी अपनी माँ को किन शब्दों में बयां करेगा
वा शब्द मैंने देने की कोशिश की है,
यदि आपके दिल पर चोट करे तो कमेन्ट करें

माँ मेरी कमजोर नहीं पर
हालत से मजबूर हूँ मैं
तुमको क्या मालूम कि दिल से
कितना दुःखी लाचार हूँ मैंु
यूँ पैरो ंपे सबको चलते
देख दुःखी हो जाता हूँ
तेरी अंगुली पकड़ के माँ
क्यूं मैं चल नहीं पाता हूँ
तू मुझे देख मुस्काती है
पर दिल में दर्द छुपाती है
जब मैं मुस्कुरा ना पाता हूँ
तू फिर से दुःखी हो जाती है
माँ मैं तेरी आँखों में देख
तुमसे बतियाना चाहता हूँ
तुम मुझे ढूँढो और मैं
किसी काने में छिप जाना चाहता हूँ
माँ तेरे आँचल की छाया
मैं तो भूला ना पाऊँगा
लेकिन अफसोस की दुःख के सिवा
मैं तुम्हे कुछ दे ना पाऊँगा
काश कि मैं कुछ कह पाता
दुःख अपना तुम्हें बता देता
या फिर बस तो होता तो
ईशारों से ही समझा देता
माँ भैया के अरमानों को
मैं पूरा ना कर पाऊँगा
और उसकी अँगुली पकड़ के कभी
स्कूल नहीं जा पाऊँगा
उम्मीद थी तुमको सुख की मगर
मैं तुम्हे दुःखी कर बैठा माँ
देनी तो थी खुशियां मगर
मैं तुम्हे तकलीफ दे बैठा माँ
अब और तकलीफ न दूँगा माँ
अब तुमसे विदा ले जाऊँगा
लेकिन वादा है जगले जनम
मैं लौट के जल्दी आऊँगा

पवन प्रजापति ‘पथिक’
 

Friday, 22 February 2013

चिर युवा है प्रिये प्रेम

आज जो ये चेहरा तुम्हारा 
फूलों सा है खिला हुआ 
लेकिन समय के साथ 
इसको कल मुरझाना ही होगा 
गालों की लाली जो तेरी 
चहुं ओर रोशनी बिखेर रही 
कल को इस रोशनी में भी 
अंधेरा छाना ही होगा 
नाजुक से ये होठ जो तेरे 
जिस कदर मुस्काते हैं 
कल को इन होठों से भी 
मुस्कान को जाना ही होगा 
कजरारे कजरारे नैनों 
से तुम घायल करती हो 
कल को इन नैनों को भी 
खुद घायल होना ही होगा 
काले काले मेघों को 
लज्जित करते हैं केश आज 
कल को इन केशों को भी 
खुद लज्जित होना ही होगा 
ये रूप रंग मदमाता यौवन 
ये सब कुछ तो नश्वर है 
चिर युवा है प्रिये प्रेम मेरा 
जो सदा अजर और अमर है 

पवन प्रजापति ‘पथिक’

Sunday, 3 February 2013

बेदम सा तन उखड़ी साँसें
प्यासी आँखें मौत तलाशे
सूखीं आंतें मुरझा चेहरा
नंगा बदन बस भरता आहें

लम्हा लम्हा टूटती सांसें
रेत ज्यूं फिसले मुट्ठी से
पल पल बढ़ता घोर अंधेरा
रोशनी अब लाऊं कहां से

हर पल मद्धि़म होती धड़कन
दिल भी अब आराम तलाशे
हर पल दूर भागती जिन्दगी
मौत है अब नजदीक यहां से

भूख के आगे हारी जिन्दगी
मौत का आगोश तलाशे
रह गया अब हड्डियों का ढांचा
जलने को शमशान तलाशे

Monday, 28 January 2013

कैसे लिख दूं


कटे शहीदों के शीश लिख दूं
होती चीख पुकार लिख दूं मातम के माहौल में बोलो केसे प्रणय के गीत लिख दूं नारी की लुटती इज्जत लिखदूं तमाशबीन वो भीड़ लिख दूं बेशर्मी के दौर में बोलो शर्मो हया मैं कैसे लिख दूं विधवाओं की सूनी मांगे लिख दूं राखी ले बैठी बहना लिख दूं पतझड़ के मौसम में बोलो कैसे बहारों के गीत लिख दूं भूखा नंगा बचपन लिख दूं कपड़ों को तरसता तन लिख दूं देख देश की दुर्दशा कैसे भारत महान लिख दूँ
पवन प्रजापति 'पथिक'

Friday, 25 January 2013

चल मुसाफिर चल

चल मुसाफिर चल तेरा सफर हुआ अब पूरा कोई स्वप्न रहा ना अधूरा नहीं दूर अब मंजिल तेरी साँस बंधी जिस डोर वो डोर हुई कमजोर अब रहना ना इक भी पल चल मुसाफिर चल हो पिता पुत्र या भाई ना साथ चलेगा कोई ना आज चले ना कल चल मुसाफिर चल ये जीवन तो है इक डेरा अब दूर देश है बसेरा वो बुला रहा तुझे चल चल मुसाफिर चल बहुत चल चुका अब रूक तू अब चुका है थक अब थकान मिटाले चल चल मुसाफिर चल पवन प्रजापति ‘पथिक’

Saturday, 19 January 2013


कल तक जो दामिनी की खातिर शमा जलाए बैठे थे
वो आज कामिनी की बाहों में होश गंवाए बैठे हैं
क्या हुआ उन अंगारांें का जो सीने में धधका करते थे
वे अंगारे अब ठण्डे होकर क्यूं कोयले बन बैठे हैं
कल तक जो चैराहों पर बेबाक बोला करते थे
आज वे ही अपने होठों पर ताले लगाए बैठे हैं
ए दामिनी तेरा कसूर नहीं, कसूर सिर्फ हमारा है
हम भी जाने किन बुजदिलों से आस लगाए बैठे हैं
पवन प्रजापति ‘पथिक’