Friday, 15 September 2017
चल मुसाफिर चल
इन आँखों की और कोई चाह नही
बन के ख्वाब तू इनमे समाती रहे
बन के बांसुरी होठो को छू के सनम
मेरी सांसो से तू गीत गाती रहे
Thursday, 14 September 2017
ये बता दे रहूँ कैसे मैं होश में
होठ भी हो गए मेरे खामोश से
ये जो नजरें तेरी यूँ हया से झुकी
यूँ लगा कि अभी होश खो देंगे हम
बन के धागा कोई खुद में तुमको सनम
मोतियों की तरह बस पिरो लेंगें हम
Sunday, 10 September 2017
माधवी
लघु कथा
माधवी गुमसुम सी बैठी अतीत की यादों के पन्ने पलट रही थी, पांच साल पहले का वो दृश्य आज भी उसके जेहन में ताजा है जब एक सड़क दुर्घटना में सुनील उसे छोड़ कर चला गया था। माधवी पर तो मानों दुःखों का पहाड़ ही टूट गया था। उनकी शादी को महज 6 साल ही हुए थे। प्रतीक उस समय सिर्फ चार साल का था। माधवी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सुनील इस तरह से उसे छोड़ कर चला जाएगा। उसके जाने के बाद माधवी सिलाई कर अपना गुजारा करती थी। वो इसी उधेड़बुन में खोई हुई ही थी कि घड़ी पर उसकी नजर पड़ी जो साढ़े तीन बजा रही थी। प्रतीक हमेशा तो तीन बजे आ जाता है आज आधा घण्टा ऊपर हो गया। विचारों के सागर में डूबती उतराती माधवी को समय का पता ही नहीं चला। वो दरवाजे की तरफ लपकी। तभी याद आया कि पड़ौस वाले शर्माजी बेटा भी तो प्रतीक के साथ ही पढ़ता है शायद उसके साथ ना चला गया हो। वो तुरन्त शर्माजी के घर की ओर भागी तो पता चला कि उनका बेटे की तबियत ठीक नहीं होने की वजह से वो स्कूल ही नहीं गया। अब तो माधवी का दिल बैठा जा रहा था। सभी पड़ौसियों से पूछ लिया लेकिन प्रतीक का पता नहीं चल रहा था। एक घण्टे से ज्यादा का समय हो गया था और माधवी के दिल में तो बस बुरे ख्याल ही हा रहे थे.‘‘.कहीं प्रतीक भी... नहीं नहीं ...... ऐसा नहीं हो सकता...’’
माधवी प्रतीक को ढूंढती ढूंढती घर की तरफ आई ही थी तभी पीछे से आवाज आई एक आवाज ने उसके कदम रोक दिए. माधवी मुड़ी तो देखा प्रतीक बस्ता लिए हंसता हुआ आ रहा था।
‘‘कहाँ था शैतान मैं कब से तुझे ढूंढ रही हूँ..’’
‘‘माँ.. वो बस स्टेण्ड पर कोई मदारी खेल दिखा रहा था तो मैं खेल देखने रूक गया’’
माधवी ने प्रतीक को अपने आँचल में छिपा लिया.। वो उसे अपने से चिपकाए लगातार रोए जा रही थी और प्रतीक उसके आँसूओं में नहाता हुआ मा़ँ के रोने के कारण को समझने का असफल प्रयास कर रहा था।
Friday, 8 September 2017
मधुर मिलन की रात
जब चांदनी चटक खिली होगी
नदिया इक प्रेम विवश होकर
सागर से जा यूं मिली होगी
सेज पे बैठी गौरी के भी
नयनों में कोई समाया होगा
देख पिया को सम्मुख मन का
भाव आंखों में आया होगा
महेन्दी रचे हाथों में उसने
चेहरा ढांप लिया होगा
शायद सजना के चेहरे के
भावों को भांप लिया होगा।
लज्जा की दीवार सखी री
शायद तब दरक गई होगी
गौरी के कांधे से जब वो
चुनरी सरक गई होगी
हृदय की बातें भी तो सखी
आंखों ने तब बोली होगी
लज्जा से बन्द हुई आँखें
गौरी ने जब खोली होगी
सुन सखी प्रेम के झूलों में
जब वो दोनों झूले होंगे
प्रेम के उन झौंको में वो
सारी दूनिया भूले होंगे
Sunday, 27 August 2017
मैं चला जाउंगा तेरे दर से अभी
तू कह तो सही ये शहर छोड़ दे
इन आंखों को तेरी तलब ही ना हो
गर तू प्यार भरी वो नजर छोड़ दे
मैं पुकारूं जो दिल से तड़प जाए तू
मेरी आंहों में इतना असर छोड़ दे
मैं दीवाना सही विषधर तो नहीं
जो कि पी के सुधा फिर जहर छोड़ दे
स्वरचित
Saturday, 26 August 2017
यात्रा वृतान्त..... अन्तिम भाग
सुबह 4 बजे जब हमारी आंख खुली तो हमारे आधे साथी तैयार हो चुके थे। हम बाकि के आधे साथियों में शामिल थे जिन्हें अभी तैयार होना बाकी था। 5 बजे तक सभी सदस्य अन्तिम पड़ाव की ओ कूच करने को तैयार थे। जाने से पहले सभी ने चाय-दूध एवं अल्पाहार लिया एवं पुनः घोड़ों पर बैठ गए। पंजतरणी से गुफा का सफर लगभग 6 कि. मी. है। हेलीकाॅफ्टर भी पंजतरणी से आगे नहीं जाते हैं। ये 6 कि. मी. का सफर पहले के सफर की तुलना में दुर्गम था। एक बात हमने पूरे सफर के दौरान देखी कि जिस दुर्गम जगह पर हम बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते थे वहां पर भी सैनिक अपनी चैकी जमाए हमारी सुरक्षा में पहले से तैनात था। घोड़े की टाप की हर आवाज के साथ दूरी घटती जा रही थी एवं उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लगभग घण्टे भर के सफर के बाद हमें दुर से ही सही गुफा दिखनी शुरू हो गई थी। बर्फ चट्टान को पार कर हम जल्द ही उस ओर पहुंच गए। गुफा से लगभग 2 कि. मी. पहले घोड़े वाले ने हमें उतार दिया। वहां से घोड़ों को आगे प्रवेश की अनुमति नहीं हैं। हमने अपने बैग जमा करवा दिए लेकिन मोबाईल अपने पास ही रखे। गुफा के प्रवेश द्वार पर हमारे मोबाईल भी ले लिए गए क्योंकि गुफा में मोबाईल ले जाने की अनुमति नहीं थी। प्रवेश द्वार से गुफा तक का सफर हमें सीढ़ीयों से तय करना था। मैंने सीढ़ीयां गिनी तो नहीं लेकिन अन्दाजन 800 से 1000 तक सीढीयां तो होंगी ही। हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। थक जाते तो बैठ जाते ... इसी दौरान सामने से दर्शन कर आरे भक्त ‘‘जय भोले’’ का नारा लगाते और हममें एक अदृश्य उत्साह का संचार हो जाता और पुनः खड़े हो जाते। इस प्रकार विश्राम करते - करते आखिरकार गुफा में पहुंच ही गए। गुफा में पहुंचते ही हमारी थकान जाने ऐसे गायब हो गई जैसे कुछ हुआ ही न हो। उस पावन वातावरण को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है। उस आनन्द को शब्दों की सीमा में बांधना भी सम्भव नहीं है। सभी सदस्यों ने बारी - बारी से भोलेनाथ के दर्शन किए। गुफा के दर्शन कर हम वापस नीचे उतरे। अपने - अपने फोन बैग लिए एवं गुफा से घोड़ों की मदद से बालटाल पहुंचे। बालटाल पहुंुचकर तीन दिन में पहली बार हमें चैपहिया व वाहनों के दर्शन हुए। बालटाल से फिर बस की मदद से जम्मू एवं फिर अपने गंतव्य पहुंचे।
पूरी यात्रा के दौरान मेरा अनुभव इस प्रकार रहा: - ऐसी दुर्गम जगह जहां इंसान का तो छोड़ो जानवर का पहुंचना भी बहुत मुश्किल था वहां भक्तों के पहुंचने से पहले ही रहने, खाने, भोजन आदि की व्यवस्था मौजूद थी क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? देखा जाए तो हर जगह व्यवस्था मैं तैनात हमारा भोलेनाथ ही था जिसने सारी व्यवस्थाएं की थी। कुल मिलाकर यात्रा अविस्मरणीय रहेगी। आशा है आपने भी मेरे यात्रा वृतान्त के साथ साथ यात्रा पूरी की होगी। भोलेनाथ सब पर कृपा बनाए रखे
‘‘जय भोलेनाथ’’
यात्रा वृतान्त..... भाग - 4
अक्सर अनजान जगहों नीन्द भी हमारा पूरा साथ नहीं देती सो चार बजे तक पड़े रहने के बाद हमने उठ जाना ही मुनासिब समझा क्योंकि आज पैदल सफर जो शुरू करना था। पहलगाम की गर्मियों की सुबह और हमारे यहां कड़ाके की सर्दियों की सुबह में कोई ज्यादा अन्तर नहीं था। इस सर्दी में हमारे सभी साथी नहा चुके थे और वो भी ठण्डे पानी से क्योंकि वहां गरम पानी की सुविधा न थी। अब हमारा नहाना भी इज्जत का सवाल बन चुका था। आखिरकार 20 मिनट की कड़ी मेहनत व तपस्या से हमने अपने डर पर विजय पाई और ठण्डे पानी से नहा ही लिए। गुरुद्वारे में शीश नवा कर बाहर निकले जहां चन्दनवाड़ी के लिए टैक्सियां पहले से ही मौजूद थी। एक सच्चे मारवाड़ी की तरह टेक्सी वाले से मोलभाव कर टैक्सी में बैठ गए। पहलगाम से चन्दनवाड़ी लगभग 15 कि.मी. है संकरा, घुमावदार व चढ़ाईवाला रास्ता होने के कारण वहां बड़े वाहन नहीं जा पाते। पहाड़ियों के बीच करीब 40 मिनट के रास्ता तय करने के बाद हम चन्दनवाड़ी पहुंच गए। सुरक्षा जांच से गुजरने के बाद भण्डारे में चाय एवं अल्पाहार लिया। वहां से निकलते ही घाड़े वालों ने हमें घेर लिया। पूरे विचार विमर्श के बाद सामान दो घोड़ों पर रख पैदल चलने का निर्णय लिया गया। थोड़ा दूर चलने हमारे कुछ साथियों की हिम्मत जवाब दे गई और वो भी घोड़े पर बैठ गए। हमने अपनी थकान को हावी ना होने देने की बहुत कोशिश की लेकिन पिस्सू टाॅप की आधी चढ़ाई पार करते करते हमारी भी हिम्मत जवाब दे गई सो बाकी की चढ़ाई हमने घोड़े पर ही पूरी की। पिस्सू टाॅप से आगे का रास्ता उतनी चढ़ाई वाला नहीं है सो वहां से हमने पैदल रास्ता तय करने का विचार किया। रास्ते में पड़ने वाले मनोहर दृश्यों को अपने मोबाईल में कैद करते करते चले जा रहे थे। शेषनाग झील से थोड़ा पहले तक सभी थक कर चूर हो चुके थे। सभी की हालत देखते हुए बाकी का पूरा सफर घोड़ों पर ही करने का निश्चय किया। शेषनाग झील, महागुणास टाॅप पार कर शाम के 5 बजे हम अन्तिम पड़ाव पंजतरणी पहुंच चुके थे जहां से गुफा मात्र 6 कि. मी. दूर थी। पहलगाम से पंजतरणी तक हेलीकाॅफ्टर सेवा भी उपलब्ध है जिससे दो दिन के पैदल सफर को मात्र 15 मिनट में पूरा किया जा सकता है। पंजतरणी से यात्रा दूसरे दिन सुबह शुरू होनी थी, भोलेनाथ और हमारे बीच सिर्फ कुछ ही घण्टों का फासला था, भोले के दर्शनों की उत्सुकता नीन्द को नयन द्वार में प्रवेश करने से रोक रही थी, हम भी प्रतीक्षा में थे सूर्याेदय की........
यात्रा वृतान्त..... भाग - 3
सफर की थकावट ने हमारी नीन्द को समय पर खुलने नहीं दिया वो तो भला हो श्रीमती जी का जिन्होंने सभी को जगा दिया। हमने उठकर देखा तो घड़ी 1.30 बजा रही थी। फोन का अलार्म भी आम जनता की भांति चिल्ला चिल्ला कर थक चुका था लेकिन हम नेताओं की तरह सो रहे थे। सभी ने तुरन्त उठकर अपने बैग कांधे पर टांगे और बस की ओर भागे। बसें अपने निर्धारित स्थानों पर लग चुकी थी। हम पहुंचे उससे पहले बसों की चैकिंग हो चुकी थी। सुरक्षा व्यवस्था लाजवाब थी। माथे पर काला कपड़ा बांधे, हाथो में गन लिए, बुलेटप्रुफ जैकेट पहने कमाण्डो आतंकवादियों के लिए जल्लाद से कम नहीं थे। तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था देख हम सभी निश्चिंत हो अपनी अपनी सीट पर जा जमे। रात लगभग 2.30 बजे हमारी बस जम्मू से पहलगाम के लिए रवाना हुई। कमाण्डो की दो गाड़ियों हमारे आगे चल रही थी और दो गाड़ियां हमारी बस के पीछे पीछे चल रही थी। जम्मू से पहलगाम की दूरी लगभग 300 किलोमीटर की है और पूरे रास्ते पर सड़क के दोनों तरफ हर 150-200 मीटर पर कमाण्डो सुरक्षा के लिए तैनात था। इतना ही नहीं कुछ मोटरसाईकिल सवार कमाण्डों भी थे जो हमारी बस के साथ साथ चल रहे थे। सुरक्षा व्यवस्था देख हमें सेलिब्रिटी सा अहसास हो रहा था। दरअसल इस सुरक्षा व्यवस्था का कारण भी था। एक दिन पहले ही सुरक्षा एजेन्सियों ने लश्कर कमाण्डर अबु दूजाना को मार गिराया था जिसको लेकर अलगाववादियों ने बंद का आह्वान किया था। और सुरक्षा एजेन्सियां कोई खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी। सफर के दौरान हम 9 कि. मी. लम्बी भारत की सबसे बड़ी टनल से होकर भी गुजरते हैं। जम्मू एवं कश्मीर को जोड़ने वाली 2 कि. मी. लम्बी जवाहर टनल पार करते ही हम कश्मीर में प्रवेश कर लेते हैं। ऐसा महसूस होता है मानो किसी दूसरे देश में ही आ गए। यूं तो कई छोटे मोटै गांव रास्ते में आए लेकिन अनन्तनाग हमें विशेष तौर से याद रहा। क्योंकि अनन्तनाग ने हमारा स्वागत भारत विरोधी नारों से जो किया था। दरअसल कश्मीर बन्द होने की वजह से अनन्तनाग शहर बन्द था। लगभग सभी शटर पर भारत विरोधी नारे जैसे ‘’इण्डिया गो बैक, ‘‘कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है’’ ‘‘आजादी’’ और भी ना जाने क्या - क्या.. आधे से ज्यादा शटर पर दुबारा पुता रंग बता रहा था उस पर भी पहले कुछ लिखा हुआ था। कुछ दुकानों पर अनंतनाग की जगह ‘‘इस्लामाबाद’’ लिख दिया गया। पहली बार ये महसूस किया कि हमारे जवान कितनी विषम परिस्थितियों में ड्यूटी करते हैं। खैर कश्मीर की खूबसूरत वादियों को निहारते निहारते कुल 9 घण्टे के सफर के बाद लगभग 11.30 बजे हम पहलगाम पहुंच चुके थे जो कि पहाड़ियों से गिरी एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। नदियों का कोलाहल अनवरत जारी ही रहता है। पहलगाम उतरते ही सुरक्षा जांच द्वार के उस पार पहुंचे ही थे कि तेज बारीश ने हमारा स्वागत किया। थोड़ी देर पास ही लगे भण्डारे में शरण ली एवं चाय पानी व अल्पाहार ग्रहण किया। यात्रा सुबह शुरू होनी थी सो जाहिर है रात्रि विश्राम के लिए हमें जगह तो चाहिए ही थी। भण्डारे वाला पंजाब से ही था उसने हमारी परेशानी भांप ली और गुरुद्वारे का पता भी दिया कि वहां उत्तम व्यवस्था है। बारीश रूकते ही हम गुरुद्वारे पहुंच गये एवं वहां डेरा डाल लिया। शाम का भोजन गुरुद्वारे में ही किया। सुबह यात्रा भी शुरू करनी थी सो भोजनोपरान्त सो गए।...
यात्रा वृतान्त..... भाग - 2
यात्रा वृतान्त..... भाग - 1
31 जुलाई 2017 जब हमें अमरनाथ यात्रा की ओर पहला कदम बढ़ाना था। उत्सुकता इतनी थी कि रात भी लम्बी लगने लग गई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्यनारायण उदय ना होने की कसम खा बैठे हैं। आखिर कार सूर्योदय हुआ। सभी अपनी दैनिक दिनचर्या से निवृत हो तैयार हो चुके थे। ट्रेन अजमेर से 2 बजे थी जो कि हमारे यहां से लगभग 110 कि.मी.. पड़ता है। हमने एहतियातन गाड़ी वाले को 10.30 बजे उपस्थित होने का समय दे रखा था। गाड़ी वाला भी ठीक समय पर उपस्थित हो गया था। हमारे साथ स्थानीय रामद्वारा के संत एवं मेरे गुरुजी ‘‘सोहनरामजी’’ भी थे सो रवाना होने से पहले सभी ने रामद्वारा में ‘‘धोक’’ देना उचित समझा। वहां से आशीर्वाद लेकर गाड़ी तक पहुंचे ही थे कि सामने का दृश्य देखकर चकित रह गये। बैण्ड बाजों के साथ मित्र हमें बस स्टेण्ड तक छोड़ने को तैयार खड़े थे। फूल मालाओं से लादकर बस स्टेण्ड तक हमें गाजे बाजे के साथ विदा किया गया। लगभग डेढ घण्टे के सफर के बाद हम अजमेर रेल्वे स्टेशन पर थे। ट्रेन निर्धारित समय पर प्लेटफार्म पर तैयार थी सो हम भी जाकर तुरन्त अपनी बर्थ पर जम गये। इसी दौरान हमने अपने मुखपुस्तिका (फेसबुक) के पटल (वाॅल) पर अमरनाथ यात्रा पर जाने की सूचना डाल दी थी सो मित्रों की शुभकामनाएं भी मिलनी शुरू हो चुकी थी। दोपहर 2 बजे ट्रेन अजमेर से रवाना हुई। ‘‘चाय वाले’’ ‘‘चना मसाला’’ आदि की आवाजें ट्रेन के सफर का आनन्द बढा रही थी। सफर के दौरान बातों का सिलसिला रात को और नजदीक ले आया। दिल्ली से आगे निकलते निकलते निंद्रा रानी नयन नगर में डेरा जमा चुकी थी। हमने भी उसके आगे विवश आंखों की खिड़कियों को बन्द कर लिया था।
..................................शेष. अगले अंक में
Sunday, 23 July 2017
जरा खुल के इसे उड़ लेने दो
कल को ये परिंदा हो न हो
थक के जरा सो जाओ यहाँ
कल को ये कंधा हो न हो
तस्वीरी खयाल सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है
सखी अबकी सावन वो झूले नहीं है
जहां संग संग हम झूले कभी थे
बुन्दों से भीगी हुई मस्तियों को
बरसों बरस भी हम भूले नहीं हैं
वो नाम ‘उनका’ लेके हमें छेड़ देना
लज्जा से नयने हमने खोले नहीं थे
सखी कहने को तो अब भी है सावन
मगर पहले जैसे वो झूले नहीं हैं
स्वरचित
Sunday, 9 July 2017
चाह न थी
मैंने तुमसे कब प्रश्न किया कि तुम कैसी हो
मेरे मन में जो मूरत थी बस तुम वैसी हो
मैंने कब चाहा मृगनयनी की बाहों का हार मिले
मैंने बस इतना चाहा उसके नयनों में प्यार मिले
नायिका सम रूप रंग हो ऐसी मुझको चाह न थी
मन का रूप सदा चाहा है तन की कभी परवाह न की
उसके प्रेम की बूंदे मुझ पर बनकर बादल यूं बरस पड़े
मानो कोई प्रेम विवश नदिया सागर से मिलन को तरस पड़े
स्वरचित
Wednesday, 28 June 2017
बारिश की बूंदे
धरा पर कुछ यूं बरसे मेघ, हुआ सब पानी पानी है
कहीं रिसती छतें हैं तो, कहीं छत आसमानी है
कहीं कागज की कश्ती संग बहता बचपन नादानी है
और सावन की बून्दोँ संग कहीं खिलती जवानी है
इन सावन की बून्दों की अजब सी ये कहानी है
कहीं ये उम्मीदें है तो कहीं उम्मीदों पर ही पानी है
बरसती है कहीं पर तो ये खुशियों की कहानी है
किसी को आँखों की नमी, इन बून्दों संग छुपानी है
स्वरचित
Thursday, 27 April 2017
छोड़ प्रणय के गीतों को अब रण के गीत सुनाता हूं..
ये बताने का एक छोटा सा प्रयास मेरी ये कविता
गोरी के कजरारे नैना मुझको ना बुलाते हो
मेरा भी तो मन था आलिंगन में उसके सोने का
और नयनों की उन झीलों में डूब के बस खो जाने का
राखी के दिन सूनी कलाई किसको भला सुहाती है
और तुम्हारी तरह बच्चों की याद मुझे भी आती है
माँ के हाथों की वो रोटी मुझको भी तो भाती थी
थपकी देकर गोदी में माँ मुझको भी सुलाती थी
लेकिन उस माता से ज्यादा भारत माता मानी थी
और राष्ट्र की रक्षा हेतु मर मिटने की ठानी थी
छोड़ आया अपनी माता को नयनों में अश्रु धार लिए
मैं सेज सूनी कर आया, बैठी वो हृदय में प्यार लिए
मैं भूला प्रेमिका की छवि, चण्डिका पूजा करता हूं
मैं छोड़ प्रणय के गीतों को अब रण के गीत सुनाता हूं..