कल गली से गुजरते वक्त अचानक किसी ने पीछे से आवाज दी''कहां जा रहे हो'' मैं रूककर पीछे मुड़ा तो कोई नहीं था। जैसे ही वापस घूमा फिर वहीं आवाज आई, लेकिन पीछे कोई नहीं था। इतने में आवाज वापस गूंजती है ''क्या हुआ भूल गए मुझे? मेरे साथ तो तुमने 30 साल गुजारे हैं इतनी जल्दी कैसे भूल गए?'' मेरा पुराना घर ही मुझसे बतिया रहा था। मैं भी तपाक से बोला
''अरे नहीं तुम्हे कैसे भूल सकता हूँ''
''भूले नहीं तो कभी सम्भालने तो नहीं आते। अब आओगे भी क्यूं मैं तुम्हारे नए घर जैसा खूबसूरत जो नहीं हूं'' मुझे उलाहना देते हुए बोला।
''अरे नहीं वो बात नहीं है''
''और नहीं तो क्या बात है? तुम तो नए घर में जाकर सब कुछ भूल गए, क्या तुम्हे मेरे आंगन में खेलना और उधम मचाना भी याद नहीं। छोटे थे तो कितनी बार मेरी दीवारों को अपनी चित्रकारी से गन्दा किया करते थे। तुम्हारे साथ भीगकर मैं भी तो होली खेला करता था, दीवाली मनाया करता था। वो चित्रकारियां, होली, दीवाली मेरे जेहन में अब भी ताजा है, मगर तुम भूल चुके हो, सच में तुम बहुत भुलक्कड़ हो गए हो''
उसके उलाहने जारी थे?
''मैंने सोचा तुम जाते हुए एक बार मुझे मुड़कर तो देखोगे लेकिन तुम तो सच में बहुत निष्ठुर निकले, हमेशा मेरे पास से निकल जाते हो कभी मेरी तरफ देखते तक नहीं''
मैं यादों के दरिया में डूबता उतराता उसके किसी उलाहने का जवाब तक न दे सका। बस वो बोलता गया और मैं नि:शब्द सा बस सुनता गया