Friday, 21 December 2018

धर्मांतरण

धर्मान्तरण पर कुछ लाईनें

वो चाकू की नोंक पर
मजहब बदलवा देते हैं
मैं खामोशी से घर वापसी
करा बैठा तो हंगामा

वो झुठा राम खुदा सच्चा
बताते थे तोे कुछ भी नहीं
मैं बस इक राम को सच्चा
बता बैठा तो हंगामा

भोले भाले नादानों को
वो गुमराह करें सब चुप
मैं गुमराहों को राह पर
ला बैठा तो हंगामा

अपने धर्म की बातें तो
सभी दुनिया में करते हैं
मैं भी अगर वही बातें
कर बैठा तो हंगामा

वो सुबह ओ शाम बातें
करते हैं खून खराबे की
मैं अमन की कोई बात भी
कर बैठा तो हंगामा

‘पथिक’

Tuesday, 27 November 2018

बरखा बहादुर ..... भाग 2

बरखा बहादुर ..... भाग 2
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कहते हैं वक्त से बड़ा कोई मरहम आज तक नहीं बना। ये वो दवा है जो बड़े से बड़े घाव को भर देती है। बरखा के जाने के बाद चम्पा ही उसके जीवन का हिस्सा बन गई थी। बहादुर ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम चम्पा रखा थ। चम्पा के लिए बहादुर ने दूसरी शादी नहीं की। उसके सहारे बहादुर बरखा को भूलने की कोशिश करता। चम्पा थी भी अपने नाम के अनुरुप बिल्कुल कोमल फूल जैसी। बहादुर के लिए चम्पा ही अब जीने का मकसर बद चुकी थी। मजदूरी करना बन्द कर बहादुर ने अब हाथ ठेला लगाना शुरू कर दिया जिस पर वह बच्चों के खिलौने व चौकलेट बेचा करता। चम्पा ठेले पर बैठी उसके पास खेलती रहती। जब थक जाती तो ठेले के नीचे बने कपड़े के अस्थाई झूले में उसे सुला देता। कुल मिलाकर बहादुर उसे मां व बाप दोनों का प्यार देने की पूरी कोशिश करता।
वक्त का पहिया चलता रहा और उसके पहियों से उड़ती धूल बरखा की यादों पर जमती रही। चम्पा अब छः बरस की हो चुकी थी। पास ही के सरकारी स्कूल में बहादुर ने उसका दाखिला करवा दिया था। वह सुबह उसको तैयार कर स्कूल भेजता फिर अपने काम पर जाता। चम्पा के प्रति प्रेम ने बहादुर के स्मृति पटल पर लगी चम्पा की यादों की तस्वीरों को धुन्धला कर दिया था। हां कभी रात को चम्पा के सो जाने के बाद जब एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता तो वह उससे मुंह मोड़कर पुरानी यादों की ओर रूख कर लिया करता।
    समय अपनी गति से चलता रहा। चम्पा अब युवा हो चुकी थी। हूबहू बरखा की तरह लगती थी। चम्पा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही गुणवान भी। वो बहादुर का पूरा ध्यान रखती। एक बार जब बहादुर गम्भीर बिमार पड़ गया तो पूरे तीन दिन तक किसी बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती रही।
कहते हैं कि जब तक पिता कन्या दान ना कर दे तब तक सामाजिक दायित्वों से उऋण नहीं हो सकता। बहादुर को भी यही चिन्ता खाए जा रही थी। उसे अब चम्पा के लिए योग्य वर की तलाश थी जो ‘चन्दन’ के रूप में पूरी हुई। चन्दन पास ही के गांव में रहता था। बहादुर ने थोड़े थोड़े करके जो पैसे बचा कर रखे थे वो चम्पा के विवाह में लगा दिए। चम्पा के जाने के बाद बहादुर अकेला हो गया था।
    घड़ी रात के दो बजा रही थी। बहादुर अतीत से निकल कर वर्तमान में आ चुका था। चम्पा के चले जाने के बाद एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता।  बहादुर की उम्र हालांकि ज्यादा नहीं थी लेकिन जिम्मेदारियों के बोझ से वह वक्त से पहले ही बूढ़ा दिखने लग गया था। अब न उसे खाने की सुधि रहती ना शरीर का ध्यान रहता, नतीजतन वह लगातार बीमार रहने लग गया। चम्पा कभी कभार आकर उसे सम्भाल जाया करती लेकिन वह कभी अपनी हालत को चम्पा के सामने जाहिर नहीं होने देता।  आखिर ऐसा कब तक चलता, एक बार ठेले के पास खड़ा खड़ा गश खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। आस - पड़ौस के लोग उसे जानते थे। तुरन्त अस्पताल लेकर गए और अस्पताल में भर्ती करवा दिया। सबको मालूम था कि चम्पा के सिवा दुनिया में उसका कोई नहीं है सो चम्पा को इतला दी। चम्पा दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची।
बहादुर को बेड पर अचेत पड़ा देख चम्पा की आंखे सजल हो गई। वो पिता जिसने अपनी बेटी के लिए अपना जीवन आहूत कर दिया था आज इस हालत में पड़ा था। चम्पा तीन दिन तक बहादुर की देखभाल करती रही। रात को पलंग के पास फर्श पर लेट जाती, थोड़ी सी आवाज होते ही उठकर उसे सम्भालती। तीन दिन बाद बहादुर की हालत में सुधार हुआ तो वो चम्पा से बोला ‘‘बेटी अब मैं ठीक हूं, तुम अपने घर चली जाओ’’
चम्पा बोली — ‘‘पिताजी मैं आपको ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती, आज से आप मेरे साथ ही रहेंगे। ’’
बहादुर बोला - ‘‘नहीं बेटी, तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, बेटी के घर का तो पानी भी पीना पाप होता है, मैं अब बिल्कुल  ठीक हूँ मेरी चिन्ता मत करो’’
चम्पा ने कहा ‘‘कैसा पाप पिताजी मेरे लिए आपने अपना  जीवन झौंक दिया क्या मेरा आपके प्रति कोई कर्तव्य नहीं, क्या सारे कर्तव्य सिर्फ बेटों के लिए ही है’’
इसी दौरान चन्दन भी वहां पहुंच जाता है
‘‘पिताजी चम्पा ठीक ही तो कह रही है और वैसे भी मैंने बचपन से मां - बाप का प्यार नहीं देखा है, आप साथ रहेंगे तो पिता का स्नेह भी मिल जाएगा, चलिए बाहर गाड़ी आपका इन्तजार कर रही है।’’
बहादुर अब मना करने की स्थिति में नहीं था। चम्पा जैसी पुत्री के लिए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था।
इति

Monday, 26 November 2018

लघु कथा : मासूम सवाल


झौंपड़ी के दरवाजे पर बैठी पांच साल की धनिया कब से मां का इन्तजार कर रही है। 
''हमेशा तो इस वक्त तक मां आ जाती है,। जोरों की भूख लगी है लेकिन मां आएगी तभी तो कुछ खाने को मिलेगा, कुछ ठण्डा बासी भी नहीं है खाने को।''
इतने में सामने से आती हुई रज्जो को देख धनिया अपनी भूख को सांत्वना देती है।
''क्या मां कितनी देर लगा दी, कहां रूक गई थी आज इतनी देर, पता है कब से भूखी बैठी हूं, घर में एक दाना भी नहीं है खाने को।''
''अरे तेरे लिए ही तो रूकी थी, नहीं तो कब की आ जाती''
गठरी खोलती हुई रज्जो बोलती है। धनिया कुछ बोलती इससे पहले ही गठरी में कचौरियां व जलेबी देख आंखों में आश्चर्यमिश्रित चमक आ जाती है
''अरे मां आज कहां से लाई ये सब''
''अभी चुनाव चल रहे हैं ना, एक नेताजी गरीबों को भोजन बांट रहे थे तो ले आई। अभी दस — पन्द्रह दिन तक ये सब चलता रहेगा''
धनिया मासूमियत से पूछ बैठी — ''मां सिर्फ दस — पन्द्रह दिन ही क्यूं, ये चुनाव साल भर क्यूं नहीं चलते''
धनिया के सवाल का रज्जो के पास कोई जवाब नहीं था

Saturday, 24 November 2018

लघुकथा — विचारधारा या व्यक्तिगत स्वार्थ

लघुकथा — विचारधारा या व्यक्तिगत स्वार्थ
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जगन्नाथ प्रसाद अपने क्षेत्र के बहुत बड़े नेता थे। आज उनके घर पर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा था। सफेद पोशाक पहने नेताजी बड़ी सी कुर्सी पर पसरे हुए थे, सामने कार्यकर्ता फर्श पर बैठे थे। नेताजी अपने कार्यकर्ताओं को समझा रहे थे। ''देखो भाईयों पार्टी हमेशा विचारधारा से चलती है, और लड़ाई भी विचारधारा की ही है। अब देखिए विरोधी पार्टी को, उनकी विचारधारा देश के खिलाफ है, अब भला जिस पार्टी की विचारधारा ही देश के खिलाफ हो भला वो पार्टी कभी देश का भला कैसे सोच सकती हैं।'' नेताजी की हर बात बरास्ते कान कार्यकर्ता के मन तक पहुंच रही थी।
''अब जरा अपनी पार्टी को ही देखिए, देश के बारे में सोचती है इसी लिए हम पार्टी के साथ है। आज के समय में देश के बारे में सिर्फ हमारी पार्टी ही सोचती है।'' कार्यकर्ता कृतज्ञ भाव से नेताजी की ओर देख रहे थे और ऐसे नेताजी का अनुसरण कर अपने आपको धन्य समझ रहे थे।
तभी सामने चल रही टीवी पर न्यूज फ्लेश होती है —
'मंत्री जगन्नाथ प्रसाद का टिकट कटा, उनकी जगह नये चेहरे को दिया गया मौका'
''पार्टी ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैंने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है। मैं इसका बदला पार्टी से लेकर रहूंगा''
तभी नेताजी का फोन बज उठता है विरोधी पार्टी का फोन है जो उन्हे अपनी पार्टी की ओर से टिकट देने का प्रस्ताव रखती है। नेताजी के चेहरे पर चमक लौट आती है और तुरन्त तुरन्त अपनी कार लेकर निकल पड़ते हैं।
विचारधारा को व्यक्तिगत स्वार्थ के काले बादलों ने घेर लिया और नेताजी के कार्यकर्ता भी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

Tuesday, 20 November 2018

बरखा बहादुर भाग — 1

बरखा बहादुर 
भाग — 1
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लगभग 10 बाई 10 के कमरे में मरियल सी खाट पर लेटा बहादुर काफी देर से बस पंखे की ओर ही ताके जा रहा था जो मात्र घूमने की औपचारिकता ही पूरी कर रहा था। नीन्द उसकी आंखों से कासों दूर थी। वो तो बस अतीत की गलियों में कहीं खोया हुआ था। उसे अब भी याद है जब वो नेपाल से ब्याह करके अपनी नई नवेली दुल्हन के साथ रामपुर आया था। रात में ‘गोरखे’ का काम करता और दिन में मजदूरी करता। कुल मिलाकर अपनी जिन्दगी से खुश था और संतुष्ट भी। बरखा से ब्याह के बाद तो मानों उसके बरसों से सूखे रेगिस्तान पर पहली बारीश की फुहारें पड़ी थी। कितने खुश थे वे दोनों। ब्याह के दो साल बाद का वो दिन भी उसे याद है जब बरखा ने उसे बताया कि वो पिता बनने वाला है। कितना खुश हुआ था वो उस दिन और हो भी क्यूं नहीं, आखिर उन दोनों का प्यार अब आकार ले रहा था। बहादुर अब बरखा का खूब ध्यान रखता, थोड़ा सा भी वजन उठा लेने पर बरखा को बच्चों की भांति डांट दिया करता। बरखा को भी डांट में आनन्द आता और आता क्यूं नहीं डांट में प्रेम और उसके प्रति चिन्ता मिली हुई थी।
यादों की गलियों में टहलते टहलते बहादुर उस वक्त में पहुंच गया जब बरखा प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। वह अस्पताल में प्रसूति कक्ष के बाहर बैठा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। बरखा की चीखें उसके कानों के रास्ते से होकर उसके दिल तक को बींध रही थी। प्रसव पीड़ा से अधिक पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता या यूं कहें कि प्रसव के बाद नारी का दूसरा जन्म होता है। लेकिन हाय री किस्मत, बरखा ये दूसरा जन्म नहीं ले पाई। फूल सी बच्ची के रूप में खुद को बहादुर के पास छोड़ बरखा हमेशा के लिए विदा हो गई। बहादुर कुछ समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उम्मीदों की नींव पर सपनों की जो ईमारत खड़ी की थी वो यूं ढह जाएगी। वक्त ने एक ही झटके में बहादुर की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। वो तय नहीं कर पा रहा था कि बच्ची को लेकर खुश हो या बरखा जाने का मातम मनाए... 
क्रमश:.......

Tuesday, 13 November 2018

चुनावी राजनीति पर एक कटाक्ष


छलने सिया फिर साधु भेष वाले आ गए
भूखों की थालियों में फिर निवाले आ गए
कल था सशस्त्र आज वो करबद्ध क्यूं खड़ा
लगता है फिर से दिन चुनाव वाले आ गए

Saturday, 10 November 2018

वो बचपन की दीवाली

वो बचपन की दीवाली
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ये भी कोई दीपावली है, दीपावली तो तब थी जब हम छोटे हुआ करते थे। सरकारी स्कूल में पढ़ते थे लिहाजा दीपावली की छुट्टियां भरपूर मिला करती थी। दिन भर की खेलकूद के बाद इन्तजार रहता था पटाखों का। शामको जब पिताजी थैले में भर के पटाखे लाते थे तो मानों बरसों से तपस्या में लीन ध्रुव को ईश्वर प्राप्ति हो गई हो। लक्ष्मी पूजन के दौरान पिताजी का ध्यान पूजा में रहता और हम सभी भाईयों का पटाखों की थैली में। पूजा के पश्चात सभी को बराबर बराबर बांटकर पटाखे दिये जाते, तब आज की तरह पटाखे फोड़ने पर किसी की काली नजर नहीं लगी थी (इसे सुप्रीम कोर्ट से जोड़कर ना देखें) देर रात तक पटाखे फोड़ने के बाद भी सुबह जल्दी नहा धोकर तैयार हो जाते। नए कपड़े जो पहनने का शौक था। जो सेलिब्रिटि फिलिंग उन कपड़ों में आती थी कसम से आज के महंगे से महंगे कपड़ों में नहीं आती है। नए कपड़े पहनकर बाहर दोस्तों को दिखाते और एक दूसरे के कपड़ों की तारीफ करते । जेब में थैली खोंसकर निकल पड़ते मोहल्ले में ''रामा—श्यामा'' करने तब हम ये नहीं देखते कि फलां व्यक्ति हमारी जान पहचान का है या नहीं या वो हमारे घर आए तो हम उसके घर जाएंगे। जो भी घर देखा बच्चों की टोली घुस जाती उस घर में। वो लोग हमें निराश भी नहीं करते। मोहल्ले में कुछ मुस्लिमों के घर भी थे लेकिन तब सोशल मीडिया नहीं था लिहाजा हिन्दु — मुसलमान का इतना लफड़ा नहीं था। दीपावली को वो भी हमारे लिए मिठाई बताशे रखते थे। घर लौटते लौटते मिठाई, बताशे इत्यादि से थैली पूरी भर जाया करती। फिर आपस में तुलना करते कि किसकी थैली ज्यादा भरी है।

Thursday, 25 October 2018

क्या नाम दूं

अच्छा एक बात तो बताओ !

तुम तो कहती थी 
कि तुम्हे 
पहली नजर में ही 
मुझसे प्रेम हो गया था
गर वो प्रेम था 
तो फिर 
ये जो तुम 
मेरे मांगने से पहले ही 
मेरे हाथ में 
चश्मा पकड़ा देती हो,
मेरे खड़ा होने से पहले ही 
हाथ में छड़ी थमा देती हो
मेरे दवाई लेना भूल जाने पर
बच्चों की तरह 
डांट दिया करती हो
सुबह से शाम तक 
मेरी बकवास में भी 
हां में हां मिलाती रहती हो
गर थोड़ी देर ना मिलूं 
तो परेशान हो जाती हो
रात को कई बार उठकर
मुझे सम्भालती हो
ये जो तुम्हारी आंखों में
मुझे खो देने का डर है
ये जो तुमने मुझे अपनी
रूह तक में बसा रखा है
फिर इसे

क्या नाम दूं

Tuesday, 18 September 2018

पिताजी की सेवानिवृति के उपलक्ष में


पिताजी की 40 वर्षों की निःस्वार्थ राजकीय सेवा से सेवानिवृति के उपलक्ष में कुछ लाईनें
JUNE 2015

इक दौर खत्म होने को है
इक दौर शुरु हुआ होगा
इक दिन बीता इक सांझ ढली
फिर सूरज उग आया होगा

छोड़ चले जब चार दीवारी
कदम भी ठिठके तो होंगे
कुछ कदम चले भी तो होंगे
कुछ कदम रूके भी तो हांगे

साथियों के पुष्पाहारों ने
सम्मान बढ़ाया भी होगा
देख आत्मीयता के वो पल
गौरव का भान हुआ होगा

अपनों का स्नेह भी तो
हृदय में समाया ना होगा
और स्वजनों के सम्मान से
नेत्रों मे जल आया होगा

इक दौर खत्म होने को है
इक दौर शुरु हुआ होगा
इक दिन बीता इक सांझ ढली
फिर सूरज उग आया होगा

पवन प्रजापति ‘पथिक’

दादीजी की स्मृति में


चन्द लाईनें मेरी स्वर्गीय दादीजी श्रीमती सुन्दर देवी
को श्रद्धांजली स्वरूप समर्पित
आज मैं बताऊं थांने
केड़ी म्हारी धा व्हेती
तावड़ा में तपियोड़ा ने
निम्बड़ा री छींया व्हेती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

रोवता कदेई मैं तो
थपकी दे सुलाय देती
नीन्द नहीं आवती तो
हालरियो हुलराय देती
चिड़ी औेर कागला री
कांणिया सुणाय देती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

मिन्दरां जाती तो धा
म्हाने भी बुलाय लेती
पूजा करती धा म्हाने
टोकरियो पकड़ाय देती
छोटा छोटा हाथां मांही
मकाणा जिलाय देती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

बाल पणे धा म्हाने
लाड घणे लडावती
रोटी मैं नी खावता
भूखी वा रे जावती
म्हाने नीन्द आया बिना
वो खुद सो नी पावती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

आज म्हारी धा री म्हने
याद घणी आवे है
चेहरो सामी आवतां ही
आंखियां भर जावे है
धा म्हारी व्हेती म्हने
गोदियां सुलावती
वा तो माँ जेड़ी माँ व्हेती
एड़ी म्हारी धा व्हेती

Friday, 14 September 2018

हिंदी दिवस

राष्ट्रभाषा हिन्दी को समर्पित

जो इस देश का गौरव है
भारत माता की बिन्दी है
मत समझो केवल भाषा है
वो अपनी माँ हिन्दी है

देश में फैले जन जन को
धागा जोड़े वो हिन्दी है
तुतलाती बोली में बोले
वो पहला अक्षर हिन्दी है

माथे की बिन्दिया हिन्दी है
सर की ये पगड़ी हिन्दी है
गर्व से कहो हम हिन्दी है
हम हिन्दी है हम हिन्दी है

Friday, 7 September 2018

रिश्तों में दरारें

रिश्तों में दरारें आखिर क्यों पड़ती है। क्या कारण है कि बड़े से बड़ा ओहदाधारी अपने निजि रिश्तों में आई दरारों को पाट नहीं पाता है। मानसिक रूप से मजबूत समझे जाने वाले आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को भी हमने रिश्तों में आई दरारों के सामने घुटने टेकते देखे हैं। कई लोग तो अपने निजी रिश्तों में आई दरारों से अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसे घिनौने कृत्य कर बैठते हैं। 
जहां तक मुझे समझ में आता है रिश्तों में दरारों की शुरूआत विचारों के टकरावों से ही होती है। और दरार बढ़ने तब लगती है जब दोनों पक्षों में से कोई भी अपने विचारों को लेकर समर्पण करना नहीं चाहता। दरअसल वो समर्पण करने को अपने अहम का आहत होना मान लेते हैं। हम अगला जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार नहीं पाते हैं। ऐसी घटनाएं भी अधिकतर उच्च शिक्षित वर्ग एवं शहरी परिवेश में रहने वालों में होती है। हालांकि हर बार ऐसा ही हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अधिकांश रिश्तों की जड़ में जाएंगे तो यही समझ में आएगा वो विचारों के टकराव को सम्भाल नहीं पाए। विचारों के टकराव के दौरान स्थिति को सम्भालना सीखें और यदि रिश्तों को बचाने के लिए समर्पण भी करना पड़े तो करें क्योंकि यदि समर्पण करने से रिश्ते बचते हों तो सौदा सस्ता ही मानिए।
वैचारिक मतभेद तो सभी जगह होते हैं लेकिन वैचारिक मतभेद को मनभेद में ना बदलने दें, यही बात रिश्तों की दीवारों को जोड़ने में सीमेंट का काम करेगा।

Tuesday, 4 September 2018

जो रक्त ​है शिराओं में तो खौलता क्यूं नहीं

क्यूं मौन है तू आज कुछ बोलता क्यूं नहीं
ये आज नेत्र है सजल क्यूं अश्रु रोकता नहीं
क्या तुम्हारे धैर्य की कोई सीमा ही नहीं
जो रक्त ​है शिराओं में तो खौलता क्यूं नहीं

स्वरचित

चित्रगुप्त और फेसबुक

चित्रगुप्त हमेशा की तरह मृत्युलोक के लोगों के लेखे जोखे चेक कर रहे थे। आजकल वे भी डिजिटल हो गए हैं और अपने सारे डाटा अपने लेपटॉप में रखते हैं। दो फरियादी उनके सामने लाये जाते हैं नाम हैं रामलाल और श्यामलाल दरअसल यमदूत उनको अभी —अभी उठाकर लाए हैं। सबसे पहले रामलाल को पेश किया जाता है। चित्रगुप्त रामलाल से
''कोई पुण्य का कार्य याद है जो ​तुमने किया हो''
''प्रभु! बहुत सारे पुण्य के काम किए हैं, गायों को चारा डाला है, पैदल तीर्थयात्रियों की सेवा की है, उनके लिए भण्डारे लगाए हैं।''
चित्रगुप्त अपना लेपटॉप चेक करते हुए
''तुम्हारे खाते में ऐसा कोई काम दर्ज नहीं हैं''
रामलाल घबराते हुए बोला
''प्रभु ऐसा कैसे हो सकता है?''
''क्या तुमने सेवा करते हुए अपनी फोटो या सेल्फी फेसबुक पर डाली है?''
रामलाल : ''जी नहीं प्रभु''
​चित्रगुप्त : तभी तुम्हारे पुण्य दर्ज तुम्हारे खाते में दर्ज नहीं हुए, सैनिकों! रामलाल को तुरन्त नर्क भेज दो
श्यामलाल को उसके फेसबुक पर डाली गई फोटो के आधार पर स्वर्ग में एन्ट्री मिल जाती हैचित्रगुप्त और फेसबुक

Monday, 30 July 2018

बकरी की व्यथा

वर्माजी कोर्ट के वरिष्ठ जज थे। समय पर आना उनकी आदत में शुमार था। सोमवार को कोर्ट पहुंचे तो न्यायालय परिसर के हालात देख सन्न रह गए। न्यायालय परिसर में हजारों की संख्या में बकरियां मौजूद थी। किसी को अन्दर नहीं घुसने नहीं दे रही थी। जज साहब को देखते ही युनियन की अध्यक्षा बकरी जज साहब के पैरों में लोट गई
''मांई बाप न्याय कीजीए हमारे साथ''
''अरे छोड़ो, ये कौनसा तरीका है'' पैर छुड़ाते हुए जज साहब बोले
''क्या परेशानी है तुम लोगों की''
बकरी सुबकते हुए बोली ''मांई बाप हम लोग तो पुरुषों के ही भरोसे पर हैं, हमेशा उनके जुल्म सहे हैं, कभी उफ तक न की, यहां तक कि हमारे बच्चे इनका निवाला बने लेकिन कभी कुछ नहीं की लेकिन अब तो हद ही हो गई''
''क्यों क्या हुआ?'' जज साहब बोले
''हमारी इज्जत के साथ खिलवाड़ हुआ है जज साहब, हमारी एक साथी जो कि गर्भवती थी, का 6—7 आदमियों ने मिलकर बलात्कार कर दिया, तड़प—तड़प के मर गई बिचारी''
''ओह! ये तो बहुत बुरी बात है''
''जी हां जज साहब, ये सब हमारी आंखों के सामने हुआ है इसलिए हम खुद कोर्ट आई है गवाही देने''
''वो ठीक है लेकिन कोर्ट तुम लोगों की गवाही नहीं मान सकता क्योंकि तुम जानवर हो और ये इन्सानों की कोर्ट है''
''यदि हम जानवर है जज साहब तो जिन्होंने बलात्कार किया वो कौन थे, माफ करें लेकिन हमने अपना जानवर पन नहीं छोड़ा, इन्सानों ने जरूर अपनी इन्सानियत छोड़ दी है''
जज साहब निरूत्तर थे
''जज साहब स्वाभिमान हमारा भी है, हो सके तो आपके संविधान के पन्नों के किसी कोने में हमारे लिए भी जगह ढूंढिये या अबकी ईद पर बकरों की जगह बकरियों को कटने दीजिए

Sunday, 29 July 2018

विकास

मंत्रीजी का जनता दरबार चल रहा था एक फटेहाल व्यक्ति भी पहुंच गया मंत्रीजी की ओर जा ही र​हा था कि मंत्रीजी के गार्ड ने टोका
''कहां जा रहे हो भाई? क्या काम है कोई एप्लीकेशन वगैरह लाए हो साथ''
''जी कुछ नहीं वो मंत्रीजी से पैसे लेने थे'' उस फटेहाल व्यक्ति ने कहा
''क्यों? मंत्रीजी को उधार दे रखे है क्या तुमने, जनता दरबार मतलब कुछ भी उल्टी सीधी मांग लेकर चले आओगे'' गार्ड ने झिड़कते हुए कहा
''जी वो मंत्रीजी ने ही एक दिन कहा था कि विकास के लिए पैसे की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी, दरअसल मेरा ही नाम विकास है मैं तो मंत्रीजी के कहे अनुसार ही आया हूँ''
'विकास' चीखता रह गया और गार्ड ने 'विकास' को धक्के देकर बाहर निकाल दिया

Saturday, 28 July 2018

भूख

गोलू भागते हुए शर्माजी की दुकान पहुंचा
''अरे गोलू आज इतनी जल्दी में कैसे? तनिक सांस तो लेलो''
गोलू हांफते हुए बोला — ''अरे शर्माजी आज थोड़ी जल्दी में हूं जरा 2 किलो नाश्ता पैक करदो जल्दी''
शर्माजी बोले — ''क्या बात है गोलू आज कोई खास बात है क्या, या कोई लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम्हे''
गोलू बोला — ''अरे ऐसी कोई बात नहीं है शर्माजी वो पड़ौस में तीन बच्चों की मौत हो गई है ना भूख से, नेताजी आ रहे हैं वहां परिवार को ढाढस बंधाने बस उनके लिए नाश्ता ले जा रहा हूँ''

शर्माजी वापस गोलू से कोई सवाल न पूछ सके

इंसानियत की लाशें

क्षितिज आॅफिस से निकलने को ही होता है कि शालिनी का फोन आ जाता है
''सुनो थोड़ा जल्दी आना आपका स्पेशल गाजर का हलवा बनाया है''
''हां बाबा मालूम है कल मैंने ही तो गाजर लाकर दी थी बस निकल ही रहा हूॅं''
कहकर क्षितिज ने फोन काट दिया और अपनी बाईक लेकर निकल गया।
आॅफिस से थोड़ी दूर निकला ही था कि एक ट्रक काल बनकर आया और सारे अरमानों को रौंदकर चला गया
थोड़ी देर बाद वहां क्षितिज के साथ और भी कई लाशें बिखरी पड़ी थी
क्षितिज के साथ जो लाशें बिखरी पड़ी थी वो उन लोगों की इंसानियत की थी जो उसे बचाने के बजाय अपने मोबाईल में उसकी अन्तिम सांस निकलने तक उसका विडियो बनाते रहे
पोस्ट मार्टम में क्षितिज की मौत का कारण अधिक रक्त बह जाना बताया गया
वहीं इन्सानियत की मौत का कारण पता नहीं लग सका

Monday, 16 July 2018

मेरा पुराना घर

कल गली से गुजरते वक्त अचानक किसी ने पीछे से आवाज दी''कहां जा रहे हो'' मैं रूककर पीछे मुड़ा तो कोई नहीं था। जैसे ही वापस घूमा फिर वहीं आवाज आई, लेकिन पीछे कोई नहीं था। इतने में आवाज वापस गूंजती है ''क्या हुआ भूल गए मुझे? मेरे साथ तो तुमने 30 साल गुजारे हैं इतनी जल्दी कैसे भूल गए?'' मेरा पुराना घर ही मुझसे बतिया रहा था। मैं भी तपाक से बोला
''अरे नहीं तुम्हे कैसे भूल सकता हूँ''
''भूले नहीं तो कभी सम्भालने तो नहीं आते। अब आओगे भी क्यूं मैं तुम्हारे नए घर जैसा खूबसूरत जो नहीं हूं'' मुझे उलाहना देते हुए बोला।
''अरे नहीं वो बात नहीं है''
''और नहीं तो क्या बात है? तुम तो नए घर में जाकर सब कुछ भूल गए, क्या तुम्हे मेरे आंगन में खेलना और उधम मचाना भी याद नहीं। छोटे थे तो कितनी बार मेरी दीवारों को अपनी चित्रकारी से गन्दा किया करते थे। तुम्हारे साथ भीगकर मैं भी तो होली खेला करता था, दीवाली मनाया करता था। वो चित्रकारियां, होली, दीवाली मेरे जेहन में अब भी ताजा है, मगर तुम भूल चुके हो, सच में तुम बहुत भुलक्कड़ हो गए हो''
उसके उलाहने जारी थे?
''मैंने सोचा तुम जाते हुए एक बार मुझे मुड़कर तो देखोगे लेकिन तुम तो सच में बहुत निष्ठुर निकले, हमेशा मेरे पास से निकल जाते हो कभी मेरी तरफ देखते तक नहीं''
मैं यादों के दरिया में डूबता उतराता उसके किसी उलाहने का जवाब तक न दे सका। बस वो बोलता गया और मैं नि:शब्द सा बस सुनता गया

Wednesday, 20 June 2018

आ लग जा गले कुछ यूं कि मैं कतरे से समंदर हो जाऊं

चन्द स्वरचित लाईनें

आ लग जा गले कुछ यूं कि मैं कतरे से समंदर हो जाऊं
तू मेरे अंदर खो जाए मैं तेरे अंदर खो जाऊं
दुनियाभर की धन दौलत मुझे मिल जाए तो भी क्या है
तू जो अगर मुझे मिल जाए इक पल में सिकंदर हो जाउं

Monday, 12 March 2018

रूह ही है

लिखने के लिए उन्वान/विषय दिया गया है ''रूह''
उस पर लिखने में कितना सफल हो पाया हूं.
ये आप ही तय कर सकते हैं।

तोड़ के सांसों के बन्धन
उड़ चली वो रूह ही है
आग में तो देह जली है
ना जली वो रूह ही है

राख के इस ढेर में
तू ढूंढता क्या फिर रहा है
हाथ लगी वो अस्थियां है
ना लगी वो रूह ही है

ना मिलुं तो

चन्द लाईनें
यदि किसी रोज
लाख कोशिश करने
के बावजूद
मैं तुम्हें ना मिलुं
तलाश करने के बाद भी
जब मेरी खबर
ना मिले
अपनी सारी कोशिशें
करके
यदि थक जाओ
तो दो पल के लिए
बन्द कर लेना
अपनी नश्वर आँखें
और अपने अन्तर के झरोखे से
झांकना अपने हृदय में
कहीं न कहीं खड़ा
मुस्कुराता हुआ
मिल ही जाउंगा मैं
क्योंकि तुमसे दूर
तो नहीं हो सकता ना!

Friday, 9 March 2018

है मुश्किल रास्ता तो क्या




है मुश्किल रास्ता तो क्या, दिल में हौसला तो है
जमीं पे पैर हैं तो क्या, नजर में आसमां तो है
जमाने तू मुझे कब तक रखेगा यूं अंधेरे में
अंधेरी रातों के उस पार उम्मीदों के उजाले तो हैं

Thursday, 1 March 2018

अपराधबोध

‘‘अजी सुनते हो...आज होली है आप बच्चों के पिचकारियां लाना मत 
भूलना’’ शालिनी ने मयंक को याद दिलाते हुए कहा। ‘‘हां बाबा हां मुझे याद है सुबह से तुम चार बार मुझे याद दिला चुकी हो’’ ‘‘और सुनो वो रसोई का सामान मत भूलना अभी मुझे बहुत सी मिठाईयां बनानी है।’’ तभी बाहर से मेहुल दोड़ता हुआ आता है ‘‘पापा मैं भी चलूंगा आपके साथ बाजार में देखो ना मेरे सभी दोस्त कलर एवं पिचकारियां ले आए हैं. पापा मेरे लिए भी लाओ ना’’ मेहुल जिद करता हुआ कहता है ‘‘चलो बेटा तुम भी चलो जैसा मेरा राजा बेटा कहेगा वैसी पिचकारियां दिलाउंगा‘‘ मेहुल को गोद में उठाकर मयंक बाहर निकलने को ही होता है कि अचानक शालिनी को कुछ याद आता है ‘‘सुनो! कल मेहमान आएंगे मिलने के लिए आप एक काम करना ना, वृद्धाश्रम से मां और पिताजी को भी लेते आना ना। दो दिन मैं भी उनके साथ रह लुंगी और मेहमान आएंगे तो भी अच्छा लगेगा’’
इस बार मयंक ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी चुपचाप रवाना हो गया। लेकिन उसके चलने में कोई उत्साह नहीं था.. कदमों को मानो किसी अपराधबोध की बेड़ियों ने जकड़ रखा था।

Wednesday, 31 January 2018

तुम क्या जानो

तुम क्या जानो मेरी तन्हाई में कितने गम होते हैं
मुस्कानों में गम को छुपा ले ऐसे लोग कम होते हैं
मेरे इस हंसते चेहरे से कहीं धोखा ना खा जाना
इस हंसते चेहरे के पीछे जाने कितने समझौते हैं।

Thursday, 11 January 2018

चन्द लाईनें...

चन्द लाईनें...
अक्सर कई बार
मेरे पुरजोर प्रयास
व्यर्थ हो ही जाते है।
मेरी सारी कोशिशें
बेकार हो ही जाती है
मैं चाह कर भी
रोक नहीं पाता हूं
छलकने से
प्रेम की गागर को
जो अक्सर
तुम्हे देखकर
छलकने को
आतुर हो ही जाती है
और हार जाता हूँ मैं
प्रेम से विवश होकर
लेकिन इस हार में भी
कहीं न कहीं
छिपी है जीत
और पीड़ा की जगह
आनन्द