Friday, 11 December 2020

लघुकथा : जिम्मेदारियों का बोझ

लघु कथा : जिम्मेदारियों का बोझ

पिता के असमय अवसान ने बहुत जल्द जिम्मेदारियों का बोझ उसके नाजुक कन्धों पर लाद दिया था। घर के मुखिया के असमय अवसान से उसका घर बिखर चुका था। लेकिन वह परिस्थितियों से हारा नहीं बल्कि चुनौती समझ अपनी कमर बांधी और बिखरे घर को समेटने में जुट गया । मेहनत की सीमेन्ट में पसीने को मिलाकर आखिरकार उसने अपना बिखरा हुआ घर फिर से समेट ही लिया। वह नहीं चाहता था कि इतनी मेहनत से बना उसका घर बिखर जाये इसलिये घर की नींव में खुद खड़ा हो गया और पूरे घर को अपने कन्धों पर उठा लिया। कई तूफान और भूकम्प आये लेकिन उसने अपने घर को मजबूती से थामे रखा और बिखरने नहीं दिया।
इस दौरान कई बरस बीत गये। जिम्मेदारियों ने पता ही नहीं चलने दिया कि कब युवावस्था विदा हो चुकी थी और बुढ़ापा द्वार पर दस्तक दे रहा था। अब उसके हाथों में वह ताकत नहीं थी कि इस घर को ज्यादा दिनों तक सम्भाल कर खड़ा हो सके। उसे डर था कि अब यदि छोटा सा तूफान या भूकम्प भी आया तो वह अपने घर को सम्भाल नहीं सकेगा। उसका डर सही भी निकला। अचानक कहीं से एक तूफान आया और मकान की नींवें हिलने लगी।  वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी मकान को बिखरने से बचाने में असमर्थ था। उसके हाथ और पैर कांप रहे थे और घर बिखरने को था कि अचानक कहीं से दो मजबूत कन्धे उसकी मदद को आगे आये। उन कन्धों में शक्ति की कोई सीमा नहीं थी। उन भुजाओं का बल मानों पर्वत को चीर देने की क्षमता रखता था। देखते ही देखते उन कन्धों ने उसका सारा भार अपने ऊपर ले लिया। तूफान उसकी शक्ति के आगे नतमस्तक हो गया। वृद्ध आँखों ने जब ऊपर देखा तो पाया कि यह उसका युवा पुत्र था जिसने अपने पिता को भार से मुक्त कर दिया। उसे अब भरोसा हो गया कि उसका पुत्र अब उसके घर को बिखरने नहीं देगा। भावनाएं पानी का रूप लेकर आँखों में छलछला गयीं।

Friday, 30 October 2020

गांव दिखा दूँ

कैसे साहिल पे डूबी थी नाँव दिखा दूं
हारा सबकुछ कैसे वो दाँव दिखा दूं

कामयाबी पे यूँ ही तो पहुँचा नहीं
खून से ये सने मेरे पाँव दिखा दूं

जीतने पूरी दुनिया सिकन्दर चला
जो मिली उसको दो गज ठाँव दिखा दूं

भागते भागते थक गया है अगर
तुझको पीपल की ठंडी छाँव दिखा दूं

रात भर ही भटकता शहर ये तेरा
चैन से सो रहा मेरा गाँव दिखा दूं

Saturday, 17 October 2020

नवरात्रि और कन्यापूजन

नवरात्रि और कन्या पूजन
मोहनलाल सुबह से मोहल्ले के 10 घरों के चक्कर काट चुके हैं। लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी 9 कन्याएं नहीं मिल पायी। नवरात्रा के पावन दिन चल रहे हैं। शास्त्रों में भी नवरात्रा के दिनों में कन्या को भोजन करवाने का बड़ा महत्व माना गया है। एक तो मोहल्ले में वैसे भी लड़कियां नहीं है, जो है वो उन्होंने पहले ही कहीं से निमंत्रण ले रखा है। आखिर जब थक हार कर मोहनलाल खाली हाथ घर आ गये तो पत्नी मालती बोली — ''क्या हुआ, कोई लड़की नहीं मिली। ''

''कहां मिली? मोहल्ले में लड़कियां है कहां जो मिलेंगी। जिनके लड़कियां है उन्होंने पहले से निमंत्रण ले रखा है।''

''होगी भी कैसे? जब लड़कियों को पैदा होने दिया जायेगा तभी होंगी ना, खुद तुम्हारे घर में कितनी लड़कियां है? पता है जब मैं दूसरी बार गर्भवती हुई थी और तुम्हे पता चला कि पेट में लड़की है तो तुम्ही ने पैदा नहीं होने दिया। मैं लाख रोयगी, गिड़गिड़ायी लेकिन तुम नहीं पसीजे। अब आदमी जो बोयेगा वहीं तो काटेगा ना। अब आओ फिर से वहीं जहां पिछली बार गये थे।''

मोहनलाल पैर घिसटते हुए फिर शहर के अनाथ आश्रम की ओर चल दिये जहां उन लड़कियों को रखा जाता है जिन्हें जन्मते ही नाले या कूड़ेदान में फैंक दिया गया था।

Tuesday, 6 October 2020

लघु कथा : शहर का नंबर

शहर का नम्बर
टूटी—फूटी सड़क पर हिचकोले खाती सरकारी बस की हालत भी उस सरकार की तरह हो चुकी थी जो नाम मात्र के विधायकों के भरोसे चल रही थी। जिसके विधायक कई बार समर्थन वापस लेने की धमकी दे चुके थे लेकिन लेकिन सरकार किसी तरह हाथ — पांव जोड़कर चल रही थी। दरअसल बस शुरू से ऐसी नहीं थी लेकिन उस टूटी—फूटी सड़क पर चलते — चलते बस की हालत ऐसी हो चुकी थी।
उसी बस की फटी हुई सीट पर बांके बैठा था। उसमें सीट के नाम पर मात्र कवर ही बचा था, अन्दर का फोम शायद लोग सार्वजनिक सम्पत्ति समझकर अपना — अपना हिस्सा निकाल ले गये। बस के हिचकोलों से बिना फोम की सीट पर बैठे बांके राधे की तशरीफ बिल्कुल वैसी ही हो गयी थी जैसी 65 व 71 के युद्ध में भारत से पिटाई के बाद पाकिस्तान की हुई थी। बांके की सांस में सांस तब आई जब लम्बे संघर्ष के बाद बस स्टेशन पर सकुशल पहुंच ही गयी। बस से उतरकर बांके ने राहत की सांस ली। बरसात के पानी से झील बन चुकी सड़क को लांघ कर बांके उस पार बनी चाय की दुकान पर पहुंचा और
चाय वाले से चाय का कप लेते हुए पूछा
''क्यों भाई! यह शहर तो मंत्रीजी का शहर है! इस कम से कम शहर का विकास तो बहुत पहले हो जाना चाहिये थे लेकिन इसकी हालत तो बहुत ही खस्ता है। क्या मंत्रीजी शहर के विकास के लिये कुछ नहीं करते।''
चाय वाला बोला
''ऐसा नहीं है भाई साहब, आप नाहक हमारे मंत्रीजी को गलत समझ रहे हैं। दरअसल मंत्रीजी की आदत है कि कि हर शुभ काम की शुरूआत अपने घर से करते हैं। तो इसी कड़ी में उन्होंने विकास की शुरूआत भी अपने घर से ही की। अब जब उनके घर का पूरा विकास हो जायेगा तभी तो शहर का नम्बर आयेगा ना। और जब तक शहर के विकास का नम्बर आता है, सरकार बदल जाती है, फिर जो नया मंत्री आता है वो विकास की शुरूआत फिर अपने घर से ही आता है और यही क्रम चलता रहता है इस चक्कर में शहर के विकास का तो नम्बर ही नहीं आता, इसमें भला हमारे मंत्रीजी की क्या गलती है?''
बांके चाय वाले के तर्क से निरूत्तर हो गया। टूटी सड़कों को लांघता अपने गंतव्य की ओर निकल गया।

Monday, 14 September 2020

हिंदी दिवस

हिन्दी दिवस 
लोगों से खचाखच भरा सभागार, लगभग सभी वक्ता अपना उद्बोधन पुरा कर चुके हैं, सिर्फ मंत्रीजी की प्रतीक्षा है जो आज के हिन्दी दिवस समारोह के मुख्य अतिथि भी हैं। मंत्रीजी भी पद की प्रतिष्ठा रखते हुए घण्टे भर के विलम्ब से ही पहुंचे हैं। जो मंत्री समय पर पहुंच जाये वह मंत्री ही कैसा? मंत्रीजी यदि व्यस्त ना भी हो तो उन्हें व्यस्त होने का दिखावा करना ही पड़ता है। यह दिखाना ही पड़ता है कि उन्हें समय ही नहीं था इसके बावजूद उन्होंने कार्यक्रम में आकर आप पर उपकार ही किया है। मंत्रीजी के आते ही उनके स्वागत की औपचारिकता शुरू हो गयी। लगभग मंत्रीजी के बराबर वजन की विशाल माला से उनका स्वागत किया गया। माला इतनी बड़ी है कि उसमें मंत्रीजी सहित सारे अतिथि समा जाएं। स्वागत के उपरान्त मंत्रीजी ने अपना उद्बोधन शुरू किया।
''प्यारे भाईयों व बहिनों! हिन्दी हमारे लिये सिर्फ भाषा नहीं है बल्कि हमारी पहचान है। हिन्दी तो देश के माथे की बिन्दी है। ये वो धागा है जो देश के कोने — कोने में रहने वाले लोगों को एक सूत्र में बांधता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हिन्दी को वो सम्मान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिये। अभी तक हम इसे राष्ट्रीय भाषा का ही दर्जा नहीं दिलवा पाये हैं। पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के चलते अंग्रेजी बोलने वाले को सभ्य व आधुनिक मान लिया गया वहीं हिन्दी बोलने वाले को आज भी गंवार समझा जाता है। कितने आश्चर्य की बात है कि विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में गिनती होने के पश्चात भी हमारे देश में हिन्दी की स्थिति बहुत दयनीय है।''
मंत्रीजी का उद्बोधन जारी था। जनता मंत्रीजी के हिन्दी भाषा पर ज्ञान से मंत्रमुग्ध थी। अपने भाषायी कौशल से मंत्रीजी ने जनता को हिलने नहीं दिया। भाषण खत्म कर मंत्रीजी तुरन्त निकल गये। मंत्रीजी का अगला कार्यक्रम शहर के नामी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में था जहां उन्हें अपने इकलौते पुत्र को प्रवेश दिलवाना था।

Wednesday, 2 September 2020

जंगल में लोकतंत्र

इन्सानों का विकास निर्बाध गति से हो रहा है। यह इतना अनियन्त्रित है कि बढ़ते — बढ़ते जंगलों तक आ पहुंचा है। जंगल के जानवर पहले तो इन्सानों से डरते थे लेकिन लम्बे समय तक इन्सानों की संगत में रहने से उन्हें यह ज्ञान हो गया कि जो इन्सान आज पूरे विश्व पर राज कर रहा है उसके पुरखे भी किसी समय उनकी ही तरह जंगलों की खाक छाना करते थे। वो भी उनकी तरह जंगलों में कन्द — मूल खाता था, जानवरों का शिकार किया करता। समय के साथ इन्सान तो विकास कर गया लेकिन जंगल के बाकी जानवर वहीं के वहीं रह गये। लिहाजा जंगल के जानवरों ने इन्सानों की जीवन शैली पर नजर रखनी शुरू कर दी। उन्होंने गौर किया कि इन्सानों में लोकतंत्र नामक प्रणाली होती है जिसमें जनता अपनी मर्जी से अपना नेता चुनती है। वह नेता अपने क्षेत्र का विकास करता है। कुत्ते, बिल्ली, हिरण, लौमड़ी, शेर, हाथी, गधे सहित जंगल के ज्यादातर जानवरों को यह बात जंच गयी। उन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि उन्हें भी अपना राजा बदलने का अधिकार है। कल तक उन्हीं के बीच रहने वाले इन्सान ने राजतंत्र छोड़ कर लोकतंत्र अपनाया और अपना इतना विकास कर लिया तो भला वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते। वे हमेशा से शेर को अपना राजा मानते आये हैं लेकिन आखिरकार शेर के शासनकाल में जंगल कितना विकास कर पाये हैं? आखिर आये दिन शेर हमें व हमारे बच्चों को मारकर खा जाता है, ऐसे क्रूर शासक को हम क्यों कर स्वीकार करें?
जानवरों में गुप्त मंत्रणा होने लगी। देखते ही देखते जंगल में आग की तरह बात फैल गयी। धीरे — धीरे ज्यादातर जानवरों का बहुमत जंगल के राजा के खिलाफ होने लगा। जंगल में चुनाव करवाने की मांग उठने लगी। चुनाव को लेकर जंगल के सभी जानवरों की बैठक बुलाने का निर्णय लिया गया। बन्दरों को जिम्मेदारी दी गयी वे उछल कूद कर किसी भी दुर्गम जगह तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं लिहाजा ये सन्देश पूरे जंगल में फैला दिया जाये कि तीन दिन बाद झरने के पास जंगल के सभी जानवरों की आम बैठक रखी गयी है जिसमें आने वाले दिनों में जंगल में चुनावा करवाने को लेकर आवश्यक बैठक रखी गयी है जिसमें सभी जानवर आवश्यक रूप से पधारें।

बन्दरों ने जंगल के हर जानवर तक सन्देश पहुंचाने की जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार की। बन्दरों के सरदार ने सभी को अपने — अपने क्षेत्र बांट दिये। सभी बन्दर अपने अपने क्षेत्रों के लिये उत्साह पूर्वक रवाना हो गये मानों वे रामसेतू के लिये पत्थर लाने जा रहे हों। रात भर में जंगल के हर कोने में सूचना पहुंच चुकी थी। जंगल के राजा शेर को जब पता चला कि जंगल के जानवर बगावत पर उतर आए हैं तो एक बारगी तो वह क्रोध से तमतमा उठा लेकिन जानवरों में फैले आक्रोश को देखकर मौन रहना ही उचित समझा। सोचा फिलहाल तटस्थ रहकर देखते हैं कि सभी जानवर बैठक में क्या निर्णय लेते हैं?
बैठक का दिन आ गया। सभी जानवर सुबह से ही झरने के पास इकट्ठा होना शुरू हो गये थे। पास ही एक बड़ी चट्टान को मंच के लिये चुना गया। हाथी, बन्दर, लोमड़ी, हिरण, गधा एवं विभिन्न जानवरों के प्रतिनिधि उस ऊंची चट्टान पर कतारबद्ध होकर बैठ गये। वर्तमान राजा शेर भी बैठक में पहुंचा। हमेशा शेर को देखते ही भाग जाने वाले जानवरों में आज ना जाने कौनसी शक्ति आ गयी थी कि राजा को बैठने के लिये जगह देना तो दूर, उसकी आंखों में आंखें डालकर मानों चेतावनी दे रहे हो कि अब तुम्हारे दिन गये। 
इन्सानों जिस गधे को मूर्खता का पर्याय समझते हैं, वो गधा जंगल में सबसे समझदार माना जाता था। गधे का इन्सानों की दुनिया से भी सम्बन्ध था और जानवरों से भी, लिहाजा गधा जानवरों व इन्सानों के बीच की कड़ी था। जानवर जब ज्यादा समझदार हो गया तो गधा हो गया और इंसानों में समझदारी जितनी कम हुई उसमें गधों के गुण उतने ही ज्यादा पाये गये। गधे को बैठक का अध्यक्ष घोषित किया गया। गधे महाशय ने खड़े होकर अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया
''भाईयों! आप सभी का आभार कि आपने मुझ गधे को अपना नेता स्वीकार किया। हम लोग बरसों से गुलामी का जीवन जीते आये हैं। अपने राजा पर आंख मून्द कर भरोसा करते आये हैं। हमेशा उसका सम्मान किया। बदले में कभी किसी अधिकार की मांग नहीं की। लेकिन इसका परिणाम क्या निकला। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जो इन्सान आज पूरे विश्व पर राज कर रहा है किसी समय में वो भी हमारी ही तरह जंगलों में रहा करता था। कन्दमूल खाता एवं शिकार करता था। लेकिन समय के साथ उसने अपने पुराने नियमों को छोड़ और नये नियमों को अपनाया। आज वो दुनिया पर राज कर रहा है! कल का जानवर आज का इन्सान है! हालांकि कई इन्सानों में आज भी जानवर मौजूद है लेकिन उनकी संख्या कम है। आपको पता है इन्सान तरक्की क्यों करता है, क्योंकि उनमें लोकतंत्र नामक प्रणाली है। ये एक ऐसी प्रणाली है जिसमें इन्सान खुद अपना राजा चुनते हैं।  कई इन्सान राजा बनने के लिये खड़े होते हैं उनमें से एक व्यक्ति् को चुना जाता है। इस प्रक्रिया को चुनाव कहते हैं। उनके द्वारा चुना हुआ नेता उनके विकास के लिये काम करता है। हमेशा उनके हितों की रक्षा करता है। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते। क्या हमें अधिकार नहीं है कि हम भी अपना राजा खुद चुनें। तो आईये शपथ लीजिये कि अब जंगल में भी चुनाव होंगे और वही राजा बनेगा जिसे जानवर चुनेंगे।''
गधे ने अपना भाषण समाप्त किया। सभी जानवर उसका भाषण सुनकर मंत्रमुग्ध हो गये वहीं शेर चकित था कि गधा इंसानों की संगत में रहकर कितना बुद्धिमान हो गया था। पता नहीं इंसान फिर भी गधे को मूर्ख क्यों कहते हैं। शेर को डोलते सिंहासन का आभास हो गया था।
बन्दर, हाथी, खरगोश, हिरण सहित ज्यादातर जानवरों ने गधे का समर्थन किया, हाथी ने खड़े होकर गधे को ही उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव रखा जिसका ज्यादातर जानवरों ने समर्थन किया। इससे समझदार प्रत्याशी उन्हें कहां मिल सकता है, साथ ही यह भी निश्चय किया गया कि यदि शेर जंगल का राजा बने रहना चाहता है तो उसे भी चुनाव में प्रत्याशी के रूप में खड़ा होगा, अन्यथा गधे को निर्विरोध राजा घोषित कर दिया जायेगा। शेर दुविधा में पड़ गया। यदि चुनाव ना लड़े तो यह समझा जायेगा कि शेर ने गधे के सामने हार मान ली। और यदि लड़े तो हार कर अपनी प्रतिष्ठा खोने का डर। दोनों ही स्थितियों में प्रतिष्ठा दांव पर थी लेकिन यदि चुनाव लड़ कर जीत जाये तो प्रतिष्ठा बनी रह सकती थी। लिहाजा शेर ने भी चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। चुनाव के लिये चार दिन बाद का समय तय किया गया। इन्सानों के बीच रहने के कारण गधे ने झूठ बोलने, धोखा देने व अभिनय करने में कुशलता प्राप्त कर ली थी। वह अब इन्सानों की तरह अपने मन के कपट को चेहरे तक न आने देता। उसने घूम — घूम कर जंगल के जानवरों से सम्पर्क करना शुरू कर दिया। वह झूठे सपनों के ऐसे महल खड़े करता कि जंगल के जानवर उसे मसीहा समझ बैठते। गधे के सम्पर्क अभियान ने शेर को चिन्ता में डाल दिया। शेर ने भी जंगल के जानवरों से सम्पर्क करना शुरू कर दिया। लोकतंत्र की ताकत कहिये या विडम्बना कि जंगल का राजा शेर छोटे—मोटे जानवरों के सामने कुत्ते की तरह दुम हिला रहा था। जंगल के जानवर भी आश्चर्य चकित थे। उन्हें कभी सोचा ही नहीं था कि जंगल का राजा शेर कभी उनके सामने इस तरह अननुय विनय करता नजर आयेगा। शेर भले ही शक्तिशाली था, योग्य था लेकिन उसे गधे की तरह झूठ बोलना व अभिनय करना नहीं आता था। वह गधे की तरह लोगों से झूठे वादे नहीं कर सकता था। ज्यों — ज्यों चुनाव का दिन नजदीक आता वैसे ही शेर का दिल बैठा जाता वहीं गधा इस तरह निश्चिंत था मानों उसने मैदान मार लिया है।
आज चुनाव का दिन था, जंगल आज नया इतिहास लिखने जा रहा था। पहली बार जंगल के प्राणियों को अपनी मर्जी से अपना राजा चुनने का अवसर मिला था। झरने के पास भोर से ही जानवरों को जुटना शुरू हो गया था। सूर्योदय होते — होते सभी जानवर वहां इकट्ठा हो गये। दोनों प्रत्याशी भी नियत स्थान पर जाकर बैठ गये। बन्दरों के सरदार को कार्यक्रम के संचालन का भार सौंपा गया। उसने सभा को सम्बाधित करना शुरू किया।
''बन्धुओं!आज जंगल इतिहास रचने जा रहा है। आज तक हम एवं हमारी पीढ़ीयां आंखें मून्द कर थोपे गये शासक को ही अपना राजा एवं उनकी सन्तानों को ही उनका उत्तराधिकारी मानती आई है। कभी उफ तक नहीं की। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब जंगल का राजा वही होगा जिसे जंगल के जानवर चुनेंगे। साथियों आप लोगों को शायद पता नहीं कि आप इतिहास रचने जा रहे हैं। पहली बार जंगल का राजा ऐसा होगा जिसे सभी प्राणियों का समर्थन प्राप्त होगा। यदि कल का जानवर आज का इन्सान बन सकता है तो आज का जानवर यदि कल इन्सानों सी प्रगति कर ले तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
आपके सामने दो प्रत्याशी है, एक वर्तमान राजा शेर एवं दूसरे उनका प्रतिद्वन्दी गधा। आपको इन दोनों प्रत्याशियों में से अपना राजा चुनना है।''
सभा मंत्रमुग्ध सी बन्दर का उद्बोधन सुन रही थी वहीं बन्दर भी अपने उद्बोधन से स्वयं को 'इन्सानों का पुरखा' होना चरितार्थ कर रहा था।
''साथियों! अब जो बन्धु वर्तमान राजा शेर को ही जंगल के राजा के योग्य मानते हैं और उन्हीं को चुनना चाहते है वो अपना आगे वाला बांया पैर ऊपर उठाएं''
नाम मात्र के जानवरों ने अपना पैर उठाकर शेर का समर्थन किया। बड़ी संख्या में जानवरों के मौन से शेर की पराजय स्पष्ट नजर आ रही थी।
''अब जो साथी बदलाव चाहते हैं, जो गधे को जंगल का राजा बनने के योग्य मानते हैं वो  अपना पैर ऊपर उठाएं''
बड़ी संख्या में जंगल के जानवरों ने अपने पैर ऊपर उठा दिये। गधे को मिला अपार समर्थन देख शेर पर मानो वज्रपात सा हो गया और वह वहां से गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया। वैसे भी लोकतंत्र में गधों का जीतना कोई नयी बात नहीं थी। लोकतंत्र का इतिहास गवाह है कि गधों ने हमेशा शेरों की निष्क्रियता एवं चुप्पी का फायदा उठाया है। पूरे जंगल में आज उत्सव का मौसम था। बन्दर, शेर, हाथी सहित सभी जानवर नाच — गा कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे। गधे को स्वयं विश्वास नहीं हो रहा है कि वह अब जंगल का राजा है। वह मानों किसी स्वप्न में जी रहा था। उसे अपनी चतुराई पर मन ही मन अभिमान हो रहा था —'' अहा! मैं कितना बुद्धिमान हूं, मैंने अपनी चतुराई से पूरे जंगलवासियों को मुग्ध कर लिया है। अब मैं ही इस जंगल का एकछत्र राजा हूं। आज इस जंगल में कौन है जो मेरा सामन कर सके। आज समूची गधा जाति को मुझपर गर्व होगा। आज शेर की भी मेरे सामने क्या बिसात। वह भी मेरा एक सेवक है। कल इतिहास में मेरा नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा जायेगा''
गधे एवं उसके समर्थकों के लिये जंगल में दीवाली थी वहीं शेर की मांद में आज मानों मरघट का सन्नाटा पसरा था।
    गधा अब जंगल का राजा था वहीं शेर एक सामान्य प्राणी। शेर के लिये यह समय आत्ममंथन का समय था। आखिर उससे ऐसी क्या गलितयां हुई जिसका फायदा एक गधे ने उठा​ लिया। शेर कहीं न कहीं जगल के प्राणियों से सम्पर्क बनाये रखने में असफल रहा वहीं बरसों से विरासत में मिलती आ रही सत्ता ने भी शेर में अहंकार पैदा कर दिया था। इसी अहंकार के चलते वह जंगल के प्राणियों से कई बार दुर्व्यवहार कर बैठता था जिससे जानवरों में राजा के प्रति आक्रोश की आग सुलगनी शुरू हो गयी थी। गधे ने इस आग में घी डालकर अपना उल्लू सीधा कर लिया। शेर को धीरे — धीरे सारी बातें समझ आ रही थी लेकिन सांप निकल जाने के बाद अब लकीर पीटने का कोई फायदा न था। जंगल में कुछ समय तो शांतिपूर्वक बीता लेकिन धीरे — धीरे गधे का असली रूप लोगों के सामने आने लगा था। गधा अहंकार में अपने सामने किसी को कुछ नहीं गिनता। चुनावों से पहले जो गधा जानवरों से विनम्रता से पेश आता था वहीं गधा राजा बनने के बाद जानवरों से उद्दण्डता व बदतमीजी से बात करता। जंगल में अब राजा का कोई भय भी नहीं रह गया था। गधा भले जंगल का राजा हो लेकिन था तो आखिरकार एक गधा ही, ऐसे में जंगल के जानवरों में उसका कोई भय नहीं था। समय बीतने के साथ — साथ जंगल में अराजकता फैलनी शुरू हो गयी। पहले जंगल के जानवरों का विवाद शेर के दरबार में निपटा दिया जाता था। शेर चूंकि ताकतवर था इसलिये जंगल के जानवरों में उसका भय था, इसी भय के चलते जंगल के सभी जानवर उसका आदेश भी मानते थे। गधे के पास कोई फरियाद लेकर जाता तो वह उसे दुत्कार कर भगा देता, दरअसल उसके उत्कारने के पीछे उसकी खीज थी। अब यदि कोई शेर के विरूद्ध शिकायत लेकर गधे के पास जायेगा तो गधा भला उस मामले में क्या न्याय कर पायेगा? जंगल के जानवरों को मालूम पड़ गया था कि उन्होंने गधे के बहकावे में आकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी लेकिन अब क्या हो सकता था। वो अब शेर के पास भी नहीं जा सकते थे क्योंकि चुनाव के समय उन्होंने ही शेर को नकार दिया था। 
इसी दौरान जंगल में पड़ौस के जंगल से बदमाश व उद्दण्ड शेर आ गया। जिस जंगल का राजा एक गधा हो उस जंगल में शेर भला किससे और क्यूं डरे? देखते ही देखते जंगल में उस उद्दण्ड शेर का आतंक फैल गया। वो शेर बिना कारण ही जंगल के जानवरों को मार डालता। चूंकि जंगल का राजा गधा था, सारे जानवर मिलकर अपनी फरियाद लेकर गधे के पास गये। कोई दूसरा जानवर होता तो गधा कुछ हिम्मत कर भी लेता लेकिन शेर के सामने गधे की क्या बिसात? गधे ने जानवरों की मदद करने से मना कर दिया। जानवर पूरी तरह से हताश हो गये। बन्दर ने सुझाव दिया ''क्यों ना शेर के पास चला जाये? वहीं हमारी मदद कर सकता है''
लोमड़ी बोली ''कौनसा मुंह लेकर जाएं, क्या चुनावों में हमने उसकी कम बेइज्जती की थी?''
बन्दर बोला — ''हमारे पास कोई रास्ता भी तो नहीं है, चलो जो होगा देखा जायेगा, हम सब मिलकर माफी मांग लेंगे।''
सभी जानवर मिलकर शेर के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। समस्या किसी की व्यक्तिगत न होकर पूरे जंगल की थी और जंगल के जानवर भी अपनी भूल पर खेद प्रकट कर चुके थे। शेर ने भी बीती बातें भूलकर उनकी मदद करना स्वीकार किया और उनके साथ चला जहां वो उद्दण्ड शेर था। कल तक जिस शेर को जानवर जंगल के लिये समस्या मान रहे थे आज संकट के समय वहीं शेर अपनी जान की बाजी लगाने तो तैयार था। शेर ने जाकर उद्दण्ड शेर को ललकारा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ दोनों बराबर के ताकतवर थे, दोनों ही बुरी तरह लहुलुहान हो गये लेकिन अन्त में जंगल के पूर्व राजा ने उस उद्दण्ड शेर को मार गिराया। जंगल के प्राणियों में खुशी की लहर दौड़ गयी। सभी जानवरों ने शेर को फिर से जंगल का राजा घोषित कर दिया। गधे को मार — मार कर जंगल से भगा दिया गया। गधे ने फिर शहर का रूख कर लिया। वो समझ गया कि बार — बार इन्सानों को ही मूर्ख बनाया जा सकता है इन जंगल के जानवरों को नहीं। वहीं शेर ने भी शपथ ली​ कि अब वह अहंकारवश कभी भी किसी के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा, जंगल में किसी के साथ अन्याय नहीं होने देगा। गधे के माध्यम से ही सही, जंगल के जानवर एक बार फिर इन्सान के छल व कपट से परिचित हो गये थे।
समाप्त

Friday, 28 August 2020

एक चिड़िया की कहानी

 एक चिड़िया की कहानी


एक बार अपनी बगिया में

मैं चुप बैठा सोच रहा था

क्यूं बगिया के फूल ना खिलते

मन चिन्ता में डोल रहा था


तब मैंने देखा इक नन्ही

चिड़िया पास में आ बैठी थी

मन के ठहरे सागर में ज्यू

कोई ऊँची लहर उठी थी


चिड़िया को दाने डाले तो

चिड़िया चहक चहक उठी थी

चिड़िया की चहकन से मेरी

पूरी बगिया महक उठी थी


चिड़िया के आने से मानो

मेरी बगिया भी हर्षाई

मुरझाये सब फूल खिले थे

मानों बसन्त ऋतु हो आई


बगिया के इक पेड़ की डाली

उस चिड़िया ने किया बसेरा

पेड़ भी उसको पाकर झूमा

उसको चूमा खूब दुलारा


अब चिन्ता की सारी बातें

बीते जीवन का हिस्सा थी

चिड़िया से मेरा जीवन था

वो जीवन का इक हिस्सा थी


दाना लेकर उसे मनाता

कभी रूठ जब वो जाती थी

पहले तो थोड़ा इतराती

फिर गोदी में आ जाती थी


कभी दौड़ती आगे - आगे

और मैं पीछे - पीछे जाता

कभी ढूंढने मुझको आती

मैं जब कोने में छिप जाता 


ऐसे ही हंसते गाते से

मेरे भी दिन बीत रहे थे

लेकिन इतना पता नहीं था

दिन खुशियों के रीत रहे हैं


मेरी चिड़िया हुई सयानी

यौवन ने आ डाला डेरा 

मेरी चिड़िया के दिल में भी

एक चिड़े ने किया बसेरा


अपने सपनों का साथी पा

वो चिड़िया भी अब खुश रहती 

लेकिन जब भी मिलती मुझसे

जाने क्यूं चुप चुप सी रहती


एक बार मैंने उन दोनों

चिड़े चिड़ी को बुलावाया था

चिड़िया शरमाती सी आयी

और चिड़ा था घबराया सा


दोनों को फिर पास बिठाकर

चिड़िया को सीने से लगाया

बोला साथ चिड़े के रहना

मैं अब तुमसे हुआ पराया


चिड़िया बोली बाबुल तुमसे

दूर कभी ना मैं जाउंगी

तेरे आंगन में चहकूंगी

तेरे आंगन में गाउंगी


मैं बोला सुन पगली ये तो

रीत सदा से चलती आई

छोड़ के आंगन उड़ जाना है

जिस आंगन है पलती आई


छलक उठे नयनों के सागर 

फिर बिदाई की बेला आई

मेरी बगिया में भी फिर से

पतझड़ सी मायूसी छाई


आँखों में आँसूं ले चिड़िया

साथ चिड़े के उड़ती जाती

मेरी बगिया में भी पल - पल

एक उदासी बढ़ती जाती


चिड़िया के जाने से मेरी

बगिया का हर फूल था रोया

ओढ़ निशा की काली चादर

सूरज भी गुमसुम था सोया 

Tuesday, 11 August 2020

जन्माष्टमी पर विशेष आलेख

ऐ कान्हा! वैसे तो तुम अजन्मा हो, चराचर जगत तुम्ही से जन्म पाता है और फिर तुम्ही में मिल जाता है। फिर भी सांसारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए तुम्हे जन्मदिन की शुभकामनाएं तो देनी बनती ही है। पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिये तुमने मानव देह धारी, पापियों का नाश किया, धर्म की रक्षा की। समरांगण में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को गीता का दिव्य ज्ञान दिया जो हजारों वर्षों बाद भी मानवों का मार्गदर्शन कर रहा है। किन्तु अपने धाम जाने के बाद शायद इस पृथ्वी लोक की सुध लेना भूल गये हो। तुम्हे पता है जिस धर्म की तुम स्थापना करके गये थे वो धर्म अब मृत्युशैया सांसों की डोर को सिर्फ तुम्हारी प्रतीक्षा में पकड़े हुए है, क्यूंकि तुम्ही तो कहकर गये थे कि मैं हर युग मैं आउंगा, जब — जब धर्म की हानि होगी तब — तब आउंगा। धर्म को बस उसी बात का भरोसा है। तुम्हारे जन्म लेते ही कारागार के ताले स्वयं ही खुल गये थे, तो अब क्यों नहीं खोल देते लोगों के हृदयों पर पड़े ताले, जिनके चलते वे भावना शून्य हो चुके हैं। तुम तो चोरी में कुशल हो, बचपन में लोगों के घरों का माखन चुरा लेते थे, किशोर हुए तो गोपियों का हृदय चुरा लिया, फिर क्यों नहीं चुरा लेते लोगों के मन में भरा पाप, घृणा, द्वेष, अहंकार, और उनके स्थान पर अपनी मुरली की तान से उसमें प्रेम क्यों नहीं भर देते। हे गिरधर! गोकुल को इन्द्र के कोप से बचाने के लिये तुमने गोवर्धन को उठा लिया था, इन्द्र को अहंकार त्याग तुम्हारे आगे नतमस्तक होना पड़ा था। फिर क्यों इन्द्र को आदेश नहीं देते कि उसके बादल बाढ़ वाले क्षेत्र पर थोड़ा कम बरसे और उन मरूस्थलों में जमकर बरसें जहां उनका इन्तजार करते — करते लाखों करोड़ों आंखें पथरा गयी है। सुदामा को तो तुमने दो मुट्ठी चावल के बदले अपना सब कुछ लुटा दिया था। तुम तो स्वयं लक्ष्मी पति हो, फिर ये जो तुम्हारे द्वार खड़े हैं इनकी झोलियां खाली क्यों है? हे कान्हा! शिशुपाल को तुमने 100 अपराध होते ही मृत्युदण्ड देकर यह सन्देश दे​ दिया था कि तुम दुष्टों को कभी क्षमा नहीं करते, फिर तुम्हारी ही पृथ्वी पर ये हजारों शिशुपाल गलतियों की सीमाएं कब की पार कर चुके हैं, तुम क्यों उन्हें दण्डित नहीं करते। तुम्हारे सिवा कौन है जो इन शिशुपालों का सिर धड़ से अलग करेगा। द्रोपदी की एक आर्त पुकार सुनकर तुम्हारा हृदय इतना द्रवित हो उठा कि ​तुम उसकी लाज बचाने खुद दौड़े चले आये। आज तो हर नुक्कड़ पर द्रुपदसुताएं लुट रही है, क्या उनकी आर्त पुकार तुम तक नहीं पहुंच रही है। अधर्म के विरूद्ध जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हो धनुष छोड़कर बैठ गया तो तुम्ही ने उसे गीता का दिव्य ज्ञान दिया जिससे अर्जुन अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने को तैयार हुआ। हे मुरलीधर! तुम्हारे पार्थ तो अब भी किंकर्तव्यविमूढ़ है तुम्हारे अतिरिक्त कौन है जो सारथी बन पार्थ का मार्गदर्शन कर सके। युद्ध भूमि में अपने विराटरूप का दर्शन करवा तुमने ये बता दिया कि तुम्ही सर्वेश्वर हो, तुम्ही सृष्टि का आदि, मध्य एवं अन्त हो। तुम्हारे विस्तार की तो कोई सीमा ही नहीं है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुम्ही में समाया हुआ है। तो हे गिरधर! अब तो अपनी शेष शैया से उठो, तुम्हारी पृथ्वी को तुम्हारे सुदर्शन और तुम्हारी मुरली दोनों की आवश्यकता है। सुदर्शन से समस्त शिशुपालों एवं कौरवों नाश कर दो और अपनी मुरली से समस्त विश्व को प्रेम मय कर दो।

Sunday, 9 August 2020

पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा

 पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा

आज प्रात: भ्रमण के दौरान एक बकरे से मुलाकात हो गयी। बकरा कुछ ज्यादा ही अनमना एवं उदास दिख रहा था तो मैंने भी पूछ ही लिया — 

''क्या हुआ भाई उदास क्यों दिख रहे हो? खाने को घास नहीं मिल रही है क्या?''

बकरा बोला ''अरे भाई अभी तो बरसात का मौसम है चारों तरफ हरी  — हरी घास ही घास, भला इस मौसम में घास की क्या कमी।''

मैं — ''फिर किस बात ​की चिन्ता है? अब तो ईद भी निकल चुकी है।''

बकरा — ''अरे वो बात नहीं है भाई, मेरी चिन्ता दूसरी है, सही पूछो तो चिन्ता मेरी नहीं बल्कि पूरे बकरा समाज की है''

मैं — ''ऐसी क्या चिन्ता है? और कौन है इस चिन्ता का कारण।''

बकरा — ''दरअसल हमारी चिन्ता है हमारे अधिकारों पर अतिक्रमण?''

मैं — ''अधिकारों पर अतिक्रमण? किसने किया है तुम्हारे अधिकारों पर अतिक्रमण?''

बकरा — ''तुम लोगों ने और किसने''

मैं — ''हम लोगों ने? दिमाग तो ठीक है तुम्हारा? पता है क्या कह रहे हो?''

बकरा — ''मेरा दिमाग बिल्कुल ठीक है, बल्कि ये कहो कि सृष्टि में बकरों की उत्पति के बाद पहली बार हमारा दिमाग सही हुआ है। सालों से तुम लोग बकरों की जगह विधानसभा में इन्सानों को चुनकर भेज रहे हो। क्या ये हमारे अधिकारों का हनन नहीं है?''

मैं — ''क्या बक रहे हो? तुम्हे किसने कह दिया कि विधानसभा में बकरों को भेजा जाता है।''

​बकरा — ''तुम मुझे पुराना अशिक्षित बकरा मत समझो जो तुम्हारी हर बात मान जाता था। अब मैं वो मासूम जनता नहीं जो हर बार नेताओं के बहकावे में आ जाती है। तुम इन्सानों की संगत में रहकर तुम्हारे सारे छल प्रपंच अच्छी तरह पहचानने लगा हूॅं। मैं आज कल का पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा हूं, अखबार पढ़ लेता हूं, टी.वी. पर समाचार देखता हूॅं, सोशल मीडिया का भी प्रयोग करता हूॅं, अब अपने अधिकारों को अच्छी तरह पहचानने लगा हूॅं''

मैं — ''अच्छा कैसे समझाओ भला?''

बकरा — ''बताओ कौनसी योग्यता है जो हम नहीं रखते । जिस बाड़े बन्दी में तुम्हारे विधायकों को रखा जाता है उस बाड़े बन्दी में तो हम सृष्टि के आरम्भ से रहते आ रहे हैं। बाड़े में रहने के मामले में हम उनसे दो कदम आगे हैं बल्कि बाड़े में रहना तो हम बकरों का जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम्हारे नेताओं जितने पढ़े लिखे तो हम भी हैं। हमारी भी बोली लगती है और विधायकों की भी तो भला कैसे मानें कि वो बकरे नहीं है। बल्कि हममें तो उनसे भी बढ़कर एक गुण है कि हम अपने मालिक के वफादार है। यदि तुम उनकी जगह हमें चुनकर भेजोगे तो हम तुम्हारी भी पुरजोर तरीके से उठाएंगे। चुनावों में बेतहाशा पैसे बहाने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि हम घास खाते हैं नोट नहीं।''

मुझे बकरे के तर्कों के जवाब नहीं सूझ रहे थे

बकरा — ''अगर तुम लोगों को बकरे ही चुनने हैं तो अगले चुनावों में हम भी अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे, और तुम लोगों से भी निवेदन है कि हर बार झूठे बकरों को चुनते हो, इस बार सच्चे बकरों को चुनकर देखना। शायद कुछ बदलाव आ जाये।''

इतना कहकर बकरा वहां से चला गया

मैं निरूत्तर सा बकरे को जाते हुए देखता रहा जब तक वो आंखों से ओझल न हो गया

Saturday, 25 July 2020

सत्य


देख रहा हूॅं
कल तक जो
एक आलीशान और
बुलन्द ईमारत
हुआ करती थी
आज तब्दील हो चुकी है
एक टूटे हुए खण्डहर में
कल तक जो ईमारत
इतनी मजबूत थी
कि उसके तले हम
महफूज थे
हर आंधी तूफान से
हर बाढ़ और भूकम्प से
लेकिन
आज वही ईमारत
जर्जर है
संघर्षरत है
जूझ रही है
खुद के अस्तित्व से
कांप जाती है
हवा के झौंके से ही
यही तो है सत्य
ऐसे ही तो सभी
आलीशान ईमारतों को
एक दिन खण्डहर
हो ही जाना है

Friday, 24 July 2020

नाग पंचमी

सभी नागों को नाग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं। आज नागों का दिन है, आज विष वमन करने वाले नागों को भी दूध पिलाया जायगा, और सिर्फ आज ही पिलाया जायेगा। नाग भी ये बात भली भांति जानते हैं कि वह कल इन लोगों को दिख गया तो यही दूध पिलाने वाले लोग लाठी से पीट — पीट कर पिया हुआ दूध खून में से वापस निकाल लेंगे। लिहाजा वह कल सावधान हो जायेगा। 
हमारे देश में नागों को देवता का दर्जा मिला हुआ है। बॉलिवुड ने भी नागों पर कई फिल्में बनाकर उन्हें सम्मान दिया। श्रीदेवी ने तो न​गीना में 'इच्छाधारी नागिन' का कालजयी किरदार निभाया था। लेकिन समय के साथ ये इच्छा धारी नाग फिल्मों में से निकल कर अलग — अलग रूप धर कर इन्सानों के बीच छुप गये। इन्सान के रूप में होने के कारण इनको पहचानना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इनकी गतिविधियों पर ध्यान दें तो इनको पहचानने में देर नहीं लगेगी। ऐसे सॉंप जो पहले आस्तीनों में छुपे रहते थे वे सांप आजकल इंसान का रूप धरकर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं — ''वे भारत तेरे टुकड़े होंगे'', ''भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी'' जैसे नारे लगाते मिल जायेंगे। इन सॉंपों को देश विरोधी गतिविधियों में ज्यादा आनन्द आता हैं जो कि स्वाभाविक है क्योंकि वे पहले आस्तीन के ही सॉंप थे। कुछ सॉंप जो ज्यादा जहरीले थे वे सियासत में चले गये। वे अब मौखिक विषवमन करते हैं। इस रूप में उनके विष की मारक क्षमता भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गयी है। पहले उनके डसने से जहॉं सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु होती थी वहीं अब उनके विष वमन से हजारों लाखों लोग मारे जाते हैं। कुछ नाग मीडिया में चले गये और पत्रकार बन गये तो कुछ ने मजहब व जिहाद की घुट्टी पिला नये जहरीले सॉंप बनाने शुरू कर दिये। कुल मिलाकर कहना ये है कि ऐसे सॉंपों की पहचान कीजिये और मानव समाज में से ऐसे सॉंपों को अलग कीजिये क्योंकि कोरोना की वेक्सीन शायद मिल जाये लेकिन इनकी वेक्सीन मिलना शायद असम्भव है।

Tuesday, 21 July 2020

अब शबनम की बूँद बहुत है

तेरे सिवा तो लोग बहुत है
पर तन्हा माहौल बहुत है

इन राहों में मिला करो मत
इन राहों में लोग बहुत है

अब इनको भी जेल भेज दो
सत्ता में भी चोर बहुत है

जीवन हो गर भगतसिंह सा
जीने को चंद रोज बहुत हैं

इतने सावन बरस चुके की
अब शबनम की बूँद बहुत है

मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था

फिर यादों के शहर में मेला सा हो गया था
उनकी गली से गुजरे इक अरसा हो गया था

पत्थर भी हाय उस दम शर्मीन्दगी से पिघले
देखा जो रोटियों को बच्चा वो रो गया था

वो अब भी तेरी गलियों की खाक छानता है
इक दिन तेरी गली में दिल उसका खो गया था

मॉं के उठाये भी अब वो बेटा ना उठेगा
ओढ़ के तिरंगा वो लाल सो गया था

वो छोड़ के गया तो फिर लौट के ना आया
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था

Friday, 17 July 2020

मेरी कलम

मेरी कलम नहीं जो
दरबारों के आगे नाची हो
जिसकी स्याही राजनीति के
बाजारों से आती हो

मैं पैसों के लालच में कभी
शब्द बेच नहीं सकता हूँ
सत्ता को खुश करने झूठे
लेख नहीं लिख सकता हूँ

आकर्षण को नेह मानते

प्रेमी केवल रूह देखते
वो इसको नहीं देह मानते
वो भ्रम पाले बैठे हैं जो
आकर्षण को नेह मानते

सुन्दर मन से उनको क्या जो
सुन्दरता को देह मानते
मर्यादाएं बलि चढ़ाना
जीवन का सन्देश मानते

Friday, 10 July 2020

क्षणिकाएं

ओस की बून्द

मैं सुमन हूँ किसी वाटिका का प्रिये
मुझको माला में अपनी पिरो लीजिये
ज्यूं कोई वृक्ष बरसों से तप कर रहा 
ओस की बून्द ही बन भिगो दीजिये

पल

मुझे याद है बस वो गलियां
हाथ पकड़ हम संग गुजरे हैं
मैंने जीवन उसे ही माना
जो पल तेरे संग गुजरे है


जमीर 

पाप और पुण्य के जो बीच की लकीर है
ये वही लकीर है जो बोलता कबीर है
पश्चाताप की नमी न होती आँखों में अगर
तू जरा भी सुन लेता क्या बोलता जमीर है


मंजर 

(1)आँखों में बवण्डर देखे हैं
   यहॉं पीठ में खंजर देखे हैं
   जहॉं लगते थे बाजार कभी
   वहॉं मौत के मंजर देखे हैं


(2) दुनिया है एक नाटक
    कोई ना समझा पाया
    परदा उठा जो गिर के
    मंजर ही बदला पाया

नाविक

राह तेरी रोके उन तूफानों से लोहा लेता जा
साथ नहीं पतवार तो हाथों का ही दम दिखलाता जा
साहिल खुद जाने कब से तेरे स्वागत को आतुर है
ऐ नाविक हर हाल में तू अपनी कश्ती को खेता जा

बकरे
राजनीति में सारे पंछी पर कतरे हो जाते है
जिनको फूल समझते है हम वो कचरे हो जाते हैं
जाने कैसा जादू टोना सत्ता के गलियारों में
हमने नेता चुनकर भेजे वे बकरे हो जाते हैं


किताब

सारी दीवारें यादों की धुंधला गयी
तेरी तस्वीर अब भी इन आँखों में है
महका महका सा अब भी है घर ये मेरा
तेरे खत अब भी मेरी किताबों में है


मौन

कोई तो बात थी जो दबी रह गयी
जाने क्यूं दर्द भी हंस के वो सह गयी
हम अनाड़ी ही थे कुछ समझ ना सके
मौन रह कर भी वो जाने क्या कह गयी


खुशबु

मैं धरा प्यासी तुम बादलों की तरह
चाहते हम तुम्हे पागलों की तरह
खुद से तुझको मैं कैसे जुदा अब करूं
सांस में बस गये खुशबुओं की तरह

किरदार

ये गिरगिट हैं रंग इनके हर बार बदल जाते हैं
खबरें छपने से पहले अखबार बदल जाते हैं
कल तक वोटों की खातिर जो करबद्ध खड़े थे 
सत्ता में आकर उनके किरदार बदल जाते हैं

जहां

चंचल नयन वाण रोकती नहीं हो
सुन्दर अधर खोल बोलती नहीं हो
क्या स्वर्ग कोई उतरी हो अप्सरा
तुम इस जहां की तो लगती नहीं हो



महादेव

जो कंटक पथ पर चलते
होते सफल सदैव
मधु पीकर तो देव कहाते
विष पीकर महादेव


संघर्ष

मनुज कंटकों को राहों से
फूल समझ कर चुनता जा
संघर्षों के पार है मंजिल
तू बिना रुके बस चलता जा

प्रीत

प्रीत कुछ यूँ हृदय में उतर सी गयी
ठहरे सागर में दौड़ लहर सी गयी
कभी कबीरा दीवाना भटकता रहा
कभी मीरा दीवानी जहर पी गयी

दिन चुनाव वाले

कल तक लगता कौन भला इनकी सुध लेने वाले हैं।
जिनको किस्मत में भी कोसों दिखते नहीं उजाले है।
आज महीपों को मैंने उनके दर पर दण्डवत देखा।
लगता है दिन चुनाव वाले फिर से आने वाले हैं।।


आस का अंकुर
निशा का पार कर सागर रवि हर बार आयेगा
कभी अंधियार भी कोई दीये से पार पायेगा
भले कितनी ही बंजर हो निराशा की जमीं लेकिन
जो अंकुर आस से सींचों धरा को चीर जायेगा

Friday, 12 June 2020

लघुकथा : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते

लघुकथा : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते

पुरुषोत्तमलाल शहर के जाने माने वकील और नेता तो थे ही साथ ही एक बेहतरीन वक्ता भी थे। आज महिला दिवस की संध्या पर पर शहर में आयोजित एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।

''भाईयों और बहिनों! हम उस संस्कृति का हिस्सा है जहां नारी की पूजा की जाती है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता:' अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। इतिहास साक्षी है कि यहां नारी का अपमान करने वाले लंकेशों, दुर्योधनों व दुशासनों को अपने कुल सहित विनाश को प्राप्त होना पड़ा है। नारी शक्ति का केन्द्र है। हमें ऐसी गौरवशाली संस्कृति का हिस्सा होने पर गर्व है जिसने नारी को इतना सम्मान दिया है। आज कदाचित विश्व की किसी भी संस्कृति में नारी को वो सम्मान प्राप्त नहीं है जो हमारी संस्कृति में प्राप्त है।''

पुरुषोत्तमलाल धारा प्रवाह भाषण दे रहे थे, श्रोता भी मुग्ध होकर सुन रहे थे।

इतने में पुरुषोत्तमलाल का फोन बज उठता है और वो अपना उद्बोधन जल्दी समाप्त कर निकल जाते हैं।

पुरुषोतमलाल की पत्नी ने तीसरे बच्चे के रूप में कन्या को जन्म दिया था। दो बेटियां पहले से थी। जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ थे फिर भी पुरुषोत्तमलाल के चेहरे पर एक अजीब मायूसी थी। थोड़ी देर पहले नारी सम्मान पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले पुरुषोत्तमदास उसी नारी के अपने घर आगमन पर प्रसन्न दिखाई नहीं दे रहे थे। कदाचित उन्हें इस बार बेटे की आशा थी। वे दिल पर बोझ लिये घर पहुॅंचे।

उस रात के अन्धेरे ने एक बार फिर शहर के मुँह पर कालिख पोत दी थी और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते..' वाला वेद वाक्य सुबह होते होते शहर की किसी नाली में दम तोड़ गया।

अखबार के किसी छोटे से कोने में शहर में नवजात बच्ची का शव मिलने की खबर छपी थी।

Tuesday, 2 June 2020

एक गाँव का शहर को सन्देश

एक गाँव का शहर को सन्देश

है शहर तू बड़ा जानता हूँ मगर
भूख से मरते इंसां भी देखे यहीं
मैं भले एक छोटा सा गांव सही
जानवर भी यहां भूखे मरते नहीं

तेरी सड़कों पे नंगई बिखरी हुई
मेरी गलियों में शर्मो हया ​है खड़ी
यहां मातम में रोने को कन्धे बहुत
तेरे शहरों में लाशें भी तन्हा पड़ी

Sunday, 24 May 2020

कान्हा की मुरली

इक दिन इक मुरली वाला
मुरली बेचन गोकुल आया
मुरली की मीठी धुन सुनकर
कान्हा का जी भी ललचाया

बंशी की धुन से खींचा हुआ
कान्हा भागा सा जाता था
उस ओर जिधर मुरली वाला
मीठी सी तान सुनाता था

उसने देखा इक वृक्ष तले
वो मुरली वाला रहता था
अपने हाथों में मुरली ले 
वो सबको पुकारा करता था

नन्हा कान्हा जा बैठ पास
बोला मैं भी मुरली लूंगा
मुरली का जो भी मूल्य लगे
बाबा से लेकर दे दूंगा

मुरली ये कैसे बजती है
पहले मुझको भी सिखलाओ
अपने अधरों से छू करके
इक बार बजाकर दिखलाओ

मुरली वाला बोला कान्हा
कैसे ये मुरली बजाओगे?
आयु में भी तुम छोटे हो
ये काम नहीं कर पाओगे
 
कान्हा हठ कर बैठा बोला
मैं भी बंशी ये बजाऊंगा
मीठी सी तान बजा कर के
माँ - बाबा को दिखलाऊंगा

छोटी मुरली दे कान्हा को
बोला अधरों से लगाओ तो
कैसे इसको बजाओगे तुम
तनिक मुझे दिखलाओ तो

कान्हा ने मुरली ली कर में
बाले हे माँ शारद वर दो
मेरी मुरली भी बोल उठे
मेरी मुरली को भी स्वर दो

फिर कान्हा ने उस मुरली को
निज अधरों से ज्योंही छुआ
मुरली से मीठी तान उठी
मुरलीवाला भी चकित हुआ

सातों सुर नतमस्तक हो
मुरली की धुन पर यूं नाचे
मानों वे भी थे धन्य हुए 
जो कान्हा की मुरली बाजे

मुरली की धुन से सम्मोहित
सुरबालाएं भी थिरक उठी
पूरा गोकुल भी विस्मित था
आखिर ये कैसी तरंग उठी

जिसने भी उसकी तान सुनी
वो बेसुध होता जाता था 
उसके सुर के सम्मोहन में
ब्रह्माण्ड झूमता जाता था

मुरली वाला करबद्ध खड़ा
आँखों से आँसूं बहते थे
किन्तु अन्तर के भावों को
दो अधर बोल ना पाते थे

कान्हा की मुरली की धुन से 
शिव - ब्रह्मा भी हर्षाते थे
सुर समस्त करबद्ध खड़े
बस कान्हा का यश गाते थे

Friday, 22 May 2020

कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े

मैं हूं पत्थर सी मूरत में कौन गढ़े

लज्जा रेखा के इस पार कौन बढ़े

प्रेम की कोई भाषा तो होती नहीं

कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े

Monday, 11 May 2020

कहानी : सुबह का भूला

शहर से सोहन को शुरू से लगाव रहा है, शहर से आने वाले लड़के जब उसके सम्मुख शहरी चकाचौंध का वर्णन करते तो सोहन अपनी कल्पना में शहर का चित्र खींचने लग जाता। उनको जब नये एवं चमकदार वस्त्र पहने देखता तो स्वयं को उनके सामने बहुत निम्न श्रेणी का महसूस करता। गांव की कच्ची सड़कों एवं कच्चे मकानों को देख — देख कर मन ही मन दु:खी होता और ईश्वर को उलाहना देता कि उसे किसी शहर में क्यों नहीं पैदा किया। बार — बार के उलाहनों के बाद इस बार ईश्वर ने कदाचित सोहन का उलाहना सुन लिया था। सोहन का मित्र श्याम इस बार गर्मियों की छुट्टियों में गांव आया हुआ था। उसके सेठ की दुकान पर काम करने के लिये लड़कों की आवश्यकता थी। श्याम के कहने भर की ही देर थी। सोहन तो पहले से ही ऐसे किसी अवसर की प्रतीक्षा में था, खुशी — खुशी श्याम के साथ शहर के लिये रवाना हो गया। सोहन तो इतना उत्सुक था मानों अपनी प्रेमिका के प्रथम दर्शन के लिये जा रहा हो। सफर के दौरान रात्रि में सोया भी नहीं, क्या पता नीन्द में कितने शहर निकल जायेंगे और सोहन उन्हें निहारने से वंचित रह जायेगा। लगभग दो दिन व एक रात के सफर के बाद श्याम व सोहन शहर में उतर चुके थे। शाम का समय था, रंगीन रोशनियों से नहायी ऊॅंची—ऊॅंची ईमारतों को चीरती सड़क पर चलते हुए सोहन को स्वयं के इन्द्रपुरी में होने का आभास हो रहा था। कुछ मिनटों के पैदल सफर के बाद दोनों अपने निवास पर पहुंच गये। सुबह श्याम ने सोहन को अपने सेठ से मिलवा दिया। मासिक वेतन तय कर दिया गया। सोहन काम पर लग गया था। रहने के लिये छोटी सी खोली थी जिसमें श्याम और सोहन दोनों रहते थे। सुबह 9 से रात्रि 10 बजे तक काम और उसके बाद हाथों से भोजन बनाना और खाना बस यही सोहन की दिनचर्या थी। समय बीतता गया। धीरे — धीरे सोहन का शहर के प्रति आकर्षण कम होता गया। रात्रि के समय जब दुकान से घर लौटता तो रोशनी से नहाई इमारतें अब उसे पहले की तरह लुभाती नहीं थी। शहर के युवकों को आधुनिक वस्त्र पहने देख अब वह पहले की तरह उनकी तरफ आकर्षित भी नहीं होता था। 

समय रथ अपनी गति से चल रहा था। इसी दौरान देश में भयंकर महामारी फैल गयी। कई इससे बचाव की अभी तक कोई दवाई नहीं थी। इन्सानों के एक दूसरे से स्पर्श से ही यह बिमारी फैल जाती थी। शहरों में धनी आबादी होने के चलते यहां सबसे ज्यादा खतरा था, लिहाजा सरकार ने शहरों को अनिश्चितत काल के लिये बन्द कर दिया। ​24 घण्टे दौड़ने वाला शहर बिल्कुल थम गया। सड़कों पर मरघट का सन्नाटा पसर गया। लोग अपने घरों में दुबक गये। सड़कों पर पुलिस एवं रोगीवाहनों के अतिरिक्त कोई दिखाई न देता था। श्याम व सोहन अपनी कड़ी मेहनत के बाद भी महीने के अन्त में अपने लिये कोई ज्यादा बचत नहीं कर पाते थे। जो थोड़ी बहुत पुंजी उन्होंने जोड़ी थी वो कुछ ही दिनों में खर्च हो गयी।  खाने के लाले पड़ गये। साल भर के अनुभव ने सोहन को यह सिखा दिया था कि शहरों में लोग अपने पड़ौंसियों से भी ज्यादा मेल मिलाप नहीं रखते जबकि उसका पूरा गांव सिर्फ गांव न होकर एक परिवार था। किसी को भी छोटी सी समस्या होने पर गांव वाले उसकी पूरी मदद करते थे। उसके गांव में तो गाय व कुत्तों तक को भूखे नहीं मरने दिया जाता जबकि शहर में इन्सानों की भूख की भी किसीको चिन्ता नहीं है। चकाचौंध वाला शहर अब सोहन को काटने को दौड़ता था। 

मजदूरों की खस्ता हालत को देखते हुए सरकार ने उन्हें अपने — अपने गांव भेजने के लिये गाड़ियों की व्यवस्था कर दी। शहर भर के मजदूर अपने — अपने गांव जाने के लिये रवाना हो गये। श्याम व सोहन भी सरकारी गाड़ियों में लद गये। 

सुबह का भूला शाम को लौट आया था। दोनों गाड़ी से उतरते ही तेज कदमों से गांव की तरफ चल दिये। गांव के कच्चे मकान दूर से ही दिखाई दे रहे थे। जिस गांव को सोहन कोसता रहता था वही गांव आज मानों किसी मॉं की तरह अपने बच्चे की सारी गलतियों को क्षमा कर उसे अपने सीने से लगाने के लिये उतावला था और अपनी बांहें फैलाकर खड़ा था।

Saturday, 9 May 2020

कुत्तों का शहर

कुत्तों का शहर

दो कुत्ते शहर की लगभग सुनसान सड़क पर चहलकदमी करते चले जा रहे थे।

एक कुत्ता बोला ''क्या हुआ भाई! क्या शहर के ज्यादातर इंसान, शहर छोड़कर चले गये हैं ? सिर्फ इक्का — दुक्का लोग ही दिख रहे है।''

दुसरा — ''हॉं भाई मुझे भी ऐसा ही लगता है। पिछले काफी दिनों से देख रहा हूॅं, सड़क पर इन्सानों से ज्यादा तो कुत्ते नजर आ रहे हैं मानों इंसानों के शहर में कुत्ते नहीं बल्कि कुत्तों के शहर में इंसान घूम रहे हैं''

तभी पीछे की तरफ से आती हुई किसी गाड़ी का सायरन उन्हें सुनाई देता है।

''भागो! लगता है फिर से शहर में कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी आ गयी है। जान बचाना चाहते हो तो निकल लो यहां से।''

इतने में सायरन वाली गाड़ी आ पहुंचती है और उनसे थोड़ी ही दूरी पर रूकती है। गाड़ी में से विचित्र वेशभूषा वाले दो आदमी उतरते हैं जिन्होंने अपने पूरे शरीर को सफेद कपड़ों में ढक रखा है। वे दोनों आदमी किसी दूसरे ग्रह के प्राणी होने का आभास दे रहे थे। उन्होंने हाथों में दस्ताने पहने हुए हैं। वे दोनों आदमी सड़क पर चल रहे तीसरे आदमी को पकड़कर बलपूर्वक गाड़ी में धकेल देते हैं और गाड़ी वहां से चली जाती है।

सड़क पर खड़े दोनों कुत्ते विस्मय से एक दूसरे का मुँह देखने लग जाते हैं।

Thursday, 7 May 2020

शब्द बन गूंजूं

मैं हूं बादल मेरा क्या है
ज्यूं बहे पवन वहीं बह लूं

मुसाफिर हूं भरोसा क्या
बजी सिटी और चल दूं

तेरी दुनिया परेशां क्यूं
मिले ईश्वर तो मैं पूछूं

साधक हूँ बस शब्दों का
सिवा इसके मैं क्या चाहूँ

कभी जब देह ना रह पाए
मैं तब भी शब्द बन गूंजूं

Thursday, 30 April 2020

लघु कथा : मजदूर दिवस

लघु कथा : मजदूर दिवस
शहर के बिल्कुल पास निर्माणधीन सरकारी कॉलोनी में आज चहल पहल कुछ ज्यादा थी। हमेशा कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर आज अवकाश पर थे। सजे धजे होने के बाद भी उनके चेहरे पर वो तेज न दिखायी पड़ता था जो कड़ी मेहनत के बाद उनके धूल सने चेहरे पर हुआ करता था। आज मजदूर दिवस था और मंत्री महोदय आज मजदूरों से मिलने आ रहे थे। मंत्रीजी के लिये भव्य स्टेज का निर्माण किया जा चुका था। लोग मंत्रीजी के स्वागत के लिये हाथों में फूल मालाएं लेकर खड़े थे। परम्परानुसार मंत्रीजी नियत समय से ठीक 2 घण्टा विलम्ब से समारोह में पहुच गये। लोगों ने मन्त्री महोदय को फूल मालाओं से लाद दिया। मंच पर भव्य स्वागत के पश्चात् मंत्री महोदय ने अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया।
''मेरे मजदूर भाईयों! आप लोग ही देश की असली ताकत हैं। ​आपके योगदान के बिना देश विकास की कभी कल्पना नहीं कर सकता। आज हम देश में चारों ओर शानदार सड़कें, ऊंची — ऊंची ईमारतें, शानदार पुल देख रहे हैं इस चकाचौंध के पीछे आपके मेहनत छिपी है। आप सचमुच महान हैं।''
मंत्री महोदय ने मजदूरों के लिये लम्बा चौड़ा भाषण दिया। मजदूरों के कल्याण के लिये उन्होंन मंच से कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणाएं भी की। मंत्रीजी का भाषण सुन मजदूर भाव विभोर हो उठे। उन्हें लगा कि ये नेताजी सचमुच महान हैं जो उनका उद्धार करने के लिये आयें हैं। भाषण के पश्चात् मंत्रीजी मजदूरों से जाकर मिले एवं उनकी समस्याएं पूछी। इस दौरान दो — चार मजदूर नेता जो अपनी समस्याओं को लेकर मंत्रीजी से मिलने जा रहे थे उन्हें सुरक्षा कारणों से रोक लिया गया। इस बीच मंत्रीजी मजदूरों के साथ फोटो खिंचवाकर उन पर एक और उपकार कर चुके थे।
दूसरे दिन वही फोटो अखबारों में छपी जिसमें लिखा था कि मंत्रीजी ने मजदूरों से मिलकर उनकी समस्याओं का निवारण किया। मजदूरों के लिये की गयी घोषणाओं की सूची मंत्रीजी ने अगले वर्ष 'मजदूर दिवस' के लिये सम्भाल कर रखली । उधर महीने के अन्त में मजदूरों को पता चलता है कि उनकी एक दिन की मजदूरी काट ली गयी थी।

Tuesday, 28 April 2020

प्रेम — गीत

रात भर ही हवा सर्द चलती रही
कोई बाहों में मेरी पिघलती रही
कंपकंपाते थे लब कुछ कह ना सके
आंखे पर रात भर बात करती रही

सांस की डोरियां कुछ यूं गुंथ गयी
जितना सुलझाते हम वो उलझती रही
चुड़ियों की खनक, पायलों की छमक
रात के मौन पर चोट करती रही

मैं था सागर कोई और वो प्यासी नदी
रात भर मुझमें बह बह के मिलती रही
यूं लगा जैंसे बरसों की प्यासी धरा
पर वो बन के घटा बस बरसती रही

Monday, 27 April 2020

लघुकथा : गन्दी नजरें

लघुकथा : गन्दी नजरें
''अरे नेहा! कब तक पड़ी रहोगी, सिर्फ ग्यारह बजे तक की छूट है, फिर दुकानें बन्द हो जाएंगी सामान कैसे लाओगी।'' नेहा को डांटते हुए मॉं ने कहा
नेहा बोली — ''नहीं मॉं मैं नहीं जाउंगी, लोग बहुत गलत तरीके से छूते हैं''
मॉं बोली — ''कैसे छूते हैं, सरकार ने इतनी व्यवस्था कर रखी है, लोग भी इतने दूर — दूर खड़े होते हैं, मैंने खुद देखा है''
नेहा — ''मॉं सरकार की व्यवस्था उनके हाथों को रोक लेती है, लेकिन उनकी गन्दी नजरों का क्या जो मुझे पता नहीं कहां—कहां छूती है''

Saturday, 25 April 2020

लघुकथा : अट्टहास

लघुकथा : अट्टहास

दो साधु अपने हाथों में सनातन धर्म, सनातन संंस्कृति का दीपक लिये चले जा रहे थे। वे जहां से गुजरते अपनी संस्कृति का प्रकाश फैला देते थे। वो संस्कृति जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' में विश्वास रखती है। जो 'सर्वे सन्तु सुखिन:' की कामना करती है। वो संस्कृति जिस पर आघात पर आघात होते रहे लेकिन स्वयं कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। आगे साधु ज्ञान का प्रकाश फैलाते जा रहे थे और उनके पीछे थी उनके अनुयायियों की लम्बी भीड़। सहसा कुछ अधर्मी उन साधुओं का रास्ता रोक लेते हैं। धर्म का प्रकाश अधर्म को कभी रास नहीं आया है। अधर्मियों ने साधुओं का मार्ग अवरूद्ध कर युद्ध की चुनौती दी और उनके साथ घोर युद्ध किया। इस दौरान साधुओं के अनुयायियों की निष्क्रियता बहुत आश्चर्यजनक थी। अनुयायियों की जो भीड़ साधुओं के साथ चल रही थी उनमें से कुछ ही लोग दोनों साधुओं की सहायता के लिये आगे आने का साहस जुटा पाये थे। बाकी मूकदर्शक बने रहे। वीरता से लड़ते लड़ते जब दोनों साधुओं को अपने अन्त समय का अभास हो गया तो अपने पीछे मूक खड़े अनुयायियों की ओर देखा व जोर का अट्टहास किया मानों उन्हें कह रहे हो कि — ''हे मूढ़मतियों! ये आक्रमण हम पर नहीं बल्कि तुम पर हुआ है, तुम्हारी संस्कृति पर हुआ है। और अपनी संस्कृति के विनाश का दृश्य देखकर भी तुम मौन हो, परन्तु याद रखना यह मौन ही तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा।''

साधुओं ने फिर एक बार अट्टहास किया और वीर गति को प्राप्त हो गये।

Wednesday, 15 April 2020

व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट

व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट
राजस्थान में पिछले दिनों एक भयानक घटना घटी। एक सरकारी अध्यापक जरूरतमन्द बच्चों के लिये रखे हुए बिस्कट में से पूरे दो पैकेट बिस्किट खा गया। इतना भयानक घटना होने के बाद हर कोई हैरान था। आखिर शिक्षक को क्या हक था कि वो बिस्किट खा ले। माना कि कोरोना संक्रमण के दौरान शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो बिस्कट खा जायेगा। सब्र का फल मीठा होता है, कई लोग ये खाकर अपना पेट भर ही रहे हैं, वह भी भर लेता, बिस्किट खाने की जरूरत तो न पड़ती।
शिक्षक के बिस्किट के पैकेट खाने से पूरे राज्य में राहत सामग्री का भयंकर अकाल पड़ गया। चारों तरफ बिस्किट की मारामारी होने लगी। लोग भूखों मरने लगे। देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये समाचार कोरोना वायरस की तरह फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ईटली जैसे कई देशों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निन्दा की। हालात इतने भयावह हो गये कि कोरोना वायरस की जगह बिस्किट की कमी को सबसे बड़ी आपत्ति घोषित कर दिया गया। बाजार में अब कहीं बिस्किट देखने को नहीं मिल रहे थे क्योंकि सारे बिस्किट वो 'शिक्षक' खा गया था। शिक्षक के बिस्किट खाने से राज्य की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। आनन फानन में राज्य के मुख्यमंत्री को 'बिस्किट आपदा राहत कोष' के नाम से हजारों करोड़ रूपयों का फण्ड जारी करना पड़ा। सरकार ने अपने खाता नम्बर जारी कर दिये जिसमें लोग 'बिस्किट आपदा' से बचने के लिये भारी मात्रा में सहयोग राशि जमा करवा रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को दरकिनार कर राज्य में बिस्किट की फैक्ट्रियां फिर से शुरू करवा दी गई है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बिस्किट का उत्पादन किया जा सके। इसके अलावा कई दूसरे देशों से भी भारी मात्रा में बिस्किट आयात किया जा रहा है ताकि 'शिक्षक' ने जो बिस्किट खाये थे उसकी कमी पूरी की जा सके। सरकार ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि किसी को भी बिस्किट की कमी से नहीं मरने दिया जायेगा। बिस्किट आपदा से निपटने के बाद कोरोना पर विचार किया जायेगा।

Monday, 13 April 2020

अन्धाधुनिकता

लघुकथा :आधुनिकता से अंधाधुनिकता
धस मोनिका शिक्षिका थी। उनका पालन पोषण शहर में हुआ था। पश्चिमी सभ्यता से बहुत प्रभावित थी। अबकी बार उनका तबादला रामपुर कर दिया गया था जो उनके शहर से काफी दूर था। लिहाजा मिस मोनिका के पास अनमने मन से ही सही रामपुर बसने के सिवाय कोई रास्ता न था। आज वे अपने लिये किराये का घर देखने आई थी। पाश्चात्य परिधान लपेटे मोनिका जब रामपुर पहुंची तो कमोबेश हर किसी की नजर उसी पर थी। मेले या हाट से जो कपड़े छोटे बच्चों के लिये लाते हैं कमोबेश वैसे ही वस्त्रों में युवती को देख लोग भी चकित थे।
बहुत देखने पर मोनिका को एक मकान पसन्द आया। मकान मालकिन रेवती उसे पूरा मकान दिखा रही थी। 'आधुनिकता' की साधक मोनिका को ग्रामीण परिवेश पसन्द नहीं था लेकिन विवशता थी। वे देखते — देखते बातों ही बातों में बोली — ''शहर की आधुनिकता की तुलना में गांवों में कितना पिछड़ा पन है, यहां आधुनिकता को हेय दृष्टि से देखा जाता है, सुन्दरता का कोई मोल नहीं है। अब तुम ही बताओ, सुन्दरता को यदि वस्त्रों से ढक लिया तो भला सुन्दरता का क्या मतलब? यदि ईश्वर ने हमें सौन्दर्य दिया है तो हम क्यों ना दिखाएं।''
मानिका जहां अपनी आधुनिकता का बखान करती जा रही थी वहीं रेवती बिना उत्तर दिये मकान बता रही थी। सहसा रेवती एक दरवाजे के सामने रूकी और बोली —
''मैडम ये आपका बाथरूम है, इसकी खिड़की बाहर की तरफ खुलती है, और हां अपने आप को 'आधनिक' से ' अन्धाधुनिक बचाने के लिये नहाते समय इस खिड़की को जरूर बन्द रखियेगा''

Wednesday, 8 April 2020

ये लॉक-डाउन कभी न खुले

लघु कथा
ये लॉक—डाउन कभी ना खुले

कपिल बालकनी पर खड़ा शहर की सूनी सड़कों को ताक रहा था। कभी न थमने वाले शहर में आज मरघट का सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन भर इन्सानों की चहलकदमी से आबाद रहने वाली सड़कों पर आज कुत्ते निश्चिंत होकर दौड़ रहे थे। आज उन्हें किसी गाड़ी के नीचे कुचले जाने का भय भी न था। लॉक डाउन ने जैसे जीवन की गति को थाम कर रख दिया था। अन्यथा कपिल को इतना समय कहां था। भाग दौड़ भरी जिन्दगी में कपिल को पता ही नहीं चला कि कब उसकी शादी को पांच साल बीत गये। सुबह आॅफिस जाना और देर रात तक लौटना, भोजन करना और सो जाना। सुबह होते ही फिर वही क्रम, कभी — कभी तो उसे लगता कि वो इंसान नहीं बल्कि मशीन बनकर रह गया है। उसने बालकनी ने नजरें हटाकर घर में दौड़ाई। राधा हमेशा की तरह अपने काम में लगी हुई थी। उसके लिये तो लॉकडाउन के कोई मायने ही नहीं थे। शादी से पहले कितना खुश थी वो। कितने सपने देख रखे थे उसने। शिमला — मनाली घूमने का प्लान भी बना रखा था। लेकिन कपिल अपनी व्यस्तता के चलते कभी उसे समय ही नहीं दे पाया। राधा ने भी कभी शिकायत नहीं की। कपिल को याद नहीं कि इन पांच सालों के दौरान वे दोनों कभी प्रेम से बतियाये हों, जैसे वो शा​दी से पहले किया करते थे। वो स्मृतियों से बाहर आया। आज राधा उसे हमेशा से सुन्दर लग रही थी । कपिल न जाने ऐसे कितने पल गंवा चुका था। लेकिन अब वो उसे नहीं गंवाना चाहता था। उसने आगे बढ़कर राधा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया । आँखें — आँखों से टकराई मानों उलाहना दे रही हो कि 'अब तक कहां थे'। कपिल ने राधा को सीने से लगा लिया। राधा मन ही मन सोच रही थी — काश ये 'लॉक—डाउन' कभी ना खुले।

Tuesday, 25 February 2020

आस्तीन के सांप

मन में जिसके छल भरा हो, सच्चे की करता नकल है
उसको ही छलता सदा है, जो सहज है जो सरल है
आस्तीनों में तुम अपनी, सांप रखना छोड़ दो अब
कितना ही अमृत पिला दो, उगलता हर दम गरल है

Thursday, 20 February 2020

अन 'पढ़'


मेरी मॉं अनपढ़ नहीं है
कुछ 'लिख' भले ना पाये
लेकिन
'पढ़' लिया करती है
मेरे चेहरे के भावों को
तब से
जब बोल भी नहीं
पाता था मैं
आज मैं बहुत कुछ
'लिख' सकता हूं
किन्तु 'पढ़' नहीं सकता
'मॉं' के चेहरे के भावों को
मैं सच में अन 'पढ़' हूॅं