Friday, 11 December 2020
लघुकथा : जिम्मेदारियों का बोझ
Friday, 30 October 2020
गांव दिखा दूँ
Saturday, 17 October 2020
नवरात्रि और कन्यापूजन
Tuesday, 6 October 2020
लघु कथा : शहर का नंबर
Monday, 14 September 2020
हिंदी दिवस
Wednesday, 2 September 2020
जंगल में लोकतंत्र
Friday, 28 August 2020
एक चिड़िया की कहानी
एक चिड़िया की कहानी
एक बार अपनी बगिया में
मैं चुप बैठा सोच रहा था
क्यूं बगिया के फूल ना खिलते
मन चिन्ता में डोल रहा था
तब मैंने देखा इक नन्ही
चिड़िया पास में आ बैठी थी
मन के ठहरे सागर में ज्यू
कोई ऊँची लहर उठी थी
चिड़िया को दाने डाले तो
चिड़िया चहक चहक उठी थी
चिड़िया की चहकन से मेरी
पूरी बगिया महक उठी थी
चिड़िया के आने से मानो
मेरी बगिया भी हर्षाई
मुरझाये सब फूल खिले थे
मानों बसन्त ऋतु हो आई
बगिया के इक पेड़ की डाली
उस चिड़िया ने किया बसेरा
पेड़ भी उसको पाकर झूमा
उसको चूमा खूब दुलारा
अब चिन्ता की सारी बातें
बीते जीवन का हिस्सा थी
चिड़िया से मेरा जीवन था
वो जीवन का इक हिस्सा थी
दाना लेकर उसे मनाता
कभी रूठ जब वो जाती थी
पहले तो थोड़ा इतराती
फिर गोदी में आ जाती थी
कभी दौड़ती आगे - आगे
और मैं पीछे - पीछे जाता
कभी ढूंढने मुझको आती
मैं जब कोने में छिप जाता
ऐसे ही हंसते गाते से
मेरे भी दिन बीत रहे थे
लेकिन इतना पता नहीं था
दिन खुशियों के रीत रहे हैं
मेरी चिड़िया हुई सयानी
यौवन ने आ डाला डेरा
मेरी चिड़िया के दिल में भी
एक चिड़े ने किया बसेरा
अपने सपनों का साथी पा
वो चिड़िया भी अब खुश रहती
लेकिन जब भी मिलती मुझसे
जाने क्यूं चुप चुप सी रहती
एक बार मैंने उन दोनों
चिड़े चिड़ी को बुलावाया था
चिड़िया शरमाती सी आयी
और चिड़ा था घबराया सा
दोनों को फिर पास बिठाकर
चिड़िया को सीने से लगाया
बोला साथ चिड़े के रहना
मैं अब तुमसे हुआ पराया
चिड़िया बोली बाबुल तुमसे
दूर कभी ना मैं जाउंगी
तेरे आंगन में चहकूंगी
तेरे आंगन में गाउंगी
मैं बोला सुन पगली ये तो
रीत सदा से चलती आई
छोड़ के आंगन उड़ जाना है
जिस आंगन है पलती आई
छलक उठे नयनों के सागर
फिर बिदाई की बेला आई
मेरी बगिया में भी फिर से
पतझड़ सी मायूसी छाई
आँखों में आँसूं ले चिड़िया
साथ चिड़े के उड़ती जाती
मेरी बगिया में भी पल - पल
एक उदासी बढ़ती जाती
चिड़िया के जाने से मेरी
बगिया का हर फूल था रोया
ओढ़ निशा की काली चादर
सूरज भी गुमसुम था सोया
Tuesday, 11 August 2020
जन्माष्टमी पर विशेष आलेख
ऐ कान्हा! वैसे तो तुम अजन्मा हो, चराचर जगत तुम्ही से जन्म पाता है और फिर तुम्ही में मिल जाता है। फिर भी सांसारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए तुम्हे जन्मदिन की शुभकामनाएं तो देनी बनती ही है। पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिये तुमने मानव देह धारी, पापियों का नाश किया, धर्म की रक्षा की। समरांगण में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को गीता का दिव्य ज्ञान दिया जो हजारों वर्षों बाद भी मानवों का मार्गदर्शन कर रहा है। किन्तु अपने धाम जाने के बाद शायद इस पृथ्वी लोक की सुध लेना भूल गये हो। तुम्हे पता है जिस धर्म की तुम स्थापना करके गये थे वो धर्म अब मृत्युशैया सांसों की डोर को सिर्फ तुम्हारी प्रतीक्षा में पकड़े हुए है, क्यूंकि तुम्ही तो कहकर गये थे कि मैं हर युग मैं आउंगा, जब — जब धर्म की हानि होगी तब — तब आउंगा। धर्म को बस उसी बात का भरोसा है। तुम्हारे जन्म लेते ही कारागार के ताले स्वयं ही खुल गये थे, तो अब क्यों नहीं खोल देते लोगों के हृदयों पर पड़े ताले, जिनके चलते वे भावना शून्य हो चुके हैं। तुम तो चोरी में कुशल हो, बचपन में लोगों के घरों का माखन चुरा लेते थे, किशोर हुए तो गोपियों का हृदय चुरा लिया, फिर क्यों नहीं चुरा लेते लोगों के मन में भरा पाप, घृणा, द्वेष, अहंकार, और उनके स्थान पर अपनी मुरली की तान से उसमें प्रेम क्यों नहीं भर देते। हे गिरधर! गोकुल को इन्द्र के कोप से बचाने के लिये तुमने गोवर्धन को उठा लिया था, इन्द्र को अहंकार त्याग तुम्हारे आगे नतमस्तक होना पड़ा था। फिर क्यों इन्द्र को आदेश नहीं देते कि उसके बादल बाढ़ वाले क्षेत्र पर थोड़ा कम बरसे और उन मरूस्थलों में जमकर बरसें जहां उनका इन्तजार करते — करते लाखों करोड़ों आंखें पथरा गयी है। सुदामा को तो तुमने दो मुट्ठी चावल के बदले अपना सब कुछ लुटा दिया था। तुम तो स्वयं लक्ष्मी पति हो, फिर ये जो तुम्हारे द्वार खड़े हैं इनकी झोलियां खाली क्यों है? हे कान्हा! शिशुपाल को तुमने 100 अपराध होते ही मृत्युदण्ड देकर यह सन्देश दे दिया था कि तुम दुष्टों को कभी क्षमा नहीं करते, फिर तुम्हारी ही पृथ्वी पर ये हजारों शिशुपाल गलतियों की सीमाएं कब की पार कर चुके हैं, तुम क्यों उन्हें दण्डित नहीं करते। तुम्हारे सिवा कौन है जो इन शिशुपालों का सिर धड़ से अलग करेगा। द्रोपदी की एक आर्त पुकार सुनकर तुम्हारा हृदय इतना द्रवित हो उठा कि तुम उसकी लाज बचाने खुद दौड़े चले आये। आज तो हर नुक्कड़ पर द्रुपदसुताएं लुट रही है, क्या उनकी आर्त पुकार तुम तक नहीं पहुंच रही है। अधर्म के विरूद्ध जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हो धनुष छोड़कर बैठ गया तो तुम्ही ने उसे गीता का दिव्य ज्ञान दिया जिससे अर्जुन अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने को तैयार हुआ। हे मुरलीधर! तुम्हारे पार्थ तो अब भी किंकर्तव्यविमूढ़ है तुम्हारे अतिरिक्त कौन है जो सारथी बन पार्थ का मार्गदर्शन कर सके। युद्ध भूमि में अपने विराटरूप का दर्शन करवा तुमने ये बता दिया कि तुम्ही सर्वेश्वर हो, तुम्ही सृष्टि का आदि, मध्य एवं अन्त हो। तुम्हारे विस्तार की तो कोई सीमा ही नहीं है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुम्ही में समाया हुआ है। तो हे गिरधर! अब तो अपनी शेष शैया से उठो, तुम्हारी पृथ्वी को तुम्हारे सुदर्शन और तुम्हारी मुरली दोनों की आवश्यकता है। सुदर्शन से समस्त शिशुपालों एवं कौरवों नाश कर दो और अपनी मुरली से समस्त विश्व को प्रेम मय कर दो।
Sunday, 9 August 2020
पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा
पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा
आज प्रात: भ्रमण के दौरान एक बकरे से मुलाकात हो गयी। बकरा कुछ ज्यादा ही अनमना एवं उदास दिख रहा था तो मैंने भी पूछ ही लिया —
''क्या हुआ भाई उदास क्यों दिख रहे हो? खाने को घास नहीं मिल रही है क्या?''
बकरा बोला ''अरे भाई अभी तो बरसात का मौसम है चारों तरफ हरी — हरी घास ही घास, भला इस मौसम में घास की क्या कमी।''
मैं — ''फिर किस बात की चिन्ता है? अब तो ईद भी निकल चुकी है।''
बकरा — ''अरे वो बात नहीं है भाई, मेरी चिन्ता दूसरी है, सही पूछो तो चिन्ता मेरी नहीं बल्कि पूरे बकरा समाज की है''
मैं — ''ऐसी क्या चिन्ता है? और कौन है इस चिन्ता का कारण।''
बकरा — ''दरअसल हमारी चिन्ता है हमारे अधिकारों पर अतिक्रमण?''
मैं — ''अधिकारों पर अतिक्रमण? किसने किया है तुम्हारे अधिकारों पर अतिक्रमण?''
बकरा — ''तुम लोगों ने और किसने''
मैं — ''हम लोगों ने? दिमाग तो ठीक है तुम्हारा? पता है क्या कह रहे हो?''
बकरा — ''मेरा दिमाग बिल्कुल ठीक है, बल्कि ये कहो कि सृष्टि में बकरों की उत्पति के बाद पहली बार हमारा दिमाग सही हुआ है। सालों से तुम लोग बकरों की जगह विधानसभा में इन्सानों को चुनकर भेज रहे हो। क्या ये हमारे अधिकारों का हनन नहीं है?''
मैं — ''क्या बक रहे हो? तुम्हे किसने कह दिया कि विधानसभा में बकरों को भेजा जाता है।''
बकरा — ''तुम मुझे पुराना अशिक्षित बकरा मत समझो जो तुम्हारी हर बात मान जाता था। अब मैं वो मासूम जनता नहीं जो हर बार नेताओं के बहकावे में आ जाती है। तुम इन्सानों की संगत में रहकर तुम्हारे सारे छल प्रपंच अच्छी तरह पहचानने लगा हूॅं। मैं आज कल का पढ़ा लिखा डिजिटल बकरा हूं, अखबार पढ़ लेता हूं, टी.वी. पर समाचार देखता हूॅं, सोशल मीडिया का भी प्रयोग करता हूॅं, अब अपने अधिकारों को अच्छी तरह पहचानने लगा हूॅं''
मैं — ''अच्छा कैसे समझाओ भला?''
बकरा — ''बताओ कौनसी योग्यता है जो हम नहीं रखते । जिस बाड़े बन्दी में तुम्हारे विधायकों को रखा जाता है उस बाड़े बन्दी में तो हम सृष्टि के आरम्भ से रहते आ रहे हैं। बाड़े में रहने के मामले में हम उनसे दो कदम आगे हैं बल्कि बाड़े में रहना तो हम बकरों का जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम्हारे नेताओं जितने पढ़े लिखे तो हम भी हैं। हमारी भी बोली लगती है और विधायकों की भी तो भला कैसे मानें कि वो बकरे नहीं है। बल्कि हममें तो उनसे भी बढ़कर एक गुण है कि हम अपने मालिक के वफादार है। यदि तुम उनकी जगह हमें चुनकर भेजोगे तो हम तुम्हारी भी पुरजोर तरीके से उठाएंगे। चुनावों में बेतहाशा पैसे बहाने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि हम घास खाते हैं नोट नहीं।''
मुझे बकरे के तर्कों के जवाब नहीं सूझ रहे थे
बकरा — ''अगर तुम लोगों को बकरे ही चुनने हैं तो अगले चुनावों में हम भी अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे, और तुम लोगों से भी निवेदन है कि हर बार झूठे बकरों को चुनते हो, इस बार सच्चे बकरों को चुनकर देखना। शायद कुछ बदलाव आ जाये।''
इतना कहकर बकरा वहां से चला गया
मैं निरूत्तर सा बकरे को जाते हुए देखता रहा जब तक वो आंखों से ओझल न हो गया
Saturday, 25 July 2020
सत्य
देख रहा हूॅं
कल तक जो
एक आलीशान और
बुलन्द ईमारत
हुआ करती थी
आज तब्दील हो चुकी है
एक टूटे हुए खण्डहर में
कल तक जो ईमारत
इतनी मजबूत थी
कि उसके तले हम
महफूज थे
हर आंधी तूफान से
हर बाढ़ और भूकम्प से
लेकिन
आज वही ईमारत
जर्जर है
संघर्षरत है
जूझ रही है
खुद के अस्तित्व से
कांप जाती है
हवा के झौंके से ही
यही तो है सत्य
ऐसे ही तो सभी
आलीशान ईमारतों को
एक दिन खण्डहर
हो ही जाना है
Friday, 24 July 2020
नाग पंचमी
Tuesday, 21 July 2020
अब शबनम की बूँद बहुत है
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था
उनकी गली से गुजरे इक अरसा हो गया था
पत्थर भी हाय उस दम शर्मीन्दगी से पिघले
देखा जो रोटियों को बच्चा वो रो गया था
वो अब भी तेरी गलियों की खाक छानता है
इक दिन तेरी गली में दिल उसका खो गया था
मॉं के उठाये भी अब वो बेटा ना उठेगा
ओढ़ के तिरंगा वो लाल सो गया था
वो छोड़ के गया तो फिर लौट के ना आया
मानो वो कोई गुजरा वक्त हो गया था
Friday, 17 July 2020
मेरी कलम
दरबारों के आगे नाची हो
जिसकी स्याही राजनीति के
बाजारों से आती हो
मैं पैसों के लालच में कभी
शब्द बेच नहीं सकता हूँ
सत्ता को खुश करने झूठे
लेख नहीं लिख सकता हूँ
आकर्षण को नेह मानते
Friday, 10 July 2020
क्षणिकाएं
नाविक
राह तेरी रोके उन तूफानों से लोहा लेता जा
साथ नहीं पतवार तो हाथों का ही दम दिखलाता जा
साहिल खुद जाने कब से तेरे स्वागत को आतुर है
ऐ नाविक हर हाल में तू अपनी कश्ती को खेता जा
जहां
चंचल नयन वाण रोकती नहीं हो
सुन्दर अधर खोल बोलती नहीं हो
क्या स्वर्ग कोई उतरी हो अप्सरा
तुम इस जहां की तो लगती नहीं हो
प्रीत
प्रीत कुछ यूँ हृदय में उतर सी गयी
ठहरे सागर में दौड़ लहर सी गयी
कभी कबीरा दीवाना भटकता रहा
कभी मीरा दीवानी जहर पी गयी
Friday, 12 June 2020
लघुकथा : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते
लघुकथा : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते
पुरुषोत्तमलाल शहर के जाने माने वकील और नेता तो थे ही साथ ही एक बेहतरीन वक्ता भी थे। आज महिला दिवस की संध्या पर पर शहर में आयोजित एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।
''भाईयों और बहिनों! हम उस संस्कृति का हिस्सा है जहां नारी की पूजा की जाती है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता:' अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। इतिहास साक्षी है कि यहां नारी का अपमान करने वाले लंकेशों, दुर्योधनों व दुशासनों को अपने कुल सहित विनाश को प्राप्त होना पड़ा है। नारी शक्ति का केन्द्र है। हमें ऐसी गौरवशाली संस्कृति का हिस्सा होने पर गर्व है जिसने नारी को इतना सम्मान दिया है। आज कदाचित विश्व की किसी भी संस्कृति में नारी को वो सम्मान प्राप्त नहीं है जो हमारी संस्कृति में प्राप्त है।''
पुरुषोत्तमलाल धारा प्रवाह भाषण दे रहे थे, श्रोता भी मुग्ध होकर सुन रहे थे।
इतने में पुरुषोत्तमलाल का फोन बज उठता है और वो अपना उद्बोधन जल्दी समाप्त कर निकल जाते हैं।
पुरुषोतमलाल की पत्नी ने तीसरे बच्चे के रूप में कन्या को जन्म दिया था। दो बेटियां पहले से थी। जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ थे फिर भी पुरुषोत्तमलाल के चेहरे पर एक अजीब मायूसी थी। थोड़ी देर पहले नारी सम्मान पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले पुरुषोत्तमदास उसी नारी के अपने घर आगमन पर प्रसन्न दिखाई नहीं दे रहे थे। कदाचित उन्हें इस बार बेटे की आशा थी। वे दिल पर बोझ लिये घर पहुॅंचे।
उस रात के अन्धेरे ने एक बार फिर शहर के मुँह पर कालिख पोत दी थी और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते..' वाला वेद वाक्य सुबह होते होते शहर की किसी नाली में दम तोड़ गया।
अखबार के किसी छोटे से कोने में शहर में नवजात बच्ची का शव मिलने की खबर छपी थी।
Tuesday, 2 June 2020
एक गाँव का शहर को सन्देश
एक गाँव का शहर को सन्देश
है शहर तू बड़ा जानता हूँ मगर
भूख से मरते इंसां भी देखे यहीं
मैं भले एक छोटा सा गांव सही
जानवर भी यहां भूखे मरते नहीं
तेरी सड़कों पे नंगई बिखरी हुई
मेरी गलियों में शर्मो हया है खड़ी
यहां मातम में रोने को कन्धे बहुत
तेरे शहरों में लाशें भी तन्हा पड़ी
Sunday, 24 May 2020
कान्हा की मुरली
Friday, 22 May 2020
कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े
मैं हूं पत्थर सी मूरत में कौन गढ़े
लज्जा रेखा के इस पार कौन बढ़े
प्रेम की कोई भाषा तो होती नहीं
कोई तो हो जो मेरा भी मौन पढ़े
Monday, 11 May 2020
कहानी : सुबह का भूला
Saturday, 9 May 2020
कुत्तों का शहर
कुत्तों का शहर
दो कुत्ते शहर की लगभग सुनसान सड़क पर चहलकदमी करते चले जा रहे थे।
एक कुत्ता बोला ''क्या हुआ भाई! क्या शहर के ज्यादातर इंसान, शहर छोड़कर चले गये हैं ? सिर्फ इक्का — दुक्का लोग ही दिख रहे है।''
दुसरा — ''हॉं भाई मुझे भी ऐसा ही लगता है। पिछले काफी दिनों से देख रहा हूॅं, सड़क पर इन्सानों से ज्यादा तो कुत्ते नजर आ रहे हैं मानों इंसानों के शहर में कुत्ते नहीं बल्कि कुत्तों के शहर में इंसान घूम रहे हैं''
तभी पीछे की तरफ से आती हुई किसी गाड़ी का सायरन उन्हें सुनाई देता है।
''भागो! लगता है फिर से शहर में कुत्तों को पकड़ने वाली गाड़ी आ गयी है। जान बचाना चाहते हो तो निकल लो यहां से।''
इतने में सायरन वाली गाड़ी आ पहुंचती है और उनसे थोड़ी ही दूरी पर रूकती है। गाड़ी में से विचित्र वेशभूषा वाले दो आदमी उतरते हैं जिन्होंने अपने पूरे शरीर को सफेद कपड़ों में ढक रखा है। वे दोनों आदमी किसी दूसरे ग्रह के प्राणी होने का आभास दे रहे थे। उन्होंने हाथों में दस्ताने पहने हुए हैं। वे दोनों आदमी सड़क पर चल रहे तीसरे आदमी को पकड़कर बलपूर्वक गाड़ी में धकेल देते हैं और गाड़ी वहां से चली जाती है।
सड़क पर खड़े दोनों कुत्ते विस्मय से एक दूसरे का मुँह देखने लग जाते हैं।
Thursday, 7 May 2020
शब्द बन गूंजूं
Thursday, 30 April 2020
लघु कथा : मजदूर दिवस
शहर के बिल्कुल पास निर्माणधीन सरकारी कॉलोनी में आज चहल पहल कुछ ज्यादा थी। हमेशा कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर आज अवकाश पर थे। सजे धजे होने के बाद भी उनके चेहरे पर वो तेज न दिखायी पड़ता था जो कड़ी मेहनत के बाद उनके धूल सने चेहरे पर हुआ करता था। आज मजदूर दिवस था और मंत्री महोदय आज मजदूरों से मिलने आ रहे थे। मंत्रीजी के लिये भव्य स्टेज का निर्माण किया जा चुका था। लोग मंत्रीजी के स्वागत के लिये हाथों में फूल मालाएं लेकर खड़े थे। परम्परानुसार मंत्रीजी नियत समय से ठीक 2 घण्टा विलम्ब से समारोह में पहुच गये। लोगों ने मन्त्री महोदय को फूल मालाओं से लाद दिया। मंच पर भव्य स्वागत के पश्चात् मंत्री महोदय ने अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया।
''मेरे मजदूर भाईयों! आप लोग ही देश की असली ताकत हैं। आपके योगदान के बिना देश विकास की कभी कल्पना नहीं कर सकता। आज हम देश में चारों ओर शानदार सड़कें, ऊंची — ऊंची ईमारतें, शानदार पुल देख रहे हैं इस चकाचौंध के पीछे आपके मेहनत छिपी है। आप सचमुच महान हैं।''
मंत्री महोदय ने मजदूरों के लिये लम्बा चौड़ा भाषण दिया। मजदूरों के कल्याण के लिये उन्होंन मंच से कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणाएं भी की। मंत्रीजी का भाषण सुन मजदूर भाव विभोर हो उठे। उन्हें लगा कि ये नेताजी सचमुच महान हैं जो उनका उद्धार करने के लिये आयें हैं। भाषण के पश्चात् मंत्रीजी मजदूरों से जाकर मिले एवं उनकी समस्याएं पूछी। इस दौरान दो — चार मजदूर नेता जो अपनी समस्याओं को लेकर मंत्रीजी से मिलने जा रहे थे उन्हें सुरक्षा कारणों से रोक लिया गया। इस बीच मंत्रीजी मजदूरों के साथ फोटो खिंचवाकर उन पर एक और उपकार कर चुके थे।
दूसरे दिन वही फोटो अखबारों में छपी जिसमें लिखा था कि मंत्रीजी ने मजदूरों से मिलकर उनकी समस्याओं का निवारण किया। मजदूरों के लिये की गयी घोषणाओं की सूची मंत्रीजी ने अगले वर्ष 'मजदूर दिवस' के लिये सम्भाल कर रखली । उधर महीने के अन्त में मजदूरों को पता चलता है कि उनकी एक दिन की मजदूरी काट ली गयी थी।
Tuesday, 28 April 2020
प्रेम — गीत
कोई बाहों में मेरी पिघलती रही
कंपकंपाते थे लब कुछ कह ना सके
आंखे पर रात भर बात करती रही
सांस की डोरियां कुछ यूं गुंथ गयी
जितना सुलझाते हम वो उलझती रही
चुड़ियों की खनक, पायलों की छमक
रात के मौन पर चोट करती रही
मैं था सागर कोई और वो प्यासी नदी
रात भर मुझमें बह बह के मिलती रही
यूं लगा जैंसे बरसों की प्यासी धरा
पर वो बन के घटा बस बरसती रही
Monday, 27 April 2020
लघुकथा : गन्दी नजरें
''अरे नेहा! कब तक पड़ी रहोगी, सिर्फ ग्यारह बजे तक की छूट है, फिर दुकानें बन्द हो जाएंगी सामान कैसे लाओगी।'' नेहा को डांटते हुए मॉं ने कहा
नेहा बोली — ''नहीं मॉं मैं नहीं जाउंगी, लोग बहुत गलत तरीके से छूते हैं''
मॉं बोली — ''कैसे छूते हैं, सरकार ने इतनी व्यवस्था कर रखी है, लोग भी इतने दूर — दूर खड़े होते हैं, मैंने खुद देखा है''
नेहा — ''मॉं सरकार की व्यवस्था उनके हाथों को रोक लेती है, लेकिन उनकी गन्दी नजरों का क्या जो मुझे पता नहीं कहां—कहां छूती है''
Saturday, 25 April 2020
लघुकथा : अट्टहास
Wednesday, 15 April 2020
व्यंग्य : शिक्षक और बिस्किट
राजस्थान में पिछले दिनों एक भयानक घटना घटी। एक सरकारी अध्यापक जरूरतमन्द बच्चों के लिये रखे हुए बिस्कट में से पूरे दो पैकेट बिस्किट खा गया। इतना भयानक घटना होने के बाद हर कोई हैरान था। आखिर शिक्षक को क्या हक था कि वो बिस्किट खा ले। माना कि कोरोना संक्रमण के दौरान शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो बिस्कट खा जायेगा। सब्र का फल मीठा होता है, कई लोग ये खाकर अपना पेट भर ही रहे हैं, वह भी भर लेता, बिस्किट खाने की जरूरत तो न पड़ती।
शिक्षक के बिस्किट के पैकेट खाने से पूरे राज्य में राहत सामग्री का भयंकर अकाल पड़ गया। चारों तरफ बिस्किट की मारामारी होने लगी। लोग भूखों मरने लगे। देखते ही देखते पूरी दुनिया में ये समाचार कोरोना वायरस की तरह फैल गया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ईटली जैसे कई देशों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निन्दा की। हालात इतने भयावह हो गये कि कोरोना वायरस की जगह बिस्किट की कमी को सबसे बड़ी आपत्ति घोषित कर दिया गया। बाजार में अब कहीं बिस्किट देखने को नहीं मिल रहे थे क्योंकि सारे बिस्किट वो 'शिक्षक' खा गया था। शिक्षक के बिस्किट खाने से राज्य की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। आनन फानन में राज्य के मुख्यमंत्री को 'बिस्किट आपदा राहत कोष' के नाम से हजारों करोड़ रूपयों का फण्ड जारी करना पड़ा। सरकार ने अपने खाता नम्बर जारी कर दिये जिसमें लोग 'बिस्किट आपदा' से बचने के लिये भारी मात्रा में सहयोग राशि जमा करवा रहे हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को दरकिनार कर राज्य में बिस्किट की फैक्ट्रियां फिर से शुरू करवा दी गई है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में बिस्किट का उत्पादन किया जा सके। इसके अलावा कई दूसरे देशों से भी भारी मात्रा में बिस्किट आयात किया जा रहा है ताकि 'शिक्षक' ने जो बिस्किट खाये थे उसकी कमी पूरी की जा सके। सरकार ने नागरिकों को आश्वस्त किया है कि किसी को भी बिस्किट की कमी से नहीं मरने दिया जायेगा। बिस्किट आपदा से निपटने के बाद कोरोना पर विचार किया जायेगा।
Monday, 13 April 2020
अन्धाधुनिकता
बहुत देखने पर मोनिका को एक मकान पसन्द आया। मकान मालकिन रेवती उसे पूरा मकान दिखा रही थी। 'आधुनिकता' की साधक मोनिका को ग्रामीण परिवेश पसन्द नहीं था लेकिन विवशता थी। वे देखते — देखते बातों ही बातों में बोली — ''शहर की आधुनिकता की तुलना में गांवों में कितना पिछड़ा पन है, यहां आधुनिकता को हेय दृष्टि से देखा जाता है, सुन्दरता का कोई मोल नहीं है। अब तुम ही बताओ, सुन्दरता को यदि वस्त्रों से ढक लिया तो भला सुन्दरता का क्या मतलब? यदि ईश्वर ने हमें सौन्दर्य दिया है तो हम क्यों ना दिखाएं।''
''मैडम ये आपका बाथरूम है, इसकी खिड़की बाहर की तरफ खुलती है, और हां अपने आप को 'आधनिक' से ' अन्धाधुनिक बचाने के लिये नहाते समय इस खिड़की को जरूर बन्द रखियेगा''
Wednesday, 8 April 2020
ये लॉक-डाउन कभी न खुले
ये लॉक—डाउन कभी ना खुले
कपिल बालकनी पर खड़ा शहर की सूनी सड़कों को ताक रहा था। कभी न थमने वाले शहर में आज मरघट का सन्नाटा पसरा हुआ था। दिन भर इन्सानों की चहलकदमी से आबाद रहने वाली सड़कों पर आज कुत्ते निश्चिंत होकर दौड़ रहे थे। आज उन्हें किसी गाड़ी के नीचे कुचले जाने का भय भी न था। लॉक डाउन ने जैसे जीवन की गति को थाम कर रख दिया था। अन्यथा कपिल को इतना समय कहां था। भाग दौड़ भरी जिन्दगी में कपिल को पता ही नहीं चला कि कब उसकी शादी को पांच साल बीत गये। सुबह आॅफिस जाना और देर रात तक लौटना, भोजन करना और सो जाना। सुबह होते ही फिर वही क्रम, कभी — कभी तो उसे लगता कि वो इंसान नहीं बल्कि मशीन बनकर रह गया है। उसने बालकनी ने नजरें हटाकर घर में दौड़ाई। राधा हमेशा की तरह अपने काम में लगी हुई थी। उसके लिये तो लॉकडाउन के कोई मायने ही नहीं थे। शादी से पहले कितना खुश थी वो। कितने सपने देख रखे थे उसने। शिमला — मनाली घूमने का प्लान भी बना रखा था। लेकिन कपिल अपनी व्यस्तता के चलते कभी उसे समय ही नहीं दे पाया। राधा ने भी कभी शिकायत नहीं की। कपिल को याद नहीं कि इन पांच सालों के दौरान वे दोनों कभी प्रेम से बतियाये हों, जैसे वो शादी से पहले किया करते थे। वो स्मृतियों से बाहर आया। आज राधा उसे हमेशा से सुन्दर लग रही थी । कपिल न जाने ऐसे कितने पल गंवा चुका था। लेकिन अब वो उसे नहीं गंवाना चाहता था। उसने आगे बढ़कर राधा का हाथ अपने हाथों में थाम लिया । आँखें — आँखों से टकराई मानों उलाहना दे रही हो कि 'अब तक कहां थे'। कपिल ने राधा को सीने से लगा लिया। राधा मन ही मन सोच रही थी — काश ये 'लॉक—डाउन' कभी ना खुले।
Tuesday, 25 February 2020
आस्तीन के सांप
उसको ही छलता सदा है, जो सहज है जो सरल है
आस्तीनों में तुम अपनी, सांप रखना छोड़ दो अब
कितना ही अमृत पिला दो, उगलता हर दम गरल है
Thursday, 20 February 2020
अन 'पढ़'
कुछ 'लिख' भले ना पाये
लेकिन
'पढ़' लिया करती है
मेरे चेहरे के भावों को
तब से
जब बोल भी नहीं
पाता था मैं
आज मैं बहुत कुछ
'लिख' सकता हूं
किन्तु 'पढ़' नहीं सकता
'मॉं' के चेहरे के भावों को