मैं नारी हूँ जिसने पुरुषों की खातिर सर्वस्व लुटा डाला
किन्तु पुरूषों ने जाने क्यूं बेइज्जत मुझे ही कर डाला
हां मैंने ही अपने तन से पुरुषों का निर्माण किया
जाने कितनी पीड़ा सहकर मैंने पुरुष को जन्म दिया
मैंने ही माता बनकर इनको अपना वात्सल्य दिया
अपने स्तन का दुध पिला मैंने ही उसे परिपुष्ट किया
हाँ मैंने ही पुरुष को शब्दों का ज्ञान सिखाया था
और मैरी ही अंगुली थाम पैरों पे खड़ा हो पाया था
मेरी छाया में पलकर है पुरुष पला और बड़ा हुआ
मुझ बिन उसका अस्तित्व नहीं, पूछो इतिहास है पड़ा हुआ
बहना बनकर मैंने ही तो, राखी का धागा बांधा था
और पत्नी बन पग पग पर मैंने ही साथ निभाया था
पर आज देख दुर्दशा अपनी, ये दिल चीख कर रोता है
कभी नारी पूजी जाती थी, अब उसको लूटा जाता है
पवन प्रजापति ‘पथिक’
किन्तु पुरूषों ने जाने क्यूं बेइज्जत मुझे ही कर डाला
हां मैंने ही अपने तन से पुरुषों का निर्माण किया
जाने कितनी पीड़ा सहकर मैंने पुरुष को जन्म दिया
मैंने ही माता बनकर इनको अपना वात्सल्य दिया
अपने स्तन का दुध पिला मैंने ही उसे परिपुष्ट किया
हाँ मैंने ही पुरुष को शब्दों का ज्ञान सिखाया था
और मैरी ही अंगुली थाम पैरों पे खड़ा हो पाया था
मेरी छाया में पलकर है पुरुष पला और बड़ा हुआ
मुझ बिन उसका अस्तित्व नहीं, पूछो इतिहास है पड़ा हुआ
बहना बनकर मैंने ही तो, राखी का धागा बांधा था
और पत्नी बन पग पग पर मैंने ही साथ निभाया था
पर आज देख दुर्दशा अपनी, ये दिल चीख कर रोता है
कभी नारी पूजी जाती थी, अब उसको लूटा जाता है
पवन प्रजापति ‘पथिक’




