खुली सड़क है, चला जा रहा हू,
न रास्ता मालूम न मंजिल की खबर है
मेरी मजबुरिया मुझे थकने न देती
चला जा रहा हू, उसी का असर है
राहो में बढ़ाये कई है मगर फिर भी
रुक जाना अब मेरी फितरत नहीं है
न कोई साथी, न कोई सहारा
बस चलता रहू किस्मत में यही है
कही तेज धुप तो कही ठंडी छाँव है
हो फूल चाहे कांटे, न रुकते ये पांव है
ये भूख और प्यास भी कहा खो गई है
उम्मीद की किरण अब तो कोई जगाये
बस चला जा रहा हू में बेखबर की
क्या मालूम कब ये सफ़र ख़त्म हो जाये
'पथिक'
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