Tuesday, 11 September 2012

वो देखो मेघ वो गरज उठे
झर झर करते वो बरस उठे
मन मयूर सबके नाच उठे
मुरझाये चहरे हरष उठे
वो देखो बिना खिवैया के
कागज की कश्तियाँ चली
पहली फुहार में भीगने को
देखो बच्चो की टोलियाँ चली
वो चमक चमक चपला चमकी
कभी ये कडकी कभी वो कडकी
उमीदो को फिर लगे पंख
नाले छलके नदिया छलकी
साजन का मन बेचैन हुआ
चेहरा मन का पट खोल गया
और बारिश की उन बूंदों में
सजनी का मन भी डोल गया
सावन की पहली बारिश में
चेहरों पे रोनक लौट गई
सब सोये अरमा जाग उठे
आँखों में चमक फिर लौट गई
'पथिक'
 

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