Thursday, 27 September 2012

भगतसिंह की व्यथा


जो वादे लिए थे मैंने तुमसे
क्या उन पर कभी तुम चलते हो
फिर बोलो किस मुँह से मेरा
जन्म दिवस मनाते हो

वो माँ को छलनी करते हैं
ये देख हृदय अब रोता है
पर तुम इतने क्यूँ कायर हो
क्या तुम्हे दर्द नहीं होता है

यदि माँ कि रक्षा कर ना सको
तो फिर ये इतना दिखावा कयूं
यदि मेरे पथ पर चल ना सको
तो जन्म दिवस भी मनाना क्यूं

कहाँ गया वो खून जो हरदम
रण को आतुर रहता था
जिनकी हुंकार से ही डरकर
सूरज छुप जाया करता था

खुद को भगत सिंह का वंशज
कहना अब तुम बन्द करो
तुम तो कायर हो ही लेकिन
ना नाम मेरा बदनाम करो

काश कि सम्भव होता तो
मैं फिर से हथियार उठा लेता
जिन्दा न रहता गद्दार कोई
और माँ का न ये हाल होता

‘पथिक’
 

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