वो आशियाना हमारा उजाड़ रहे,
हम आँख मूंद कर बैठे हैं।
वो कत्ल कर रहे हैं सरे आम,
हम हाथ बांध कर बैठे हैं।
माँ बहने लुटती सरे आम,
मगर हम मौन क्यूं बैठे हैं,
अपनी बरबादी की तैयारी,
अपने हाथों कर बैठे हैं।
क्यूं खून किसी का ना खौला,
या सो गया पुरुषत्व हमारा है।
वो माँ को हमारी लूट रहे,
और हम अब भी चुप बैठे हैं।
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