Tuesday, 11 September 2012


मैं भारत माता हूँ जिसका
संसार में गौरव न्यारा था
मेरी ज्ञान की गंगा को
दुनिया ने स्वीकार था
लेकिन आज तो में खुद ही
अपने वजूद को खोती हूँ
मेरे बच्चे नींद में सोते है
में फूट फूट कर रोती हूँ
मेरी आन की खातिर मेरे
बच्चे प्राण गँवा गए
तुम उंगली काटने पर रोते हो
वो हंसकर गर्दन कटा गए
कहाँ गए वो बाजू जो
हरदम रण को आतुर थे
जिनकी एक हुंकार से ही
दुश्मन हो जाते व्याकुल थे
उस भगत सिंह की याद मुझे
आज भी तडपा जाती है
मन मेरा तड़प जाता है
शेखर की याद जब आती है
मेरी एक पुकार पे वो
जीवन सर्वस्व लुटा बेठे
में आज भी बेठी रोती हु
की तुम कायर क्यू बन बेठे
अपनी बीवी का सिन्दूर वो
अपने हाथो ही मिटा गए
माँ लौट के में न आऊंगा
ना राह ताकना बता गए
वो भी गर चाहते तो
जीवन का सुख ले सकते थे
फिर सोचो क्या आज तुम
इतने सुखी हो सकते थे
है इन्तजार मेरे भगत और
शेखर कभी तो आयेंगे
तू चिंता मत मेरी माता
मुझे आके दिलासा दिलाएंगे

पवन प्रजापति 'पथिक'
 

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