Tuesday, 11 September 2012

आज परिंदों की गुनगुन भी
आसमान में खो गई है
आज कोयल की कुह कुह भी
पत्तो में दब कर रह गई है
बैठ किसी मुंडेर पे वो
कागा भी अब तो रोता है
कभी दहाड़ने वाला शेर
मांद में दुबका रहता है
सावन में कभी झूमने वाला
मोर नाचना भूल गया
बैठ फूल पे भंवरो ने
अब गुनगुनाना छोड़ दिया
तितलियों ने अब बागो में
आना जाना छोड़ दिया
नदियों ने भी सागर से है
अपना रास्ता मोड़ लिया
'पथिक'

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