Tuesday, 11 September 2012

फिर चीत्कार उठा है दिल,
आँखों में लावा उतर गया
देख के ये खुनी मंजर,
पत्थर का दिल भी पिघल गया
कहा गए वो बाजू जो
बिन बात ही अकड़ा करते थे
वो आज मौन क्यों बैठे है,
जो गला फाड़ चिल्लाते थे
भारत निर्माण के दावे देखो,
किस भांति सच होते है
दूध पिलाने माँ के,
यु टुकड़े टुकड़े होते है
दुश्मन तो घर में बैठे है,
फिर उन पर क्यों इल्जाम गढ़े
तुम चूडिया पहन कर बैठे हो,
फिर उनके हौसले क्यों न बढे
क्यू भुजा कोई फडकती नहीं,
क्यू उठती कोई कोई आवाज नहीं
पर तुम कर भी क्या सकते हो,
हिजड़ो का तो कोई इलाज नहीं
कहा गए वो सफेदपोश जो
नेता खुद को कहते है
हर बार क़त्ल होते है हम,
पर नेता क्यू नहीं मरते है
या तो क़त्ल करने वालो के,
तुम टुकड़े टुकड़े कर फेको
या छुप जाओ बीवी के पल्लू में,
चुप चाप तमाशा फिर देखो
क्यू चिंता तुमको होगी,
तुम अपने घर में बैठे हो
पर एक बात याद रखना,
तुम भी किसी माँ के बेटे हो

पवन प्रजापति 'पथिक'
 

No comments:

Post a Comment