Tuesday, 11 September 2012

फिर खंजर उतरा सीने में,
फिर आग ये कैसी भड़क गई
चहुँ ओर मातम मसरा है,
फिर बिजली कैसी कड़क गई
एक बार फिर मातम पसर गया,
आँखों में खून फिर उतर गया
मेरे सपनो का भारत,
फिर कतरा कतरा बिखर गया
फिर से मांगे सूनी हुई
फिर से कोखे उजड़ गई
कुछ बच्चे हो गए अनाथ,
तो कुछ को माएं छोड़ गई
देखो ये भारत माता,
अपनों के खून से लाल हुई
कहा गई वो वीरता,
क्यों माता फिर बेहाल हुई
क्यों हाथ बांधे बैठे हो,
क्या बाजू में ताकत ही नहीं
वो मार रहे है अपनों को,
पर तुम तो कुछ करते ही नहीं
देख तुम्हारी कायरता,
वो वीर स्वर्ग में रोते है
माता छलनी छलनी है,
और बेटे नींद में सोते है

पवन प्रजापति 'पथिक'
 

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