ऋषि मुनियों की पावन धरा, देवों के मन को भाती हूँ।
विश्व गुरु कहलाती थी जो, मैं वही माँ भारती हूँ।
दुश्मन ने जब था किया हमला, मेरे टुकड़े कर डाले थे।
शीश कटाकर मुझे बचाया, वो लाल मेरे मतवाले थे।
लेकिन आज मेरे बेटे ही, अपनी माँ को लूट रहे।
जो शीश कटाने थे तैयार, वो मुझे काटने तुले हुए।
वो भक्षक बनकर बैठे हैं, जिन्हें मेरा रक्षक होना था।
जो शीश कटे मेरी खातिर, क्या उनका यही मूल्य चुकाना था?
कहां गए वो लाल जो, माँ की खातिर फांसी झूल गए।
जो बही रक्त की नदियां थी, क्या वो नदियाँ तुम भूल गए।
याद रखो गर अपनी माँ का सम्मान न बचा पाओगे।
थूकेगी दुनिया तुम पर और कायर कहलाओगे।
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