Wednesday, 12 September 2012


ना पेट में दाना है ना तन पे कपड़े
टूटी झोंपड़ी में रहा करता हूं
मैं गरीब हूँ।
सपने देखना है गुनाह जिसके लिए
दिल में दर्द छुपा कर भी हंसने की
नाकाम सी कोशिश किया करता हूँ
मैं गरीब हूँ।
जीने का कोई मकसद नहीं है
बदनसीब हूँ इतना कि कम्बख्त
मौत भी नफरत करती है
न चाहते हुए भी जबरदस्ती जिया करता हूँ
मैं गरीब हूँ।
क्या दावे करते हो तुम भारत निर्माण के
भारत के चेहरे पर तो
बदनुमा दाग सा मैं दिखता हूँ
मैं गरीब हूँ।

No comments:

Post a Comment