सीने की ज्वाला ठंडी क्यू ,
क्यू आँखों में कोइ रंग नहीं
क्यू भुजा फडकती नहीं है
क्यू ,
क्यू होती अब कोई जंग नहीं
वो जो महलो में बैठे है,वो खून हमारा पीते है
मरे तो हमारे अपने है, वो अब भी शान से जीते है
सहन करने की भी तो, आखिर कोई सीमा होती है
हो जाये जब वो सीमा पार तो कहलाती है
'पथिक
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