Tuesday, 11 September 2012

मित्रो, एक श्रृंगार रस की कविता प्रस्तुत करने जा रहा हू पसंद आये तो जरूर कमेन्ट करे

आई पिया मिलन की रात सखी री,
दो प्यासे तन मन तरस उठे,
बरसों से प्यासी एक धरा पर,
वो बनकर सावन बरस उठे
सखी में थी सुध बुध भूल गई
रहा न कुछ भी होश मुझे
एक लता वृक्ष से लिपट गई
यूँ पिया ने लगाया अंग मुझे
सखी अधर तो थे बस मौन मगर
नयनों से नयन थे बोल रहे
बस मैं थी उनको देख रही
और वो थे मुझको देख रहे
सखी यूँ ही आँखों आँखों में
बस आधी रात थी बीत गई
पर नैनो को था चैन कहाँ
जाने कहाँ थी अब नींद गई
सखी लाज मुझे फिर आने लगी
आँखों में लाली रमा गई
पिया मुझमे थे बस समां गए
और मैं थी उनमे समां गई
सखी प्रणय की उस वेला में
कब भोर हुई कुछ पता न था
आगे अब क्या कहूँ री सखी
क्या हुआ हमें कुछ पता न था
 

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