Tuesday, 11 September 2012

माँ मेरे लिए तू क्या क्या न बनी कभी सागर तो कभी ताल बनी
आई जब जब मुसीबत मुझ पर, हर बार तू मेरी ढाल बनी
माँ तेरे प्यार की गाथा, मुझसे कहते न बनती है
जब सूरत भी न देखी थी, तू जबसे प्यार मुझे करती है
माँ तेरे दूध के सामने तो मुझे सब कुछ फीका लगता है
और तेरी गोद के आगे तो इन्द्रासन भी छोटा लगता है
में बोल न पाता फिर भी तू मेरी पीड़ा समझ जाती थी
और तेरी उस थपकी में फिर, क्या मीठी नींद मुझे आती थी
जब भूखा में रह जाता था, तू कुछ भी खा ना पाठी थी
पीड़ा तो होती थी मुझे मगर, क्यों तू तड़प जाती थी
माँ तेरे लिए कहा तक लिखू, ये धरती भी कम पद जाएगी
और तेरे लिए लिखते लिखते, ये कलम खुद थक जाएगी
'पथिक'

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