Wednesday, 12 September 2012


एक बेटी की करूण कहानी
(बेटी के हत्या करने वालों, सुनो उसकी कहानी, उसीकी जुबानी )
खुशियों का बोलबाला था, घर का माहौल निराला था ।
उल्लास से सब थे भरे हुए, मेहमान इक आने वाला था ।
मैं थी बहुत उमंग लिए, मन में कई ख्वाब संजोये थे ।
जो सपने देखे थे मैंने, वो सब सच आने आये थे ।
तितली के पीछे भागूंगी, गुडि़या के संग मैं खेलूंगी।
मैं उठ कर फिर गिर जाउंगी, फिर बार- बार उठ भागूंगी।
मुझको पैरों पर चलते देख, माँ-बाप कितना हर्षाएंगे।
मैं उनके आगे भागूंगी, वो मेरे पीछे भागेंगे।
लो मैं दुनिया में आ गई, देखा इक नया सवेरा था ।
ये देख के मैं थी चैंक गई, ये कैसा मातम पसरा था ।
ना माँ थी खुश ना ही पिता, जैसे था कोई गुनाह हुआ ।
चेहरे पे उनके उदासी थी, जैसे कोई सपना चूर हुआ ।
गोदी में पिता ने उठा लिया, मुझको लेकर थे चल वो दिए ।
माँ ने भी इक पल ना रोका, घर से बाहर वो निकल गए ।
उस स्याह अंधेरी रात में, इक डर सा दिल में दौड़ गया ।
इक वीराने पर रूक कर फिर, मेरा पिता वहीं मुझे छोड़ गया ।
उस पत्थर दिल इंसान ने फिर, इक बार भी मुड़ कर ना देखा ।
मैं रोती रही चिल्लाती रही, पर उसका कलेजा ना दहका ।
मेरा रोना सुन कर के, दो-चार कुत्ते दोड़ आए ।
मैं बेबस सी बस रोती रही, पर मुझे बचाने कौन आए ।
सपने सारे अब चूर हुए, मरने को मैं मजबूर हुई ।
खिलने से पहले एक कली, देखो कैसे थी मुरझाई ।
दुनिया कहती है कि माँ-बाप, बच्चों के रक्षक होते हैं ।
शायद ये दुनिया झूठी है, उनमें कुछ भक्षक होते हैं ।
यदि मुझे मारा है तो फिर, माँ को अपनी क्यूं ना मारा ।
या फिर अपनी ही बहनों का, गला घोंट क्यूं ना मारा।
मैं तो दुनिया छोड़ चली, पर प्रश्न यह छोड़ जाती हूँ ।
यदि माँ और बहनें प्यारी है, तो मैं क्यूं मारी जाती हूँ ।

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