सोचता हूँ चारों तरफ देखकर ये मंजर,
वो पुराना जमाना कहां खो गया।
कहा जाता था जिसे सोने की चिडि़या,
वहीं आज क्या से क्या हो गया?
झुकाती थी शीश दुनिया जिसके आगे,
मस्तक उसी का क्यों झुक गया?
जिसकी शरण में सब रहते थे खुश,
देखो वहीं आज क्यों रो गया?
लावे की तरह दौड़ता था रगों में,
खून वहीं ठंडा क्यों हो गया?
चीर देता था जो दुश्मन की छाती,
खंजर वहीं मौन क्यों हो गया?
रो-रोकर माँ का हाल बुरा है,
मेरे लाल तुझे ये क्या हो गया?
No comments:
Post a Comment