Tuesday, 11 September 2012


देख कर उनको खाना खाते, क्या किस्मत पे अपनी रो जाऊं में
दिल को तो फिर भी समझा दू, पर पेट को कैसे समझाऊ में
जब दुनिया बनाने वाला एक, तो फिर ;ये भेद क्यूँ होता है
कोई पड़ा है फुटपाथ पर, तो कोई महलों में क्यूँ सोता है
अरे नादान पेट समझ जा, तेरी किस्मत में भर पेट भोजन ही नहीं
तू आया तो खाली था, तू जायेगा तो भी खली ही कहीं
ये आँखे कितनी जिद्दी है, उस ओर तकती है हर दम
इन आँखों की बेचैनी से, बस मेरा निकल जाता है दम
यु माँ के पास बैठ कर खाना, अब मेरी किस्मत में नहीं
मुझे खिलाते खिलाते खुद, वो भूख से है दम तोड़ गई
इस जगह से ही चला जाऊ पर, ये पैर हिला न पाऊं में
कुछ सोच नहीं पता हु की, जीउ या मर जाऊ में
देह में अब कोई दम ही नहीं, में अब नहीं घर जाऊंगा
में भारत का भविष्य हूँ, भूखा नंगा ही मर जाऊंगा
'पथिक'

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