Tuesday, 11 September 2012

हमारे जवान जो सीमा पर लड़ते है, उनमे से किसी की पत्नी का ख़त उसके पति के नाम, यदि आपके दिल पर चोट करे तो अपनी राय de

कर के सोलह श्रृंगार, में बेठी हु मुह मोड़ के 
क्या मेरा कसूर था, जो तू गया यु छोड़ के

ये सोलह श्रृंगार मेरा, अब किसको दिखाऊ में
में इस पार तू उस पार, फिर किसको रिझाऊ में

में न ये कहती की, देश का न ध्यान धरो
लेकिन अरे निष्ठुर जरा, इस और भी तो ध्यान धरो

जब आहट दर पे हो कोई, उस और में हु भागती
फिर हो जाती हु मायूस, जब तुझको न देखती

ये बालो गजरा रोता, ये आँखों का कजरा रोता
फूल सा चेहरा मुरझाया, दिल का हर कतरा रोता 

अरे निष्ठुर तुम्हारे बिना तो, सावन भी लगता रूखा है
चहु और हरियाली है, पर मेरा दिल क्यों सुखा है

हर इक पल युग सा बीते हे, न मरते हे न जीते हे
होगा कभी तो मिलन यही, सोच के होठो को सीते है

मुझे माफ़ करो में भावो में बही, तुम मेरी और न ध्यान धरो
इस देश की मिटटी पहले है, तुमुसका पहले ध्यान धरो

पवन प्रजापति 'पथिक'

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