जान उस पर लुटाने की, कसमें तो खूब खाता है।
मांगे अगर वो फूल तो तू, गुलदस्ता ले आता है।
वो गर दिन को रात कहे, तो दिन को रात तू कहता है।
लेकिन उस बूढ़ी माँ का क्या, कभी खयाल तुझे आता है।
जिस जान को तू उस पर, लुटाने की बात करता है।
याद रख उस जान पर, अधिकार तुम्हारी माँ का है।
क्या उसकी अंगुली पकड़े बिना, पैरों पे खड़ा हो सकता था।
जिस तन पर है अभिमान तुझे, वो उसके बिना हो सकता था।
क्या खुशी थी उन आँखों में, जब पैरों पे चलना सीखा तू।
आज उसी माँ को कैसे, आँख दिखाना सीखा तू।
अपनी रोटी तुझे खिला, जो माँ खुद भूखी सोती थी ।
धिक्कार है तुझे कि वो माँ, आज भी भूखी सोती है।
थोड़ा उपर वाले से डर, कि तुझको पाप लगेगा।
बर्बाद हो जाएगा याद रख, कल तू भी बाप बनेगा
Pawan Prajapati Pathik jee, maine apke blog par apki kai rachnaye padhi hai. bahut deshprem se bhari aur sambhandhon kee ahmiyat batane wali kavitayen likhi hai hai. Darasal apne us har mudde par likha hai, jo bharat ke logo ko aajkal pareshan kar raha hai.
ReplyDeleteApki tarah mera bhee blog hai vinodpassy.blogspot.com. Kabhi wahan bhee akar apne vicharo ka adaan pradan karen. accha lagega