बलिदानों के गौरव बाजारों में बिकते देखा है
हमने अतीत को वर्तमान के आगे झुकते देखा है
जिन आँखों ने देखे थे कभी सपने सुनहरे भविष्य के
उन आँखों को मौत का इन्तेजार करते देखे है
हमने भूखो की आँखों में लाचारी को देखा है
और भूखो को सब्र से ही फिर भूख मिटते देखा है
माताओ की उजड़ी हुई कोखे आज भी रोटी है
उन पगली माओ को आज भी इन्तेजार करते देखा है
हमने विधवाओ की आंखो में औसुओ के सैलाब देखे है
और उस सैलाब के आगे सागर भी सिमटते देखे हाही
हमने मासूमो से पिता का पता पूछते देखा है
और माँ की ख़ामोशी में जवाब भी पाते देखा है
'पथिक'
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