Wednesday, 12 September 2012



वो दिन अब याद आते हैं, वो मौसम याद आता है
वो मित्रों के संग मिट्टी में, खेलना अब याद आता है
वो बारीश में भीगते हुए दौड़ना याद आता है
पानी में कागज नाव छोड़ना याद आता है
वो मिट्टी के घरौंदे वो लुक्का छिपी का खेल
वो झगड़-झगड़ कर फिर साथ खेलना याद आता है
वो देर शाम तक घूमना, फिर माँ का वो डाँटना
और फिर उस डाँट में छुपा वो प्यार याद आता है
जब जाति का कोई भेद न था, बिन पैसे की अमीरी थी
वो एक रूपया लेकर भी, खुश हो जाना याद आता है।
काश कि हाथ में होता तो, कभी बड़े ही ना होते
बचपन का वो प्यारा आलम, मुझे अब भी याद आता है।

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