Thursday, 27 September 2012

भगतसिंह की व्यथा


जो वादे लिए थे मैंने तुमसे
क्या उन पर कभी तुम चलते हो
फिर बोलो किस मुँह से मेरा
जन्म दिवस मनाते हो

वो माँ को छलनी करते हैं
ये देख हृदय अब रोता है
पर तुम इतने क्यूँ कायर हो
क्या तुम्हे दर्द नहीं होता है

यदि माँ कि रक्षा कर ना सको
तो फिर ये इतना दिखावा कयूं
यदि मेरे पथ पर चल ना सको
तो जन्म दिवस भी मनाना क्यूं

कहाँ गया वो खून जो हरदम
रण को आतुर रहता था
जिनकी हुंकार से ही डरकर
सूरज छुप जाया करता था

खुद को भगत सिंह का वंशज
कहना अब तुम बन्द करो
तुम तो कायर हो ही लेकिन
ना नाम मेरा बदनाम करो

काश कि सम्भव होता तो
मैं फिर से हथियार उठा लेता
जिन्दा न रहता गद्दार कोई
और माँ का न ये हाल होता

‘पथिक’
 

Tuesday, 25 September 2012


क्यूं मैं सोय हुओ जगाऊँ
किसको जाकर गीत सुनाऊँ
जब चाह नही उजियारे की
फिर क्यूँ मैं तम में दीप जलाऊँ

जब तुम चाह नहीं रखते हो
पैरों पे खड़े भी होने की
फिर कहदो तुम कैसे कोशिश
करूं मैं हाथ बढ़ाने की

माँ की आन की खातिर जिनको
परवाह न थी सिर कटने की
वो सिर छुपाए बैठे हैं
क्यूँ करूं मैं बात जमाने की
‘पथिक’
 
क्यूं मैं सोय हुओ जगाऊँ
किसको जाकर गीत सुनाऊँ
जब चाह नही उजियारे की 
फिर क्यूँ मैं तम में दीप जलाऊँ

जब तुम चाह नहीं रखते हो
पैरों पे खड़े भी होने की
फिर कहदो तुम कैसे कोशिश
करूं मैं हाथ बढ़ाने की

माँ की आन की खातिर जिनको
परवाह न थी सिर कटने की
वो सिर छुपाए बैठे हैं
क्यूँ करूं मैं बात जमाने की
‘पथि

Friday, 21 September 2012

कौन कहता है मेरे देश में, महँगाई का दौर है
जिन्दगी महंगी है मगर, यहां मौत कितनी सस्ती है
मासूूमों की आँखों में बस रोटी की तस्वीर दिखती है
यहां रोटी कितनी महंगी है, और भूख कितनी सस्ती है
देख कर मातम का आलम, कैसे कह दूँ महंगाई है
यहां खुशिया
ं तो महंगी है मगर, मातम कितना सस्ता है
सरे आम लुटती है नारी, कहती है बस यही कहानी
देखो मेरे देश में, ये आबरू कितनी सस्ती है

कौन कहता है मेरे देश में, महँगाई का दौर है
जिन्दगी महंगी है मगर, यहां मौत कितनी सस्ती है
‘पथिक’

Friday, 14 September 2012


वो करोड़ों के घपले किए जा रहे हैं
हम जहर का घूंट पिए जा रहे हैं
वो करते जा रहे हैं अय्याशियां
हम फिर भी सहन किए जा रहे हैं
वो लुटाए जा रहे हैं दौलत हमारी
हम लुटाने का मौका दिए जा रहे हैं।
कोई मार जाता है अपनांे को आकर
हम कायर की भांति जिये जा रहे हैं।
सब बरबाद होते हुए देखकर भी
हम होठो को अपने सिये जा रहे हैं।

ऐ मालिक जरा इस तरफ तो देख
तेरी बनाई इस दुनिया में ये क्या हो रहा है
कोई चढ़ के बैठा है अपने महलों में
तो कोई सड़क पे पड़ा रो रहा है
कोइ खा के फैंक देता है झूठन
कोई वही झूठन उठा के खा रहा है
कहीं पर लगे हैं कपड़ों के अम्बार
तो कोई तन को भी नहीं ढक पा रहा है
ये देख के क्या तेरा दिल नहीं रोता
या दिल तेरा भी अब पत्थर हो रहा है

Wednesday, 12 September 2012



चिडि़या ने चहकना छोड़ दिया, फूलों ने खिलना छोड़ दिया
क्यूं बैठ कहीं किसी झुरमुट में, कोयल ने गाना छोड़ दिया
क्यूं आलम सारा बदल गया, खुशबू ने महकना छोड़ दिया
क्यूं मेरी इस बगिया में अब, तितलियों ने आना छोड़ दिया
क्यूं हर एक शख्स परेशां है, क्यूं हंसना सबने छोड़ दिया
क्यूं सावन में भी बागों में, बहारों ने आना छोड़ दिया
क्यूं बैठ फूल पे भंवरों ने, अब गुनगुनाना छोड़ दिया
क्यूं सावन की बून्दों ने, अब आग लगाना छोड़ दिया


वो दिन अब याद आते हैं, वो मौसम याद आता है
वो मित्रों के संग मिट्टी में, खेलना अब याद आता है
वो बारीश में भीगते हुए दौड़ना याद आता है
पानी में कागज नाव छोड़ना याद आता है
वो मिट्टी के घरौंदे वो लुक्का छिपी का खेल
वो झगड़-झगड़ कर फिर साथ खेलना याद आता है
वो देर शाम तक घूमना, फिर माँ का वो डाँटना
और फिर उस डाँट में छुपा वो प्यार याद आता है
जब जाति का कोई भेद न था, बिन पैसे की अमीरी थी
वो एक रूपया लेकर भी, खुश हो जाना याद आता है।
काश कि हाथ में होता तो, कभी बड़े ही ना होते
बचपन का वो प्यारा आलम, मुझे अब भी याद आता है।


आत्म हत्या कर रहे किसान
कीमतें छू रही आसमान
नेता बेच चुके ईमान
क्या खूब हुआ भारत निर्माण
गरीब रोटी को रोता है
नेता तिजोरी भरता है
जीना अब नहीं रहा आसान
क्या खूब हुआ भारत निर्माण
बाजारों में लाशें बिछती है
भारत माता भी रोती है
हो रहा राम का भी अपमान
क्या खूब हुआ भारत निर्माण

ना पेट में दाना है ना तन पे कपड़े
टूटी झोंपड़ी में रहा करता हूं
मैं गरीब हूँ।
सपने देखना है गुनाह जिसके लिए
दिल में दर्द छुपा कर भी हंसने की
नाकाम सी कोशिश किया करता हूँ
मैं गरीब हूँ।
जीने का कोई मकसद नहीं है
बदनसीब हूँ इतना कि कम्बख्त
मौत भी नफरत करती है
न चाहते हुए भी जबरदस्ती जिया करता हूँ
मैं गरीब हूँ।
क्या दावे करते हो तुम भारत निर्माण के
भारत के चेहरे पर तो
बदनुमा दाग सा मैं दिखता हूँ
मैं गरीब हूँ।

जो दुश्मन का हाथ तुम्हारी ,
माँ की ओर है बढ़ रहा।
क्यूँ ना वो ही हाथ,
तुम्हारी तलवार से है कट रहा।
जो माँ की तरफ वो नजर उठी,
तो आँखें क्यूं ना नोच ली।
जो दिया उसने ललकार तुम्हे,
तो गरदन क्यूँ ना दबोच ली।
तू कृष्ण की सन्तान है
किस बात से है डर रहा।
तू सोच ले अब बिना युद्ध,
कोई विकल्प ना बच रहा।

जान उस पर लुटाने की, कसमें तो खूब खाता है।
मांगे अगर वो फूल तो तू, गुलदस्ता ले आता है।
वो गर दिन को रात कहे, तो दिन को रात तू कहता है।
लेकिन उस बूढ़ी माँ का क्या, कभी खयाल तुझे आता है।
जिस जान को तू उस पर,  लुटाने की बात करता है।
याद रख उस जान पर, अधिकार तुम्हारी माँ का है।
क्या उसकी अंगुली पकड़े बिना, पैरों पे खड़ा हो सकता था।
जिस तन पर है अभिमान तुझे, वो उसके बिना हो सकता था।
क्या खुशी थी उन आँखों में, जब पैरों पे चलना सीखा तू।
आज उसी माँ को कैसे, आँख दिखाना सीखा तू।
अपनी रोटी तुझे खिला, जो माँ खुद भूखी सोती थी ।
धिक्कार है तुझे कि वो माँ, आज भी भूखी सोती है।
थोड़ा उपर वाले से डर, कि तुझको पाप लगेगा।
बर्बाद हो जाएगा याद रख, कल तू भी बाप बनेगा

सोचता हूँ चारों तरफ देखकर ये मंजर,
वो पुराना जमाना कहां खो गया।
कहा जाता था जिसे सोने की चिडि़या,
वहीं आज क्या से क्या हो गया?
झुकाती थी शीश दुनिया जिसके आगे,
मस्तक उसी का क्यों झुक गया?
जिसकी शरण में सब रहते थे खुश,
देखो वहीं आज क्यों रो गया?
लावे की तरह दौड़ता था रगों में,
खून वहीं ठंडा क्यों हो गया?
चीर देता था जो दुश्मन की छाती,
खंजर वहीं मौन क्यों हो गया?
रो-रोकर माँ का हाल बुरा है,
मेरे लाल तुझे ये क्या हो गया?

ऋषि मुनियों की पावन धरा, देवों के मन को भाती हूँ।
विश्व गुरु कहलाती थी जो, मैं वही माँ भारती हूँ।
दुश्मन ने जब था किया हमला, मेरे टुकड़े कर डाले थे।
शीश कटाकर मुझे बचाया, वो लाल मेरे मतवाले थे।
लेकिन आज मेरे बेटे ही, अपनी माँ को लूट रहे।
जो शीश कटाने थे तैयार, वो मुझे काटने तुले हुए।
वो भक्षक बनकर बैठे हैं, जिन्हें मेरा रक्षक होना था।
जो शीश कटे मेरी खातिर, क्या उनका यही मूल्य चुकाना था?
कहां गए वो लाल जो, माँ की खातिर फांसी झूल गए।
जो बही रक्त की नदियां थी, क्या वो नदियाँ तुम भूल गए।
याद रखो गर अपनी माँ का सम्मान न बचा पाओगे।
थूकेगी दुनिया तुम पर और कायर कहलाओगे।

रोता बच्चा करे पुकार,
माँ दूध क्यूं ना पिलाती है।
उसकी छाती में दूध कहां,
वो खुद भी भूखी सोती है।
जिस बच्ची को चाहिए दूध मक्खन,
वो कुत्ते की झूठन खाती है
रो पड़े शायद पत्थर भी लेकिन,
बेशर्मों को शर्म ना आती है।
भारत निर्माण के भले ही,
लाख दावे तुम कर लो।
पर इस देश की हालत पर,
‘आजाद’ की आत्मा भी रोती है


वो आशियाना हमारा उजाड़ रहे,
हम आँख मूंद कर बैठे हैं।
वो कत्ल कर रहे हैं सरे आम,
हम हाथ बांध कर बैठे हैं।
माँ बहने लुटती सरे आम,
मगर हम मौन क्यूं बैठे हैं,
अपनी बरबादी की तैयारी,
अपने हाथों कर बैठे हैं।
क्यूं खून किसी का ना खौला,
या सो गया पुरुषत्व हमारा है।
वो माँ को हमारी लूट रहे,
और हम अब भी चुप बैठे हैं।


जो चले गए हैं मुझे छोड़कर अकेला,
क्यूं निशां उनका कोई मिलता नहीं है।
नजर तो आते हैं कई आशियाने।
ठिकाना मेरा क्यूं मिलता नहीं है।
चिपका हुआ है पेट पसलियों से,
निवाला मुझे क्यूं मिलता नहीं है।
फिर भी मुझसे लगी है ये उम्मीद
पतझड़ में भी गीत  सुनाउं बहार के
माफ करना वतन मुझसे भूखे पेट,
ये तिरंगे का बोझ अब उठता नहीं है

पिता
मेरे कंधों पर बैठ कर,
घूमना अब तुझे याद नहीं।
उस झूठ मूठ की लड़ाई  में
मेरा हार जाना अब याद नहीं
जब चोट तुझे कोई लगती थी,
वो दर्द मुझी को होता था।
वो तेरे दर्द में मेरा दर्द
महसूसना अब याद नहीं।
लेकिन अब इक कोने में बैठा,
इन्तजार तुम्हारा करता हूँ।
वो रोकर मेरी छाती से
लिपटना अब तुझे याद नहीं

एक बेटी की करूण कहानी
(बेटी के हत्या करने वालों, सुनो उसकी कहानी, उसीकी जुबानी )
खुशियों का बोलबाला था, घर का माहौल निराला था ।
उल्लास से सब थे भरे हुए, मेहमान इक आने वाला था ।
मैं थी बहुत उमंग लिए, मन में कई ख्वाब संजोये थे ।
जो सपने देखे थे मैंने, वो सब सच आने आये थे ।
तितली के पीछे भागूंगी, गुडि़या के संग मैं खेलूंगी।
मैं उठ कर फिर गिर जाउंगी, फिर बार- बार उठ भागूंगी।
मुझको पैरों पर चलते देख, माँ-बाप कितना हर्षाएंगे।
मैं उनके आगे भागूंगी, वो मेरे पीछे भागेंगे।
लो मैं दुनिया में आ गई, देखा इक नया सवेरा था ।
ये देख के मैं थी चैंक गई, ये कैसा मातम पसरा था ।
ना माँ थी खुश ना ही पिता, जैसे था कोई गुनाह हुआ ।
चेहरे पे उनके उदासी थी, जैसे कोई सपना चूर हुआ ।
गोदी में पिता ने उठा लिया, मुझको लेकर थे चल वो दिए ।
माँ ने भी इक पल ना रोका, घर से बाहर वो निकल गए ।
उस स्याह अंधेरी रात में, इक डर सा दिल में दौड़ गया ।
इक वीराने पर रूक कर फिर, मेरा पिता वहीं मुझे छोड़ गया ।
उस पत्थर दिल इंसान ने फिर, इक बार भी मुड़ कर ना देखा ।
मैं रोती रही चिल्लाती रही, पर उसका कलेजा ना दहका ।
मेरा रोना सुन कर के, दो-चार कुत्ते दोड़ आए ।
मैं बेबस सी बस रोती रही, पर मुझे बचाने कौन आए ।
सपने सारे अब चूर हुए, मरने को मैं मजबूर हुई ।
खिलने से पहले एक कली, देखो कैसे थी मुरझाई ।
दुनिया कहती है कि माँ-बाप, बच्चों के रक्षक होते हैं ।
शायद ये दुनिया झूठी है, उनमें कुछ भक्षक होते हैं ।
यदि मुझे मारा है तो फिर, माँ को अपनी क्यूं ना मारा ।
या फिर अपनी ही बहनों का, गला घोंट क्यूं ना मारा।
मैं तो दुनिया छोड़ चली, पर प्रश्न यह छोड़ जाती हूँ ।
यदि माँ और बहनें प्यारी है, तो मैं क्यूं मारी जाती हूँ ।

Tuesday, 11 September 2012

तिरंगे का बोझ 
महंगाई की मार
पशोपेश में पड़ा हु में, जीउ या फिर मर जाऊ
बच्चे भूखे बैठे घर पर खाली हाथ कैसे घर जाऊ
पहले तो खुद भूखा रह कर बच्चो का पेट भर देता
अब तो ये आलम है की बच्चा भी भूखा ही सोता
क्या मुह दिखाऊ घर जाकर वो बर्तन लेकर बेठे है
पापा आयेंगे खाना लेकर, झूठी आस लगाकर बेठे है
जब टूटेगी आशा उनकी वो चेहरे देख न पाऊंगा
या उनको दे दूंगा जहर या में खुद ही मर जाऊंगा
'पथिक'
हम उसी देश में रहते है जहा पैसे में ईमान बिकते है
जहा हम सब भूखे मरते है और नेता मौज उड़ाते है 
जहा बिस्तर में जज बनते है बच्चे भूखे ही सोते है 
जहा क़त्ल खुले आम होते है और कातिल घर में पलते है 
जहा गौ को माता कहते है और मांस उसी का खाते है 
जहा राम और कृष्ण रहते है, अब रावण और कंस ही बसते है 
'पथिक'

तुम इतराते हो अपनी जवानी पर
वो अपनी  जवानी गँवा गए
तुम बंधवा रहे हो बहनों से राखी
वो सूनी कलाई चले गए
तुम खाते हो माँ के हाथ की रोटी
वो थाली खाली छोड़ गए
वो भी कर सकते थे प्यार मगर
वो सूनी मांगे छोड़ गए
बच्चे उनको भी प्यारे थे मगर
वतन से था उनको प्यार
तुम उंगली कटने पर रोते हो
वो हँसे हुई गर्दन कटा गए
'पथिक'
चला जा रहा हु में लिए मशाल, बुझे हुए दीपो को जलाना 
 है जो राही रास्तो में सो गए, उनको अब फिर से जगाना है 
रास्ता बड़ा ही मुश्किल है, दूर बड़ी अभी मंजिल है 
लेकिन में रुक सकता नहीं, चलना ही 'पथिक' का फ़साना है 
रास्ता रोके हे कई खड़े, तो कुछ ने अपना भी जाना है 
चलता ही जा रहा हु बस, क्या मालूम कब रुक जाना है
'पथिक' 
इस देश  युवा को ये क्या हो गया है
राह भटक करके क्यों खो गया है
जागना था जिसे देश के लिए
औरत के पल्लू में क्यों सो गया है
लड़की पटना जैसे मकसद हो उसका
लड़की ही लड़की में बस खो गया है
निताम्ब्दर्शक है जीन्स उसकी
फैशन परस्ती में बस खो गया है
नशा करे जैसे बढ़ता हो रुतबा
नशे ही नशे में बस खो गया है
तू राम और कृष्ण की है संतान
लेकिन तेरा ये क्या हल हो गया है
'पथिक' 
सीने की ज्वाला ठंडी क्यू ,  क्यू  आँखों में कोइ रंग नहीं
क्यू भुजा फडकती नहीं है  क्यू ,  क्यू  होती अब कोई जंग नहीं 
वो जो महलो में  बैठे है,वो खून हमारा पीते है 
मरे तो हमारे  अपने है, वो अब भी शान से जीते है 
सहन करने की भी तो, आखिर कोई सीमा होती है 
हो जाये जब वो सीमा पार तो  कहलाती है 
'पथिक 
कसम है तुझे इस धरती माँ की, जीवन से तू मोह त्याग दे
या तो तू अब खुद मिट जाना या बैरी का निशा मिटा
जल जाये अब सारी लंका, ऐसी तू अब आग लगा दे
या तो जाकर घर में  छुप जा,या फिर तू शमशान जगा दे
हुआ था कभी महाभारत, आज तू फिर  इतिहास दोहरा दे
आज तू दुश्मन के लहू से, इस धरती को फिर नहला दे,
'पथिक'
क्यों आज हिमालय रोता है, क्यों सीना छलनी होता है
क्यों कुत्ते आँख दिखाते है, क्यों सिंह मांद में सोता है
हिंदुस्तान में हिन्दू होना क्यों गुनाह अब होता है,
जो हिन्दू हित की बात करे सांप्रदायिक क्यों होता है
जो तथाकथित सेकुलर है, जालीदार टोपी पहनते है
जो कभी मंदिर भी न गए मस्जिदों में नमाज पढ़ते है
सेकुलर के  नाम पर, अपनी माँ बहने बेच दे
ये तो इतने  नीच है,अपना खतना तक करवा दे
सेकुलर के नाम पर, क्यों घर में आग लगते हो
बेमौत मरे जाओगे क्यों सोया शेर जागते हो
'पथिक'
आ गया है समय अब की महाकाल अब उठ जाये
आंच न आये धर्म पर, अधर्मी सब मिट जाये
बैरी की चढ़ा अब बलि बलि शीशों से धरती पट जाये
सदियों से प्यासी धरा को बैरी रक्त अब मिल जाये
जो आँख उठे माँ की और वो आँख सलामत अब न   रहे
वो गिद्ध कर रहे इन्तेजार कब बैरी गिरे हम टूट पड़े पड़े
'पथिक 
अपनों. का गम क्या होता है, जो अपनों. संग है वो क्या जाने?
क्यों राह ताकते नैना है, कोई क्या समझे कोई क्या जाने?
हम गँवा चुके हैं अपनों को आंसू का दरिया रीत गया
क्यूँ खून उतरा है आँखों में, जो कातिलों को पाले क्या जाने?
क्यों माँ अब भी दर पे बैठी, बेटे की राह तकती है?
उन आँखों की बेचैनी को, ये औलाद वाले क्या जाने?
देखो इस पागल औरत को, कहती है आएगा उसका पति
इस पागल के पागलपन को, ये सुहागने अब क्या जाने
क्यों राह ताकती बहना है, हाथो में कुमकुम थाल लिए
बहनों की तड़प क्या होती है, वो राखी बंधाये क्या जाने?
वो माँ अब भी रोटी है जब, सबको खाना खिलाती है
वो एक थाली क्यों खली है, इसका जवाब कोई क्या जाने?
वो बच्चे पूछे अपनी माँ से, माँ पापा अब क्यों आते नहीं
लेकिन उस माँ की ख़ामोशी को, ये बेशरम नेता क्या जाने?
'पथिक'
 

जिस देश का  राम था वहा आज  हालत मिलती है 
रावण की लंका की जगा, राम की अयोध्या जलती है 
जो राम हमारे  आदर्श है, अपमान उन्ही का होता है 
जिस पथ पे चले थे राम कभी उस पथ को ही  जाता है 
पर मौन है क्यों संतान राम की, क्या देह में राम का रक्त नहीं 
जो राम सेतु को तोड़ रहा वो कभी राम का भक्त नहीं 
जो हाथ बढे इस पथ की और, तो तोड़ के हाथ में दे देना 
सौगंध राम की है तुमको वहीँ जल समाधी दे देना 
'पथिक'

काट देती थी जो अरि को, शमशीर भी वो सो गई
देख कर मातम का आलम इंसानियत भी रो गई
'पथिक'
आज फिर से धरती रक्ताभिषेक को आतुर  
आओ फिर से नहला दे जिस  ये आतुर है 
कहदो शमशीरो से अब की बहुत  चुकी म्यानो में 
दुश्मन सर चढ़ आया है, आहट हुई है कानो में 
माता की चुनर को फिर, रक्त से रंजित करना है 
बस प्रण करलो तुम ये मन में, या जीना है या मरना है 
बस फूंक दो तुम पांचजन्य, पौरूष अपना फिर दिखला दो 
अरिमुंडो की माला तुम, माता को फिर से पहना दो 
'पथिक 

बलिदानों के गौरव बाजारों में बिकते देखा है
हमने अतीत को वर्तमान के आगे झुकते देखा है
जिन आँखों ने देखे थे कभी सपने सुनहरे भविष्य के
उन आँखों को मौत का इन्तेजार करते देखे है
हमने भूखो की आँखों में लाचारी को देखा है
और भूखो को सब्र से ही फिर भूख मिटते देखा है
माताओ की उजड़ी हुई कोखे आज भी रोटी है
उन पगली माओ को आज भी इन्तेजार करते देखा है
हमने विधवाओ की आंखो में औसुओ के सैलाब देखे है
और उस सैलाब के आगे सागर भी सिमटते देखे हाही
हमने मासूमो से पिता का पता पूछते देखा है
और माँ की ख़ामोशी में जवाब भी पाते देखा है
'पथिक'
अपनों. का गम क्या होता है, जो अपनों. संग है वो क्या जाने?
क्यों राह ताकते नैना है, कोई क्या समझे कोई क्या जाने?
हम गँवा चुके हैं अपनों को आंसू का दरिया रीत गया
क्यूँ खून उतरा है आँखों में, जो कातिलों को पाले क्या जाने?
क्यों माँ अब भी दर पे बैठी, बेटे की राह तकती है?
उन आँखों की बेचैनी को, ये औलाद वाले क्या जाने?
देखो इस पागल औरत को, कहती है आएगा उसका पति
इस पागल के पागलपन को, ये सुहागने अब क्या जाने
क्यों राह ताकती बहना है, हाथो में कुमकुम थाल लिए
बहनों की तड़प क्या होती है, वो राखी बंधाये क्या जाने?
वो माँ अब भी रोटी है जब, सबको खाना खिलाती है
वो एक थाली क्यों खाली है, इसका जवाब कोई क्या जाने?
वो बच्चे पूछे अपनी माँ से, माँ पापा अब क्यों आते नहीं
लेकिन उस माँ की ख़ामोशी को, ये बेशरम नेता क्या जाने?
'पथिक'
 —
माँ मेरे लिए तू क्या क्या न बनी कभी सागर तो कभी ताल बनी
आई जब जब मुसीबत मुझ पर, हर बार तू मेरी ढाल बनी
माँ तेरे प्यार की गाथा, मुझसे कहते न बनती है
जब सूरत भी न देखी थी, तू जबसे प्यार मुझे करती है
माँ तेरे दूध के सामने तो मुझे सब कुछ फीका लगता है
और तेरी गोद के आगे तो इन्द्रासन भी छोटा लगता है
में बोल न पाता फिर भी तू मेरी पीड़ा समझ जाती थी
और तेरी उस थपकी में फिर, क्या मीठी नींद मुझे आती थी
जब भूखा में रह जाता था, तू कुछ भी खा ना पाठी थी
पीड़ा तो होती थी मुझे मगर, क्यों तू तड़प जाती थी
माँ तेरे लिए कहा तक लिखू, ये धरती भी कम पद जाएगी
और तेरे लिए लिखते लिखते, ये कलम खुद थक जाएगी
'पथिक'
मित्रो, एक श्रृंगार रस की कविता प्रस्तुत करने जा रहा हू पसंद आये तो जरूर कमेन्ट करे

आई पिया मिलन की रात सखी री,
दो प्यासे तन मन तरस उठे,
बरसों से प्यासी एक धरा पर,
वो बनकर सावन बरस उठे
सखी में थी सुध बुध भूल गई
रहा न कुछ भी होश मुझे
एक लता वृक्ष से लिपट गई
यूँ पिया ने लगाया अंग मुझे
सखी अधर तो थे बस मौन मगर
नयनों से नयन थे बोल रहे
बस मैं थी उनको देख रही
और वो थे मुझको देख रहे
सखी यूँ ही आँखों आँखों में
बस आधी रात थी बीत गई
पर नैनो को था चैन कहाँ
जाने कहाँ थी अब नींद गई
सखी लाज मुझे फिर आने लगी
आँखों में लाली रमा गई
पिया मुझमे थे बस समां गए
और मैं थी उनमे समां गई
सखी प्रणय की उस वेला में
कब भोर हुई कुछ पता न था
आगे अब क्या कहूँ री सखी
क्या हुआ हमें कुछ पता न था
 

बैठा हू करबद्ध मौन में, हाल पे अपने रोता हू
पानी की जगह आंसू पीकर, बस खली पेट ही रोता हू
वो कहते है हुआ भारत निर्माण, दिल चीख चीख कर रोता है
बिन भोजन साँसे टूट रही, क्या भारत निर्माण यही होता है
में मुंह छुपाये बेटा हू, माँ भूख से है दम तोड़ रही
भारत निर्माण के दावो में, एक और कहानी जोड़ रही
बच्चो के चहरे मुरझाये, कही झूठन मिले तो ले जाऊ में
पर बच्चो की माँ भी भूखी है, उसको क्या मुह दिखाऊ में
फिर हाथ जोड़ता हू तुमको, चले जाओ ये अहसान होगा
कल को मेरी भी लाश पर, फिर भारत निर्माण होगा
'पथिक'
वो देखो मेघ वो गरज उठे
झर झर करते वो बरस उठे
मन मयूर सबके नाच उठे
मुरझाये चहरे हरष उठे
वो देखो बिना खिवैया के
कागज की कश्तियाँ चली
पहली फुहार में भीगने को
देखो बच्चो की टोलियाँ चली
वो चमक चमक चपला चमकी
कभी ये कडकी कभी वो कडकी
उमीदो को फिर लगे पंख
नाले छलके नदिया छलकी
साजन का मन बेचैन हुआ
चेहरा मन का पट खोल गया
और बारिश की उन बूंदों में
सजनी का मन भी डोल गया
सावन की पहली बारिश में
चेहरों पे रोनक लौट गई
सब सोये अरमा जाग उठे
आँखों में चमक फिर लौट गई
'पथिक'
 
आज परिंदों की गुनगुन भी
आसमान में खो गई है
आज कोयल की कुह कुह भी
पत्तो में दब कर रह गई है
बैठ किसी मुंडेर पे वो
कागा भी अब तो रोता है
कभी दहाड़ने वाला शेर
मांद में दुबका रहता है
सावन में कभी झूमने वाला
मोर नाचना भूल गया
बैठ फूल पे भंवरो ने
अब गुनगुनाना छोड़ दिया
तितलियों ने अब बागो में
आना जाना छोड़ दिया
नदियों ने भी सागर से है
अपना रास्ता मोड़ लिया
'पथिक'

देख कर उनको खाना खाते, क्या किस्मत पे अपनी रो जाऊं में
दिल को तो फिर भी समझा दू, पर पेट को कैसे समझाऊ में
जब दुनिया बनाने वाला एक, तो फिर ;ये भेद क्यूँ होता है
कोई पड़ा है फुटपाथ पर, तो कोई महलों में क्यूँ सोता है
अरे नादान पेट समझ जा, तेरी किस्मत में भर पेट भोजन ही नहीं
तू आया तो खाली था, तू जायेगा तो भी खली ही कहीं
ये आँखे कितनी जिद्दी है, उस ओर तकती है हर दम
इन आँखों की बेचैनी से, बस मेरा निकल जाता है दम
यु माँ के पास बैठ कर खाना, अब मेरी किस्मत में नहीं
मुझे खिलाते खिलाते खुद, वो भूख से है दम तोड़ गई
इस जगह से ही चला जाऊ पर, ये पैर हिला न पाऊं में
कुछ सोच नहीं पता हु की, जीउ या मर जाऊ में
देह में अब कोई दम ही नहीं, में अब नहीं घर जाऊंगा
में भारत का भविष्य हूँ, भूखा नंगा ही मर जाऊंगा
'पथिक'

लाशो के ढेर उधर भी है, लाशो के ढेर इधर भी है
गर कब्रे कई है उधर खुदी तो राख के ढेर इधर भी है
गर बेवाए कुछ उधर है तो विधवाए कुछ इधर है
गर माए रोती उधर है तो कोखे उजड़ी इधर भी है
बच्चे अनाथ उकने ही नहीं, बच्चे  अनाथ हमारे भी है
जो कभी वापिस न आयेंगे, कुछ उनके है कुछ हमारे भी है
गलिय उनकी भी है सुनी, सन्नाटा फैला इधर भी है
मातम का सा ये माहौल, उधर भी है, इधर भी है
जो आग कभी की बुझ चुकी, क्यों फिर से जलना चाहते हो
उस आग के निशान मौजूद, उधर भी है, इधर भी है
आंसू का दरिया रीत गया, एक जूनून था वो जो बीत गया
एक नया सूरज उगने को बेताब, उधर भी है, इधर भी है
'पथिक'
हर सूरत बदसूरत लगती है जब तू इस परदे में रहती है
ये चाँद खुद शर्मा जाता है जब तू शर्म का गहना पहना करती है
लेकिन आज कल तुझे ये क्या हो गया है
तू बेपर्दा होकर ये शर्म का गहना भी उतार बैठी है
तू सोचती है की तू लगती है कोई हूर
लेकिन अब तो तू किसी बेशर्म तवायफ सी लगती है 
'पथि

खुली सड़क है, चला जा रहा हू,
न रास्ता मालूम न मंजिल की खबर है
मेरी मजबुरिया मुझे थकने न देती
चला जा रहा हू, उसी का असर है
राहो में बढ़ाये कई है मगर फिर भी
रुक जाना अब मेरी फितरत नहीं है
न कोई साथी, न कोई सहारा
बस चलता रहू किस्मत में यही है
कही तेज धुप तो कही ठंडी छाँव है
हो फूल चाहे कांटे, न रुकते ये पांव है
ये भूख और प्यास भी कहा खो गई है
उम्मीद की किरण अब तो कोई जगाये
बस चला जा रहा हू में बेखबर की
क्या मालूम कब ये सफ़र ख़त्म हो जाये
'पथिक'
सरे आम क़त्ल करके भी कातिल बच जाया करते है
आजादी के परवाने भी यहाँ बैठ के रोया करते हैं
भारत महान यहाँ अक्सर ऐसे किस्से हो जाया करते हैं
वतन बिकता देख कर भी नेता बेफिक्र सो जाया करते हैं
35 लाख के टोइलेट में बैठ कर ऐसी योजना बनाया करते हैं
गरीबों के 32 रुपये भी उनको ज्यादा लग जाया करते हैं
जहाँ देश के नेता देश में ही, लूट मचाया करते हैं
जाति और धर्म के नाम पर वो आग लगाया करते हैं
जो कभी था सोने की चिड़िया, लेकिन अब दुर्भाग्य देखो
सिर्फ 62 रुपये में यहाँ बेटे बिक जाया करते हैं 
'पथिक'
आतंकी हमलो में अपने पति को खो चुकी विधवा की तड़प
उसीकी जुबानी, यदि आपके पास इसका जवाब हो तो जरूर दें

इक आह सी मन में उठती है
दिल तड़प के रह जाता है
जब देखू उनका कातिल जिन्दा
दम मेरा निकल जाता है
जिनकी खातिर लड़ते लड़ते
वो जन अपनी गँवा बैठे
उनका कातिल तो जिन्दा
पर तुम क्यूँ बुजदिल बन बैठे
वो भी तो पिता थे पति थे
बच्चे उनके भी छोटे थे
तुम माँ की गोद में बैठे हो
वो भी किसी माँ के बेटे थे
वतन पर जान लुटाने की
कीमत कुछ इस तरह चुकाते है
कातिलों को जिन्दा रख
जख्मो पर नमक लगते है
गर हिम्मत है तो अपने बेटो को
सीमा पर भेज कर देखो
और फिर उसकी लाश पर
यूँ मौज मना कर के देखो
ये सूनी मांगे कहती है
अभी भी हिसाब बाकि है
आंसू का दरिया सूख गया
बस खून का सैलाब बाकि है
'पथिक'
क्यों जल रहा है देश अब
क्यों खो गई वो शान है
तू सोच कर बता जरा
क्या अब भी तुझे मान है
फिर क्यों तमाशबीन हो
तू  तमाशा देखता
क्या देह में तेरी रक्त नहीं
या सो गई है वीरता
जब देश ही न रहा
किस पे करेगा मान तू
किसकी करेगा पूजा फिर
इस बात का कर ध्यान तू
किस बात का है भय तुझे
किस बात से है डर रहा
तू रामजी की है संतान
फिर जीतेजी क्यों मर रहा
मांगने से भी भला
अधिकार मिलता है कही
हो बाजुओ में जिसकी दम
जीतता सदा वही
तो आज फिर दिखादे  तू
किस मिटटी से तू है बना
दुश्मनों के रक्त से
ये बदन अभी भी है सना 

पवन प्रजापति 'पथिक'
फिर खंजर उतरा सीने में,
फिर आग ये कैसी भड़क गई
चहुँ ओर मातम मसरा है,
फिर बिजली कैसी कड़क गई
एक बार फिर मातम पसर गया,
आँखों में खून फिर उतर गया
मेरे सपनो का भारत,
फिर कतरा कतरा बिखर गया
फिर से मांगे सूनी हुई
फिर से कोखे उजड़ गई
कुछ बच्चे हो गए अनाथ,
तो कुछ को माएं छोड़ गई
देखो ये भारत माता,
अपनों के खून से लाल हुई
कहा गई वो वीरता,
क्यों माता फिर बेहाल हुई
क्यों हाथ बांधे बैठे हो,
क्या बाजू में ताकत ही नहीं
वो मार रहे है अपनों को,
पर तुम तो कुछ करते ही नहीं
देख तुम्हारी कायरता,
वो वीर स्वर्ग में रोते है
माता छलनी छलनी है,
और बेटे नींद में सोते है

पवन प्रजापति 'पथिक'
 
कन्या भ्रूण हत्या पर मेरी एक कविता उन लोगो के लिए जो अपनी बेटी को पैदा होते ही नालो में मरने के लिए छोड़ देते है 

देख कर अब ये मंजर, इंसानियत शर्मिंदा है
मासूमों को क़त्ल कर, वो कातिल क्यों जिन्दा है
अरे तुमसे तो अच्छे जानवर, जो अपने बच्चो को दुलारते
और तुम तो इतने नीच हो, अपनी ही संतान को मारते
फूलो से नाजुक ये बच्चे, देखो किस हाल में मिलते है
जिनको गोद में होना था, वो नालो में पड़े मिलते है
अरे इनको भी खिलने देते, फूलो सा महकने देते
क्या तुम्हारा जाता जो, तुम इनको जिन्दा रहने देते
आज इनको हालत पर, हम सब शर्मसार है
इंसान अब है जानवर, और जानवर इन्सान है

पवन प्रजापति 'पथिक'
 
हमारे जवान जो सीमा पर लड़ते है, उनमे से किसी की पत्नी का ख़त उसके पति के नाम, यदि आपके दिल पर चोट करे तो अपनी राय de

कर के सोलह श्रृंगार, में बेठी हु मुह मोड़ के 
क्या मेरा कसूर था, जो तू गया यु छोड़ के

ये सोलह श्रृंगार मेरा, अब किसको दिखाऊ में
में इस पार तू उस पार, फिर किसको रिझाऊ में

में न ये कहती की, देश का न ध्यान धरो
लेकिन अरे निष्ठुर जरा, इस और भी तो ध्यान धरो

जब आहट दर पे हो कोई, उस और में हु भागती
फिर हो जाती हु मायूस, जब तुझको न देखती

ये बालो गजरा रोता, ये आँखों का कजरा रोता
फूल सा चेहरा मुरझाया, दिल का हर कतरा रोता 

अरे निष्ठुर तुम्हारे बिना तो, सावन भी लगता रूखा है
चहु और हरियाली है, पर मेरा दिल क्यों सुखा है

हर इक पल युग सा बीते हे, न मरते हे न जीते हे
होगा कभी तो मिलन यही, सोच के होठो को सीते है

मुझे माफ़ करो में भावो में बही, तुम मेरी और न ध्यान धरो
इस देश की मिटटी पहले है, तुमुसका पहले ध्यान धरो

पवन प्रजापति 'पथिक'
कहने को तो राखी है, पर दिल ये गम में चूर है
राखी बाँधी थी कभी जिसे, वो कलाई अब दूर है

तुमको हो राखी ये मुबारक, मेरा गम मेरे पास है
खुशिया है चारो तरफ, पर दिल मेरा ये उदास है 

तुम बैठे हो तिलक लगाये, क्या दर्द मेरा तुम समझोगे
लगाती थी टीका कभी जिसे, क्या वो सर तुम ला पाओगे?

कितना अच्छा होता जो राखी का त्योंहार ही न होता
कम से कम एक दिन के लिए, ये दिल तो इतना न रोता

शहीद की बहन कहलाती हूँ सर गर्व ऊंचा होता है
लेकिन उसकी याद में, ये दिल अब भी रोता है 

पवन प्रजापति 'पथिक'
फिर चीत्कार उठा है दिल,
आँखों में लावा उतर गया
देख के ये खुनी मंजर,
पत्थर का दिल भी पिघल गया
कहा गए वो बाजू जो
बिन बात ही अकड़ा करते थे
वो आज मौन क्यों बैठे है,
जो गला फाड़ चिल्लाते थे
भारत निर्माण के दावे देखो,
किस भांति सच होते है
दूध पिलाने माँ के,
यु टुकड़े टुकड़े होते है
दुश्मन तो घर में बैठे है,
फिर उन पर क्यों इल्जाम गढ़े
तुम चूडिया पहन कर बैठे हो,
फिर उनके हौसले क्यों न बढे
क्यू भुजा कोई फडकती नहीं,
क्यू उठती कोई कोई आवाज नहीं
पर तुम कर भी क्या सकते हो,
हिजड़ो का तो कोई इलाज नहीं
कहा गए वो सफेदपोश जो
नेता खुद को कहते है
हर बार क़त्ल होते है हम,
पर नेता क्यू नहीं मरते है
या तो क़त्ल करने वालो के,
तुम टुकड़े टुकड़े कर फेको
या छुप जाओ बीवी के पल्लू में,
चुप चाप तमाशा फिर देखो
क्यू चिंता तुमको होगी,
तुम अपने घर में बैठे हो
पर एक बात याद रखना,
तुम भी किसी माँ के बेटे हो

पवन प्रजापति 'पथिक'
 

कुत्तो की हिम्मत कैसे हुई, शेरो से आँख मिला बैठे
या तो कुत्तो में ताकत आई, या शेर बुजदिल बन बैठे
गीदड़ ने आखिर कैसे, शेरो का रस्ता मोड़ दिया
क्या गीदड़ में है दम या शेरो ने शिकार करना छोड़ दिया
शायद अब शेरनियो ने शेरो को जनना छोड़ दिया
या खून शेरो का पानी है, तभी तो लड़ना छोड़ दिया,
कुत्ते करेंगे राज अब, और शेर मांद में सोयेगा
बैठ कही किसी कोने में फिर, किस्मत को अपनी रोयेगा
थुकेगी दुनिया गर शेर होकर, तुम कुत्तो से डर जाओगे
फट जायेगा कलेजा कुत्तो का, जो एक बार गुर्राओगे

पवन प्रजापति 'पथिक'
 

मैं भारत माता हूँ जिसका
संसार में गौरव न्यारा था
मेरी ज्ञान की गंगा को
दुनिया ने स्वीकार था
लेकिन आज तो में खुद ही
अपने वजूद को खोती हूँ
मेरे बच्चे नींद में सोते है
में फूट फूट कर रोती हूँ
मेरी आन की खातिर मेरे
बच्चे प्राण गँवा गए
तुम उंगली काटने पर रोते हो
वो हंसकर गर्दन कटा गए
कहाँ गए वो बाजू जो
हरदम रण को आतुर थे
जिनकी एक हुंकार से ही
दुश्मन हो जाते व्याकुल थे
उस भगत सिंह की याद मुझे
आज भी तडपा जाती है
मन मेरा तड़प जाता है
शेखर की याद जब आती है
मेरी एक पुकार पे वो
जीवन सर्वस्व लुटा बेठे
में आज भी बेठी रोती हु
की तुम कायर क्यू बन बेठे
अपनी बीवी का सिन्दूर वो
अपने हाथो ही मिटा गए
माँ लौट के में न आऊंगा
ना राह ताकना बता गए
वो भी गर चाहते तो
जीवन का सुख ले सकते थे
फिर सोचो क्या आज तुम
इतने सुखी हो सकते थे
है इन्तजार मेरे भगत और
शेखर कभी तो आयेंगे
तू चिंता मत मेरी माता
मुझे आके दिलासा दिलाएंगे

पवन प्रजापति 'पथिक'
 
जानवर ही जानवर, इंसान अब दिखता नहीं
नफरतों का मंजर है, प्यार अब दिखता नहीं
मर रहा आज यारों जिस कदर ये आदमी
उस कदर तो कोई जानवर भी मरता नहीं
पंछियों को भी हमने आपस में लड़ते देखा है
यूँ तो बेरहमी से कोई खून किसीका बहाता नहीं

पवन प्रजापति 'पथिक'

तुम चाहो तो पर्वत का भी शीश झुका सकते हो
अपनी क्रोधाग्नि से तुम सागर भी सुखा सकते हो
फिर इंतजार किसका है, क्यों शस्त्र नहीं उठते है
अपनी एक हुनकर से तुम, शमशान जगा सकते हो
'पथिक'

नीचे लिखी पंक्तियों में छुपी वेदना मेरी वास्तविक वेदना है जो मैंने मेरे किसी अपने के लिए लिखी है, किसी की प्रशंषा पाने के लिए नहीं,

मैं दम साधे बैठा हु, की काश कभी वो मुस्काए,
भूले से ही सही लेकिन, चेहरे पे हंसी तो आ जाये
यूँ उसको तडपते हुए, मैं देख नहीं पाता हु
सांस अटकती उसकी है, लेकिन मैं मर जाता हु
किस्मत मैं तेरे प्यारे, क्या कभी कोई मुस्कान नहीं
देख तुझे मैं सोच रहा, क्या कही कोई भगवान नहीं
मैं दम भर तो जीता हु, माँ तेरी पल पल मरती है
तू काश कभी तो मुस्काए, बस झूठी आस लगाती है
काश की ये मुमकिन होता, दुःख तेरे सारे मैं ले पाता
देख तेरी मुस्कान को फिर, मैं जीवन अपना जी लेता
ये भी मुझको मालूम है की, तू साथ निभा नहीं पायेगा
लेकिन दिल तो दिल है ना, इस दिल को कौन मनायेगा

व्यथित ह्रदय से
'पथिक'